Tuesday, 23 December 2014

अजनबी दिल की गुहार

सुनो,

उसे तुमसे अपने दिल की बात ज़ाहिर करनी है। वो बहुत खुश है ये जानकर कि 'तुम'  जैसे एक शख़्स को उससे मुहोब्बत हुई। "आई मुहब्बत यू", ये वही शब्द हैं जो तुमने उससे कहे थे।

जैसा कि उसने तुम्हें पहले भी बताया था कि उसके दिल में हमेशा से तुम्हारे लिए एक ख़ास जगह थी। तुम्हारी शख़्सियत में कोई तो ऐसी बात है जो उसने आज तक किसी में नहीं आँकी। ये सच है कि उसे तुमसे मुहब्बत नहीं है, पर हाँ, वो अपने दिल को एक मौक़ा देना चाहती है।

बहुत सख़्त है वो, कभी इश्क़ के जज़बात को समझना ही नहीं चाहा उसने। अब आरज़ू ये है कि काश तुम्हारी मुहोब्बत में इतनी शिद्दत हो कि तुम उसे अपना बना लो। कुछ बातें तुमने कहीं कि तुम उसकी "इन-उन" अदाओं पर फ़िदा हो। उसकी सादगी के क़ायल हो, और शायद उसी पर मर बैठे हो। अच्छा है।

बात ये है कि उसकी अब तक की छोटी-सी ज़िन्दगी की कुछ बहुत बड़ी-बड़ी कहानियां हैं, जिन्हे वो तुमसे बाँटना चाहती है। साथ ही, उसे ये भी यकीं है कि तुम्हारी भी कोई दिलचस्प कहानी ज़रूर है, जो वो बेसब्री से सुनना चाहेगी। 

जिस दिन से तुमने इज़हार-ए-मुहोब्बत किया है, तब से हर दिन ऐसा होने लगा है की तुम चौबीसों घंटे उसके दिल-ओ-दिमाग़ में घूमते हो।

उसे नहीं पता कि क़िस्मत का इरादा क्या है, पर वो इतना जानती है कि वो तुम्हें खोना नहीं चाहती।  तुम दोस्त की तरह ही मिलो या आँखों में मुहोब्बत की चमक साथ ले आओ, ये अब तुम पर है।

उसे सिर्फ इतना कहना है कि अगर तुम ये कर सकते हो तो कर दो।  उसे अपनी मुहब्बत में रंग लो। उसका दिल ग़मों, उलझनों, परेशानियों और असमंजसों का ग़ुलाम बना हुआ है। इस सबसे आज़ाद कर उसे अपनी बाहों के घेरे में महफूज़ कर लो।

पलकों पर उम्मीद सजाये....

तुम्हारी "वो"!!! 


Saturday, 6 December 2014

दिखावे के बाजार में !!

आज हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, वहां दिखावे का बहुत महत्त्व है। ये न हो तो लोग एक दूसरे से रूबरू होना ही छोड़ दें।  लोग अक्सर एक दूसरे से इसलिए मिलते हैं ताकि अपनी विशेष उपलब्धियों को अत्यधिक  रूप से ज़ाहिर कर सकें।

शायद दिखावा ही वो शब्द है जिससे हम और आप अमीर-गरीब में अंतर करना सीख गए हैं। गाड़ी, बंगला, एसी, टैब, आईफोन - ये सब मात्र प्रदर्शन के प्रतीक हैं। ज़रूरत अपनी जगह ठीक  है, पर अक्सर लोग इन चीज़ों का इस्तेमाल सिर्फ सामने वाले को दिखाने के लिए करते हुए पाये जाते हैं।

एक और ख़ास चीज़ जिसका दिखावा आजकल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, वो है "रिश्ते"। जन्म  से ही हम हज़ारों रिश्तों से घिर जाते हैं, पर  कौन-सा रिश्ता हमारा अपना है, और कौन हमारे लायक नहीं है, इसकी समझ अधिकतर लोगों को देर से ही आती है। कुछ रिश्ते खून के होते हैं, अनिवार्य होते हैं जिन्हें हम दिल-ओ-जान से निभाना चाहते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो मात्र संयोग से बन जाते हैं। उन्हें निभाना या न निभाना पूरी तरह हमारा अपना निर्णय होता है।

कभी किसी ऐसी शख़्सियत से रिश्ता बन जाता है जिससे हम कोई  उम्मीद नहीं रखते पर वो कुछ ऐसा कर देता है जिसे देखकर दिल को सुकून मिलता है। वो अचानक ही आपसे कई सालों बाद मिला, पर उसका आपको गले लगाना दिल में एक उम्मीद जगाता है कि शायद आज भी आप उसके लिए महत्त्वपूर्ण हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि नाम के लिए एक रिश्ता  है तो, पर हम शायद ही उसे निभाने की कोशिश करते हैं। हम खुद भी कभी समझ नहीं पाते कि वो रिश्ता हमारे लिए कोई मायने रखता भी है या नहीं।

यही नुकसान है दिखावे के बाजार में रिश्तों का मोल ढूंढने का। कोई हमसे रिश्ता रखना चाहे या हमें अपनी ज़िन्दगी में तवज्जो दे, तो भी हम इतने सक्षम नहीं कि ये बात समझ पायें। सारी गलती इस दिखावेपन की है, हमारी है, उस सामने वाले उस तरह की शख़्सियत (जो हर कोई नहीं होता) की है जो अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए हमारी ओर कुछ पल के लिए ध्यान देता है और फिर अचानक ही लात मार देता है। किसी को भी ये विशलेषण करने का मौका ही नहीं मिलता कि आख़िर हुआ क्या ?

बस यही है हमारी कलयुग की दुनिया के रिश्तों का दिखावटी बाजार, जहाँ कुछ पल के प्रदर्शन के लिए रिश्ते निभाये जाते हैं और फिर तू कौन, मैं कौन का राग अलापा जाता है। आप समझ पाएं रिश्तों की अहमियत तो अच्छा है। जो रिश्ता मायने रखता है वो समाज में आपकी प्रतिष्ठा बढ़ाता है। वरना जिस सम्बन्ध की कोई महिमा नहीं है, वो बस नहीं है; फ़िर चाहें वो रिश्ता जज़्बात का हो, एहसास का हो या एहसान का।


Monday, 6 October 2014

वो सीख रही है।

शिष्या- गुरूजी, क्या पत्रकारिता मात्र कूटनीति भर है?

गुरूजी- नहीं, इसकी नींव ईमानदारी है। सिर्फ ईमानदारी।

मुझे मालूम नहीं कि ऊपर लिखी गयी ये दो पंक्तियाँ किसको, कितना प्रभावित करेंगी, मग़र इतना ऐतबार ज़रूर है कि जिस शिष्य के पास उनके जैसा गुरु हो जो हर बार उसके बुरे समय में उसे संभल ले, उसका जीवन अवश्य ही सफल है। कक्षा के भीतर वे बताया  करते थे कि कभी भी कोई भी काम करो तो पूरी मेहनत, लगन और ईमानदारी से करो। वो बड़ी बड़ी बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती थीं, लेकिन जब उस कक्षा के बाहर की दुनिया देखी तो मालूम हुआ कि यहाँ तो नज़ारा कुछ और ही है।

लगता है जैसे धांधली के बिना दुनिया चल ही नहीं सकती। झूठ, फरेब, मक्कारी ही ज़िन्दगी जीने के महत्त्वपूर्ण तरीके हैं। लोग सोचते हैं कि ग़लत रास्ता अपनाये बग़ैर सफलता मिल ही नहीं सकती। पर गुरु  के दिए ज्ञान के अनुसार शिष्या ने फिलहाल यही निश्चय  किया है कि जीना तो ईमानदारी से ही है, तब तक जब तक कि हिम्मत नहीं टूट जाती। अभी हर दिन कदम सिर्फ़ ख़्वाब की ओर बढ़ रहे हैं जो शायद इस वक़्त कुछ ज़्यादा ही दूर है। यद्यपि इच्छा सिर्फ इतनी है कि सच का हाथ थामकर ही वहाँ तक पहुँचना है। मुमकिन है या नहीं, वो नहीं जानती। शायद गुरूजी भी नहीं जानते होंगे।

कुछ मालूम नहीं कब, कैसे, क्या होगा ? पर ज़हन में जो बात है वो बस इतनी सी है कि हालात चाहें जो भी हों, बस चलते जाना है और वो भी पूरी ईमानदारी के साथ। कुछ लोग, जैसे उसके गुरु शायद यही बात बार-बार याद दिलाने के लिए हमेशा उसके साथ रहेंगे। कुछ ऐसे होंगे जो दो पल का साथ निभाकर छोड़ भी जायेंगे। पर हर कोई कुछ न कुछ सिखा जायेगा। वो शिष्या सीखती चली जाएगी, और आगे बढ़ती चली जाएगी। मंज़िल न जाने कितनी दूर है पर ये कदम अब नहीं रुकेंगे। बिना रुके, बिना थके बस चलते जाने का संकल्प ही अब इस ज़िन्दगी का एकमात्र मकसद है ।

Sunday, 14 September 2014

ज़रा गौर कीजियेगा।

चुनाव जीतने के लिए नेता आजकल तरह - तरह की रणनीतियाँ अपनाते हुए नज़र आते हैं। सबके अपने अलग - अलग तरीके हैं। कोई हिंदुत्व को बढ़ावा देना चाहता है, कोई सेक्युलर है, कोई बिजली - पानी की समस्या को दूर करना अपनी ज़िम्मेदारी बताता है, तो कोई ग़रीबी दूर करना चाहता है। हर कोई किसी एक मुद्दे को पकड़े वायदे करते नज़र आता है।

आज जो देश के प्रधानमंत्री हैं, उन्होंने भी दिन - रात अपनी पार्टी के लिए खूब प्रचार किया। आज जो नतीजा दिखाई दे रहा है, वो साफ़ ज़ाहिर करता है कि बीजेपी ने जीत हासिल करने के लिए कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी। टीवी, रेडियो, अखबारों के द्वारा बहुत कुछ दिखाया, बताया और सुनाया गया, पर कुछ था जो रह गया। इस नतीजे के पीछे शायद एक हिस्सा और भी है। मेरे फ़ोन के कैमरे से ली गयी ये तस्वीर बहत कुछ कहती है। ज़रा गौर कीजियेगा।


ये एक लोकल ट्रेन के महिला डिब्बे की तस्वीर है। लिखे गए शब्द कुछ इस प्रकार हैं।
"वैसे तो सारे नेता भ्रष्ट हैं चाहे मोदी ही क्यों न हो।  लेकिन जब सबको देख चुके तो एक बार मोदी को भी देखो। कम से कम हिंदुत्व तो बढ़ेगा। हिन्दुओं का संगठन भी बनेगा। हिन्दू धर्म का तूफ़ान तो आएगा।"

 दो - तीन जगह कुछ और बातें भी लिखी थीं, जल्दी में उनकी तस्वीर तो न मिल सकी पर जो लिखा था वो मैंने नोट कर लिया। एक जगह इस प्रकार लिखा था।
 "मोदी को वोट दो।
हिंदुत्व को वोट दो।
हिन्दू धर्म को वोट दो।
विकास को वोट दो।
हिन्दू जागो। "

दूसरी तरफ वाली खिड़की के पास निम्नलिखित वाक्य लिखा हुआ था।
"समस्त हिन्दू एकजुट हो जाओ और हिंदुसतान को वोट दो।"

कौन होगा वो शख़्स जिसने उस महिला डिब्बे को हिंदुत्व का डिब्बा बना दिया। जो भाषा लिखी गयी है, उससे तो यही प्रतीत होता है कि ये सारी बातें चुनाव होने से पहले ही लिखी गयी होंगी। ऊपर तस्वीर में गौर करने वाली एक बात और है कि किसी ने उस हिंदुत्व पर लिखे भाषण को मानो बहुत गुस्से में काट दिया है। सोचने वाली बात है कि आखिर ये क्रॉस का निशान किसने लगाया होगा?

पीएस - उस ट्रेन में जो भी लिखा था, वो परमानेंट मार्कर से लिखा था या नहीं, मुझे ज्ञात नहीं । अगर कोई तलाशी लेने जाए और ये सब कुछ वहाँ न मिले तो माफ़ कीजियेगा।

Wednesday, 3 September 2014

वो वापस आई थी.. मग़र????

कॉलेज ख़त्म होने के बाद पहली ही नौकरी ऐसी मिल गयी कि साथ पढ़ने वाले लोग ही दफ़्तर के कलीग भी बन गए। इस इत्तफ़ाक से लगभग सभी खुश थे। हमारे बीच दूरियाँ मिटने लगीं थीं, सब एक दूसरे से और अधिक घुलने-मिलने लगे थे।

सब कुछ ठीक था उस दिन तक जब अचानक हमने देखा कि धीरे - धीरे कुछ एम्प्लोईज़ को बिना वजह दफ़्तर छोड़ने को कहा जा रहा था। एक - एक कर सब जाने लगे थे और हलके - हलके हम सब पर इसका नकारात्मक असर पड़ने लगा। फिर भी, हम काम तो कर रहे थे पर उसे करने में सुकून हासिल नहीं हो रहा था।

एकाएक एक दिन मेरी टीम लीडर का स्वास्थ्य बिगड़ गया।  उसने एक मेसैज से इत्तिला किया कि वह उसी शाम की गाड़ी से घर जा रही है । वापस कब आएगी, इसका अंदाजा नहीं था।

अगले दिन हम सब दफ़्तर पहुंचे तो मेरी टीम के बाक़ी लोग भी उस जगह से जान छुड़ाने के बारे में सलाह-मशवरा कर रहे थे, न चाहते हुए भी मैं जिसका हिस्सा थी। शाम होने को आई और मुझसे मेरा फैसला पूंछा गया। मैंने कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं समझा। बस बैग उठाया और घर की ओर चल दी।

उसी रात उसका फ़ोन आया।  उसने मुझसे वादा किया कि वह ज़रूर वापस आएगी, मेरी ख़ातिर। दफ़्तर की इस नयी ज़िन्दगी में वो कब मेरी अच्छी दोस्त बन गयी पता ही नहीं चला। ख़ैर, बात बस ये थी कि उसके अल्फ़ाज़ों ने मेरे मन में उम्मीद की एक नयी किरण रोशन कर दी थी।

उसके बाद से मेरा हर दिन बस उसके इंतज़ार में कटता रहा। दफ़्तर पहुँच कर मैं हर रोज़ उस कुर्सी को देखा करती, जिस पर बैठ वह हर काम ज़िम्मेदारी से निभाती थी। हँसी और तनाव के लम्हे आँखों में अश्कों का सैलाब ले आते थे। हर दिन मै उससे बात किया करती थी। अचानक ही वो एक दिन किसी वजह से ख़ामोश हो गयी। उसकी चुप्पी को मैं समझ न सकी। बस अंदाजा लगाने लगी की शायद अब वो नहीं आएगी।

कुछ दिन बाद फिर उसका फ़ोन आया। उसने कहा कि वो दिल्ली आ रही है। मै ख़ुशी से झूम उठी। इससे पहले कि मैं कुछ कहती, उसने अपना वाक्य पूरा किया "अपना सामान लेने"। मैं चुप रह गयी।  कुछ कहने की न तो हिम्मत ही हुई, न इच्छा।

"ठीक है"- मैंने दबे स्वर में कहा।

"वक़्त मिले तो एक आख़री बार मिल लेना" - उसने कहा।

"मैं कोशिश करुँगी"- कहते ही मैंने फ़ोन रख दिया।

अगले ही दिन वो दिल्ली आ गयी। मैं उससे मिलने भी गयी। मुलाक़ात बस दस मिनट की थी।

"काश फ़िर किसी कंपनी में तुम मेरी कलीग बनो"- मैंने इच्छा जताई।

"अपना ध्यान रखना। अच्छे से रहना"- यह कहकर वो स्टेशन की ओर चल दी।

उसके चले जाने के बाद जब पहला फ़ोन आया था तब ये उम्मीद जगी थी कि हम शायद फिर से एक साथ काम कर पाएंगे।  वही पागलपन, वही जुनून फिर उस दफ़्तर में दिखेगा। मगर सच्चाई तो कुछ और ही थी। सच ये था कि वो वापस आई तो थी, पर वापस ही चले जाने के लिए।

Wednesday, 6 August 2014

अब टॉफ़ी कौन खिलायेगा?

हर रोज़ की तरह मैं दफ्तर पहुंची। यद्यपि कल की उस घटना के बाद जाने का कतई मन नहीं था, पर क्या करें अब 'नौकरी वाले नौकर' हैं तो मालिक की ग़ुलामी तो करनी ही पड़ेगी। ख़ैर, उसे छोड़िये।  आप ज़रा ये दाँस्तान सुनिए।

दफ्तर में घुसते ही मैंने पाया कि मात्र चार लोग बैठे हुए हैं। मैंने अपनी सीट पर बैग रखा और तेज़ी से अपने कदम उनकी ओर बढ़ाये। कल की उस घटना को याद किया जा रहा था जिसमे एक एम्प्लॉई को बिना वजह दफ्तर छोड़ देने के लिए कह दिया गया था। बातें हो रही थीं। अटकलें लगाई जा रही थीं कि अब अगली बारी किसकी है।

सहसा वो बोला- "आज मै जाऊंगा, मेरी ही बारी है।"

हम सब चुप खड़े थे।  कोई कुछ बोलने का साहस न कर सका। थोड़ी ही देर बाद सब अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठे काम पर लग गए।

कुछ घंटे बीते। दोपहर का वक़्त था। अचानक ही वो बाहर चला गया। ऑफिस की ही एक एम्प्लॉई उससे मिलकर आई। आते ही उसने कहा- "ये इस दफ्तर में उसका आख़िरी लम्हा था, वो जा रहा है।"

कानों को जैसे यकीन ही न हुआ। ऐसा लगा मानो सर पर पहाड़ टूट पड़ा हो। उससे कोई गहरी दोस्ती नहीं थी, न कभी कोई ज़्यादा बात-चीत हुई। पर सब कहते हैं कि वह बहुत अच्छा है। दिल का साफ़, स्वभाव से विनम्र, सदा मुस्कुराने वाला। मुस्कुराते हुए तो उसे हमेशा मैंने भी देखा है, पर ये अंदाज़ा बिलकुल न था कि आज इस दफ्तर में मैं आख़िरी बार उसकी मुस्कुराहट देख रही हूँ।

जैसा मैंने कहा कि कुछ ख़ास जान पहचान तो नहीं थी, मग़र एक टॉफ़ी का रिश्ता था। सुबह-सुबह मुट्ठी भरकर टॉफ़ियाँ ले आता था। दिन की शुरुआत अक्सर ऐसे ही हुआ करती थी, उसकी लायी टॉफ़ियाँ खाकर। लंच के बाद भी कभी - कभी दे दिया करता था। और अग़र बच जाती थी तो शाम की चाय के बाद भी एक-दो टॉफ़ियाँ मिल ही जाती थीं।

क्या मालूम था कि अचानक मज़ाक में बोला हुआ एक वाक्य इस तरह सच में तब्दील हो जाएगा। बुरा लग रहा था। कुछ कहने-सुनने को नहीं था उस वक़्त। अजीब लग रहा था। हम सब उसके जाने से परेशान थे। पर अब क्या होगा? होगा यही कि अब वो यहाँ नहीं आएगा। कल से वो कुर्सी ख़ाली होगी। कुछ होगा तो वो सिर्फ उसकी याद। याद, जो अब हर पल हम सबकी आँखों में छलकी चली आएगी।



Thursday, 31 July 2014

एक रिश्ता - बातों का

इस दुनिया में जन्म लेते ही हम हज़ारों रिश्तों से बंध जाते हैं। एक रिश्ता माँ से, एक पिता से, भाई और बहन से भी। साथ ही कई रिश्तेदार - मामा, चाचा, ताऊ, बुआ और भी न जाने कौन कौन।  इतने सारे रिश्ते कि नए रिश्ते बनाने की ज़रुरत ही नहीं।

पर फिर भी एक रिश्ता है जो हम अपनी मर्ज़ी से बनाते हैं। हाँलाकि ख़ुदा ने ही वो रिश्ता हमें नवाज़ा है, पर फिर भी जन्म के साथ हम उससे नहीं बंधते। वो रिश्ता है दोस्ती का। वक़्त बीतता जाता है और जैसे-जैसे हम ज़िन्दगी में आगे बढ़ते हैं, दोस्त बनते जाते हैं और रिश्तों का आंकड़ा बढ़ता चला जाता है।

आजकल जो एक रिश्ता फैशन में है वो है "बातों का रिश्ता" । फेसबुक और कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने  (व्हाट्सएप्प को न भूलते हुए) लोगों को ये रिश्ता बनाने का मौका दिया। किसी को भी फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजिए, और हज़ारों मील दूर बैठे शख़्स से आप दिन रात बेइन्तहां बातें कर सकते हैं। अपने मोबाइल फ़ोन में एक नंबर सेव कीजिये, उसे इस्तेमाल करने वाला शख़्स अगर व्हाट्सएप्प पर है तो आप उससे खूब बातें कर सकते हैं। एक दूर बैठा शख़्स जिससे आप कभी कहीं मिले होंगे और उस मुलाक़ात में नंबर एक्सचेंज हुआ होगा। अचानक वो आपकी व्हाट्सएप्प की लिस्ट में दिखने लगा होगा, और शायद आप उसकी प्रोफाइल और स्टेटस पर नज़र रखने लगेंगे।

सहसा एक दिन आपको उसका स्टेटस भा जाता है और "नाइस स्टेटस" जैसा मैसेज लिखकर तारीफ़ करते हुए आपको उससे बात करने का मौक़ा मिल जाता है।  फिर इंट्रोडक्शन होता है।  याद किया जाता है कि हम कब और कहाँ मिले थे।  उसके बाद हलकी-फुल्की बातें शुरू होती हैं। और यही सिलसिला जारी रहता है। कहने को आप उसे दोस्त कह सकते हैं, पर यूँही बिना वजह किसी पर ऐतबार कर लेना ज़रा मुश्किल हो सकता है।  इसलिए आप इसे बातों का रिश्ता ही मान लीजिये।

ख़ैर, जो भी हो ये रिश्ता है बड़ा ही प्यारा।  इसी बात पर राजेश खन्ना  की फिल्म "आनंद" का एक डॉयलॉग याद अ गया।  "बाबुमुशायी! ज़िन्दगी में कोई इंसान अच्छा लगा, उसे रोक कर दो मिनट बात करो तो दिल को सुकून मिलता है"।

इसी तरह एक शख़्स जिससे कभी मुलकात हुई, नंबर एक्सचेंज हुआ; वो व्हाट्सएप्प पर मिला और उससे ढेर सारी बातों का सिलसिला शुरू हो गया। उसकी हर बात रास आने लगी, और ये उम्मीद होने लगी कि ये सिलसिला कभी ख़त्म न हो। वैसे तो आमने-सामने होकर भी बातें हो सकती हैं, पर तब शायद रिश्ता दोस्ती का हो जाए।  फिलहाल तो ये बातों का रिश्ता ही रंगीन है, जिसकी अहमियत और ज़िन्दगी आने वाला वक़्त ही तय करेगा। तब तक आप बातें करते रहिये। 

Tuesday, 29 July 2014

गधों सी ज़िंदगी: नौ से पाँच

बचपन से लेकर जवानी तक हम इसीलिए पढ़ते-लिखते हैं कि एक दिन अपनी पसंद की नौकरी मिलेगी। दिन रात की मेहनत रंग लाएगी और हम अपना और अपने माता-पिता का हर सपना पूरा करेंगे, अपनी इच्छाएं पूरी करेंगे। भाग्य से  इतना कुछ करने के बाद लोग डॉक्टर, इंजीनियर, लॉयर बन ही जाते हैं। शायद कुछ लोगों के सपने पूरे हो जाते हों, पर इन्ही में से कुछ लोग होते हैं जो बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते हैं। ऐसी बहुत सी बड़ी बड़ी मल्टी नेशनल कंपनियां हैं जहाँ लोग काम कर बहुत ख़ुश हैं।

लोग सुबह सुबह घर से निकलते हैं।  कन्धों पर बैग टाँगे, हाथ में बड़ा सा टैब लिए, कानों में ईयरफ़ोन या हेडफ़ोन लगाए बस चलते चले जाते हैं। अधिकतर लोग नोएडा जाते हुए दिखते हैं। ग़ाजियाबाद की बात की जाये तो नोएडा ही एक ऐसा इलाका  है जहाँ अधिकतर एमएनसीज़ बसी हुई हैं। मेट्रो स्टेशनों पर लोग ऐसे खड़े होते हैं, मानो गधों का कोई गुट हो।  जैसे उसे को कोई फर्क नहीं पड़ता, जिस दिशा में घुमा दो चल देता है; वैसे ही इन एमएनसीज़ वाले गधों के भी हालात हैं। बॉस ने जब, जैसा कहा, बस कर दिया।

ख़ैर, अब गधों की बात हुई है तो आमिर खान की मशहूर फिल्म "थ्री इडियट्स" का डायलाग कैसे भुलाया जा सकता है। "वायरस यहाँ इस कॉलेज में गधे मैन्युफैक्चर कर रहा है। वो देखो तुम्हारा गधा "। बस, जैसे फिल्म में इम्पीरियल कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (आईएमई) के गधे थे, वैसे ही नॉएडा में इन एमएनसीज़ के गधे है, जो कन्धों पर बोझ लादे मेट्रो स्टेशनों पर लम्बी-लम्बी कतारों में लगे रहेंगे। नौ बजे तक ऑफिस पहुँचना है, पर भीड़ इतनी होती है कि आधा घंटा उस लाइन में खड़े-खड़े ही बीत जाएगा । उसके ऊपर कुछ कंपनियां महान श्रेणी की भी हैं, जहाँ यदि लोग पांच मिनट लेट हुए तो उनके कंजूस और महत्वाकांक्षी बॉस को उस दिन के कुछ पैसे काटने का मौका मिल जायेगा। कॉस्ट कटिंग करने का एकमात्र बेहतरीन तरीका।

ऑफिस पहुँचने के बाद ज़िन्दगी का मकसद सिर्फ इतना है कि अब लोग शाम के पाँच बजे तक अपनी कुर्सी पर बैठे रहेंगे और पांच बजते ही फिर जाकर उस मूक जानवर की तरह उसी लम्बी लाइन में खड़े हो जाएं। मेट्रो आएगी और लोग किसी जंग के लिए तैयार खड़े सैनिकों की तरह अंदर घुसने की कोशिश करते हैं।फिर आख़िरकार बहुत कोशिश के बाद उन्हें अंदर जाने की जगह मिल जाती है। एक-दूसरे को धक्का देते हुए लोग चढ़ जाते हैं और किसी न किसी तरह वापिस घर पहुँच ही जाते हैं।

बस यही है गधों सी ज़िन्दगी। लोग सुबह घर से निकल कर नौ से पाँच बजे तक उस कुर्सी पर बैठ कर बस कंप्यूटर पर टिक-टिक करते रहेंगे, आज एक एमएनसी में; कल किसी और बड़ी कंपनी में थोड़ी ज़्यादा तनख्वाह और शायद किसी ऊंची पोस्ट के साथ। चौबीस घंटे भागती-सी ज़िन्दगी की कहानी ऐसी हो चुकी है कि इंसान और गधे में फर्क करना मुश्किल हो गया है। हम सब इंसान से गधे ही बन चुके हैं।  मुबारक हो, पर शायद अब भी कुछ लोगों में वापिस इंसान बनने की चाह बाक़ी है। भगवान कम- से- कम  उनकी इस इच्छा को तो सलामत रखे। बाक़ी तो जो है वो रहेगा ही। 

Saturday, 28 June 2014

गुफ्तगू

ये ज़िन्दगी भी बड़ी बदमाश है।  हर पल, हर दिन कुछ ऐसा कर देती है कि जज़बात इस हद तक उमड़ आते हैं कि फिर आँसू रोके नहीं रुकते। बहुत दिन हो गए थे इससे बात किये, शायद तभी नाराज़ है।  वक़्त नहीं दे पाती ना मैं इसे। ख़ैर कोई नहीं, तुम फ़िक्र मत करो। आज हर लम्हा मैंने तुम्हारे लिए ही क़ैद किया है।  बहुत दिनों बाद फुरसत मिली है। आओ ज़रा तुमसे दो पल गुफ्तगू कर लूँ।

बचपन से लेकर अब तक तुम्हारे साथ जीते जीते बहुत कुछ सीखा है।  हँसी, ख़ुशी, ग़म, दुःख- लगभग हर जज़्बात बस तुम्हीं से बाँटा है।  क्यों न बाँटू, आख़िर तुम्हीं इसकी असली हक़दार हो। स्कूल गयी तो कुछ दोस्त मिले, जब छूटा तो कुछ का साथ भी छूट गया और मैं भी उन्हें भूल ही गयी। शायद ही कभी उनकी याद भी आयी हो। फिर स्कूल चेंज हो गया, दोस्त भी बदल गये। कुछ अच्छे थे, तो कोई दिल के क़रीब था, इतना कि आज भी उसकी बहुत सी बातें याद करुँ तो चेहरे पर मुस्कान के साथ आँखों में आंसुओं का सैलाब भी चला आता है। दूसरे स्कूल का साथ छूटने के बाद भी आज तक कुछ लोग साथ हैं।  पर जो सबसे क़रीब था, उसकी शक्ल तक याद नहीं।  है न मज़ेदार।  

ख़ैर, छोड़ो उसे। आज कॉलेज ख़त्म होने के बाद जब एक छोटी सी नौकरी लग गयी है तो वहाँ भी कुछ लोग मिल  गए हैं। अच्छे हैं या बुरे मालूम नहीं। बस इतने सालों में मुझे तो अभी तक यही समझ में आया है कि एक तुम ही हो जो हमेशा मेरे साथ रहती हो। चाहे मैं कितनी ही व्यस्त क्यों न हूँ, पर जब भी मुझे तुम्हारा ख्याल आता है, तुम हमेशा मुझे गले से लगाती हो।  

दफ़्तर में भी अलग अलग तरह के लोग हैं। कोई अच्छा, कोई बुरा।  पर मुझे किसी के क़िरदार का फैसला नहीं करना।  कौन, कब तक, कितना साथ देगा क्या पता? बस कुछ दिन बिताने हैं, सो बिता रहे हैं। हम भी और वो भी। कल कौन कहाँ होगा ये किसे पता है? दुआ बस इतनी है कि जो भी जहाँ भी हो, हमेशा खुश रहे।

यही तो होता है।  हर जगह लोग कुछ पल का साथ देते हैं और फिर वो सारा वक़्त पीछे छूट जाता है। कौन देखता है पलटकर? जैसे पहले एक स्कूल था, फिर दूसरा। स्कूल की ज़िन्दगी ख़त्म हुई तो कॉलेज शुरू हुआ। स्कूल में कुछ लोग थे, कॉलेज में भी थे।  आज इस दफ्तर में हैं, कल दूसरे में भी होंगे। पर कौन कब तक साथ देगा यह तय कर पाना मुश्किल है, बहुत मुश्किल है। आज एक दफ़्तर है, कुछ लोग हैं।  कल फिर कोई और दफ्तर होगा, कुछ और लोग भी होंगे। पर ज़िन्दगी, तुम पर मुझे इतना भरोसा है कि मैं जहाँ भी रहूँ, तुम तो हमेश साथ ही रहोगी। है ना। 


Tuesday, 17 June 2014

वो ठीक नहीं थी।

एकाएक वो अपनी कुर्सी से उठकर वाशरूम की ओर भागी। उसकी आँखों में जैसे आँसुओं का समंदर - सा उमड़ पड़ा था।  सबसे मुँह छिपाए वो चलती चली गयी।  मैंने देखा तो था पर उसके पीछे जाने की हिम्मत नहीं हुई।  जब वो मेरी आँखों से ओझल हो गई, अचानक मैंने अपना कंप्यूटर बंद कर दिया और किसी गहरी सोच में डूब गयी। कुछ देर बाद जब ध्यान टूटा तो एहसास हुआ कि वो अब तक अपनी सीट पर वापिस नहीं आई है।  मुझे कोई डर सा सताने लगा और खुद को न रोक पाते हुए मैं भी उसके चले हुए रस्ते पर से गुज़रते हुए उसके पास पहुँच गयी।

पहुंचकर देखा कि वो शीशे के सामने खड़ी रो रही थी। दिल कर रहा था उसे एक बार गले लगा लूँ , कुछ तो सांत्वना मिलेगी उसे। अकेलापन दूर हो जाएगा, लगेगा कि आज भी मुझे उसकी परवाह है, इंसानियत के नाते ही सही। वो थोड़ा बेहतर महसूस करेगी शायद, पर डर इतना लग रहा था कि उससे नज़रें तक भी नहीं मिली। जैसे ही उसे एहसास हुआ कि कोई उसके पीछे खड़ा है, उसने वॉशबेसिन का नल खोला और मुँह पर पानी के छींटें मारने लगी। मैं अभी भी वहीं खड़ी उसे सिर्फ देख रही थी, कुछ भी कहने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। 

मुँह धोकर नज़रें झुकाये जब वो जाने लगी तो अचानक ही मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और पूछा - "तुम ठीक हो?" 

ज़मीन को घूरते हुए उसने कहा- "हम्म"। 

मैंने फिर उसकी गीली पलकों को देखते हुए कहा- "बात करना चाहोगी ?" 

हाथ छुड़ाते हुए उसने कहा "हम्म, मैं ठीक हूँ"।  

"आर यू श्योर ?"- मैंने फिर पूँछा। 

"हम्म" - दबी सी आवाज़ में उसने कहा, और चली गई। 

उसके जाते ही न जाने क्या हुआ।  मैंने खुद को नज़र भर उसी आईने में देखा और अपनी आँखों में आये आँसुओं के सैलाब का दीदार किया, जिसे देखकर मैं फूट - फूट कर रोने लगी।  कुछ समझ नहीं पा रही थी कि सहसा ये सब क्यों और कैसे हो रहा है ? जब कल पूरी रात मंथन किया तो कुछ ऐसा पाया कि शायद क़िस्मत एक कहानी दोहरा रही है, साथ ही दूसरी लिख भी रही है। मेरी ये  ख़्वाहिश है कि पहली वाली कहानी यहीं थम जाये और दूसरी की तो शायद कल ही शुरुआत हुई है, जिसका अंत बहुत ही रहस्यमयी - सा लगता है। ख़ैर जो भी हो, मुझे अब सिर्फ इसके अंत का बेसब्री से इंतज़ार है। 

और इतनी गुज़ारिश भी है उस ख़ुदा से, कि उसे हालात से लड़ने की हिम्मत दे।  मुझे बिलकुल एहसास नहीं कि उसके दिल- ओ- दिमाग में क्या चल रहा है।  बस बार - बार मुंह से एक दुआ निकलती है , भगवान उसे शक्ति दे। और मुझे भी। 

Friday, 30 May 2014

आज दिन कुछ मेहरबान था

आज दिन कुछ मेहरबान था,
ख़ुशियों का जैसे मुझ पर कोई एहसान था।
इन्हें समेट लूँ मैं अपनी आग़ोश में,,
कहीं हो न जाऊं इसी पल मधहोश मैं।।

न जाने कैसा हँसी का सैलाब है,
मुझे जीवन अपना लगता कोई ख़्वाब है।
हक़ीक़त इतनी हँसीं होगी मैंने सोचा न था,,
सपनों से भी ये सवाल कभी पूंछा न था।।

पर सपनों से भी ख़ूबसूरत ये हक़ीक़त मुझको लगती है,
क्यों कहते हैं वो कि ये अक्सर हमको ठगती है।
कुछ तो है जो ख़ुदा ने सिर्फ मुझे नवाज़ा है,,
क़िस्मतों को रचने वाला वही तो एक राजा है। .

इन दोस्तों का साथ ही अब मेरी मुस्कान है,
इनकी दुआओं में बस्ती मेरी जान है।
ख़्वाहिश है बस इतनी कि ये हर पल पास रहे ,,
दिल के क़रीब और एहसासों में ख़ास रहें। .

क्या जाने ये क़िस्मत कहाँ ले जायेगी,
उम्मीद है कि ये अभी और भी खुशियाँ लाएगी।
यूँही इन उम्मीदों का सिलसिला चलता रहे,
और आशाओं भरा हर सपना इन आँखों में पलता रहे। .




Friday, 23 May 2014

व्यथा हज़ार के नोट की

ये पैसा भी अजीब चीज़ है यारों,
कभी रुलाता है कभी हँसाता है।
बेईमानों को छोड़ हमेशा,,
ये शरीफ़ों को ही फंसाता है।।

एक दिन कहा मैंने,
हज़ार के एक नोट से।
तंग आ चुकी हूँ अब मै ,,
तेरी दी हर चोट से।।

अभी तक अकड़कर बैठा था,
अचानक उसने मुँह खोला
चुप कर जा एकांकी माता,,
मुँह बिचकाकर गुस्से में बोला।।

मुझसे नाराज़ क्यों होती है,
मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है।
तुझे क्या मालूम ऐ ज़ालिम,,
ज़माने ने मुझे कितना लताड़ा है।।

तुझे क्या लगता है,
मेरा बहुत बोलबाला है।
अरे ऐश तो उसकी है,,
जिसने किया मेरा मुँह काला है। .

ये क्या बोलते हो तुम मियां
पल भर में मेरी चुप्पी टूटी।
वो बोला तुम  ना समझोगी,
क्यूँकि तुम भी अब बन चुकी हो झूठी।

ऐसा आरोप लगाया उसने,
कि मुझसे चुप ना रहा गया।
तेहा में आकर पूँछा मैंने,,
तेरा धर्म ईमान सब कहाँ गया।।

ईमान की क्या बात करूँ,
मैं तो हूँ इस जग से हारा।
मेरी ख़ातिर एक भाई ने,
दूजे भाई को जान से मारा।।

टू जी, थ्री जी, आदर्श घोटाला ,
कॉमनवेल्थ और कोयला काण्ड।
मेरी चाहत में पड़ने वालों,,
नष्ट कर दोगे तुम ये ब्रह्माण्ड।।

क़ैद हुआ तिजोरियों में मैं,
छुपा दिया गया पलंग के नीचे।
सहम जाता हूँ मैं भी तब जब,,
लोग दौड़ते हैं मेरे आगे पीछे।।

धोखा-फ़रेब करते हैं ये पर,
रुस्वा होता है मेरा नाम।
जितनी नहीं है इज़्ज़त मेरी,,
उससे ज़्यादा हूँ मैं बदनाम।।
उससे ज़्यादा हूँ मैं बदनाम।।




Sunday, 18 May 2014

ये तो होना ही था !!!

16 मई 2014 लोक सभा चुनाव का परिणाम लेकर आयी।  भारत के लिए एक और ऐतिहासिक दिन बन चुका है ये अब। बीजेपी बहुमत के साथ जीती और कांग्रेस को मिल गया बाबा जी का ठुल्लु। अन्य पार्टियाँ भी कुछ न कुछ करती हुई दिखाई दीं। सब कह रहे हैं कि कई सालों बाद ऐसा मंज़र देखने को मिला है जब कोई पार्टी बहुमत से जीती है। ख़ैर, अच्छी बात है जीती है तो। मुबारक हो भई आपको। पर यह चमत्कार हुआ कैसे ? कोई आंकलन, विश्लेषण या अनुसंधान है किसी के पास ? यह अचानक नहीं हुआ बल्कि ये तो तय था।  शायद एग्जिट पोल के आने से भी पहले से।

चुनाव के समय या मतदान से पहले जो सबसे ज़्यादा महत्त्व रखता है वो है "चुनाव प्रचार"। अगर ये न हो तो चुनाव चुनाव ही नहीं लगता। खूब ढोल-बाजे साथ लेकर जब नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ गाड़ी में बैठकर लोगों के बीच जाता है, उनकी एक-आद समस्या सुनता है और आश्वासन दिलाते हुए ये कहता है कि आप हमें वोट दीजिये, आपकी हर समस्या दूर होगी और हम आपके इलाके में विकास करेंगे, तब लगता है कि चुनाव अपनी चरम सीमा पर है।  ऐसे ही तो राजीतिक बयार बनाई जाती है।

ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार, अबकी बार मोदी सरकार। नहीं होगा स्त्रियों पर अब अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार। हर-हर मोदी, घर-घर मोदी। दिल्ली मेट्रो, ऑटो रिक्शा, गलियों में मोदी जी की बड़ी सी तस्वीर लिए बड़े-बड़े होर्डिंग्स, सीरियल के बीच में ही न्यूज़ चैनेल जैसा चलता एक टिकर  जिसमे बड़े-बड़े शब्दों में लिखा है "अबकी बार मोदी सरकार" इस राजनीतिक बयार को हवा देता है। साथ ही अनगिनत रोडशो भी इस प्रचार का अहम हिस्सा थे। यह तो मानना पड़ेगा कि मोदी जी ने इस बार चुनाव प्रचार में कोई कमी नहीं छोड़ी। शायद ही कोई चैनल या अखबार होगा, जिसमे उनका इंटरव्यू न दिखाई दिया हो।  सालों पहले जो मोदी करन थापर का इंटरव्यू छोड़कर चले गए थे, उन्होंने इस लोक सभा चुनाव में जीतने के लिए जी-जान से इंटरव्यू दिए।  कुछ चैनलों पर तो ये इंटरव्यू रिपीट भी होते रहे।  नरेंद्र मोदी का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू, देखिये सिर्फ फलाना चैनल पर।

सोशल मीडिया पर जैसे मोदी के नाम की बाढ़ आ गयी। हर दिन हज़ारों अपडेट सिर्फ मोदी के नाम के। कुछ लोग तो मोदी के प्यार में इस क़दर अंधे हो गए थे कि उन्हें हर जगह मोदी ही दिखते थे, अभी भी दिखते हैं। जो भी पोस्ट दिखा, नीचे कमेंट कर दिया "जय मोदी की", भले ही उसका राजनीती से दूर-दूर तक कोई लेना-देना ना हो।  फेसबुक, ट्विटर, जीमेल और फलाना ढिमका नेटवर्किंग साइट्स पे उनका जलवा बिखरा हुआ था। इसके अलावा घर-घर फ़ोन जाना और उसमें से एक आवाज़ का कहना "अबकी बार, मोदी सरकार"। ये सब जताते थे कि परिणाम क्या होंगे।  इस बार मतदान प्रतिशत भी बढ़ा।  लोगों पर इस प्रचार का प्रभाव ज़्यादा ई हो गया शायद, ऐसा इन नतीजों को देखकर लगता है। मज़ाक में ही सही पर हर किसी की ज़बान पर "अबकी बार, मोदी सरकार" बैठा दिखता था। हर जगह बस मोदी, मोदी, मोदी।  तो आख़िर क्यों न समझा जाए कि नतीजे जो आये हैं, यही अपेक्षित थे? क्यों लोगों को ख़ुशी या अचम्भा ह रहा है?

ख़ैर,  क्यूंकि अब नतीजा आ गया है तो मोदी जी का प्रधानमन्त्री बनना भी तय है।  उम्मीद है कि वो श्री मनमोहन सिंह जी से बेहतर साबित हों।  10 साल के उनके राज में पता नहीं वो खुद को कभी प्रधानमन्त्री महसूस कर भी पाये थे या नहीं।  कभी - कभी बोलते थे तो अच्छा लगता था। पर उसमें भी लगता था कि शायद अपने दिल की बात नहीं कह पा रहे।  किसी ने कुछ लिखकर दे दिया है, बस वही पढ़ते चले जा रहे हैं।कल आखरी बार उनको दूरदर्शन पर बोलते हुए देखा। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में कल आखरी बार बतौर प्रधानमन्त्री उन्होंने देश को एड्रेस किया। आजतक वो जब भी बोलते थे, उसे कभी गंभीरता से नहीं लिया। कल इस बात का एहसास हुआ, जब दूरदर्शन पर वो ऐसे बोल रहे थे मानो टैलिप्राम्प्टर से कोई न्यूज़ पढ़ रहा हो। जैसे टैलिप्राम्प्टर पर न्यूज़ चलती रहती है और एंकर पढ़ता रहता है, मंत्री जी भी कुछ ऐसे ही भागने की होड़ में थे। बिना पलकें झपकाये बस बोलते चले जा रहे थे।  पता नहीं अंदाजा सही है या ग़लत।

मोदी जी से इल्तेजा है कि वे इस पद की लाज रखें। कांग्रेस को हमेशा कोसा तो करते थे, पर ख़ुद कितने सक्षम होंगे देश चलाने में, ये तो आने वाले वक़्त में तय हो ही जाएगा।  गुजरात का विकास अपनी जगह ठीक है पर ये जो चुनावी प्रचार का बोलबाला 300 का आंकड़ा पार कर गया है, इसकी लाज रखना भी तो उनका धर्म एवं कर्तव्य है।   


Saturday, 17 May 2014

वाह री सरकार!!

वाह री सरकार,
तेरी जय - जयकार।
वाह री मनमोहन सरकार,,
तेरी जय जयकार।।

लोकसभा चुनाव का,
तुझे चढ़ा था बुख़ार।
हर सीट पर जीतने को,,
तू थी बड़ी बेक़रार।।

भ्रष्टाचार का ऐसा,
तूने अम्बार लगाया।
मदाताओं को जिसने ,,
खून के आंसू रुलाया ।।

और जादू की छड़ी तो,
तूने ऐसी घुमायी।
घोटालों से कर दी,,
इस देश की सफाई।।

मंत्रीमंडल भी तेरा,
था बहुत ही प्यारा।
हर सभा में फोड़ देता था,,
गुजरात मॉडल का गुब्बारा।।

इसी मंडल का हिस्सा थे,
माननीय श्री प्रधानमन्त्री हमारे।
दस साल राज किया पर,,
कभी कुछ बोले नहीं बेचारे।।

आज खाली पड़ी है उनकी कुर्सी,
किसी नए वज़ीर-ए-आज़म के इंतज़ार में।
राज करेगा देश पर अब वो,,
जनता जिसे लायी है.……
इस सत्ता के बाजार में।।


Monday, 5 May 2014

आप अकेले नहीं थे।

पांच साल पहले आपसे  मुलाक़ात हुई थी, आप भी हमारे मेंटर थे।  केमिस्ट्री के एटम-मोलेक्युल्स की जो कहानी आप सुनाते थे, शायद कोई नहीं सुना सकता था।  मेरा पहला लेख जो इतना लोकप्रिय हुआ, वो आप ही के लिये लिखा गया था।  तब उतना अनुभव नहीं था, पर अपने सभी दोस्तों में सिर्फ़ मै ही थी जिसे लिखने का बहुत शौंक था। एक अनुभव आपसे मिला तो उसे पन्ने पर उतार दिया। आज फिर एक अनुभव से गुज़री तो दिल किया जज़्बातों को शब्दोँ में पिरोने का।

मानो आप में और उनमें कोइ फ़र्क़ हीं नहीं है। उन  एटम और मॉलिक्यूल की जीवनी समझ आने ही लगी थी कि अचानक एक दिन आपने कक्षा में  कहा कि आज मेरा आख़री दिन है तुम लोगों के साथ। क्यूंकि यह वाक्य बोलने के बाद आप मुस्कुराने लगे तो हम सबको लगा कि आप मज़ाक कर रहे हैं, बच्चे ही तो थे हम तब जो आपकी बातों में आ गये।  पर एक हफ्ते बाद जब कक्षा में नया टीचर आया तो समझ में आया कि वो मज़ाक नहीं था। आप सचमुच हमें छोड़ कर जा चुके थे, किसी दूसरे शहर में, किसी ओर को उन्हीं एटम ओर मॉलिक्यूल का ज्ञान बांटने।

ख़ैर, आज ऐसा  लगा कि आप अकेले नहीं थे हमें यह अनुभव देने वाले। कोई और भी शामिल हुआ आज इस श्रेणी में।  एक और मेंटर हमें छोड़ गया।  आप ही की तरह उनकी भी कुछ मजबूरियाँ थीं। लेकिन आज होने वाले इस अनुभव ने न जाने क्यों आपकी भी याद दिला दी।  आपके जाने के बाद लगने लगा था कि आप जैसा क़ोई शख़्स फ़िर कभी नहीं मिलेगा, क्यूंकि वैसा क़ोई होगा ही नहीं शायद इस दुनिया में । पर मेरा अंदाज़ा ग़लत था।

आप जैसा एक शख्स और है जिनके बारे में कल वव्हॉट्स एप्प पर बातें हो रहीं थीं कि सर जा रहे हैं।  कुछ समझ नहीं आ रहा था कि सब लोग ऐसा क्यों बोल रहे हैं। दिल को बिल्कुल वैसा ही झटका लगा जैसा आपके जाने से लगा था। एक शख्स जिसके भरोसे हम सब कुछ करते आ रहे थे, एक शख्स जिसने हुमें इतना कुछ सिखाया, एक शख्स जिस पर हम शायद पूरी तरह से निर्भर थे, एक शख्स जिस पर हम भरोसा करते थे, एक शख्स जो हमारी एकता का प्रतीक था; वो अचानक हमें छोड़ कर जा रहा था। बुरा लग रहा था पर कहते हैं ना वक़्त सब कुछ सहने की शक्ति देता है।  साथ में रहने वाले दोस्तों के रूप में हिम्मत भी देता है।  एक दोस्त ने कहा था -"लाइफ प्लान्स अकोर्डिंगली, ऑल्वेज़ विध अ रीज़न'। अब देखते हैं क्या प्लान किया है ज़िन्दगी ने और कहाँ है अपनी मंज़िल। पांच साल हो गए पर आपसे मुलाक़ात नहीं हुई, उम्मीद है कि इस नये शख्स का साथ कभी नहीं छूटेगा।

मग़र सौ बात की एक बात- 'वी विल मिस यू सर'। गॉड ब्लेस यू।  

Saturday, 19 April 2014

बदलता वैशाली


एक दिन अचानक वैशाली मेट्रो स्टेशन से एग्जिट लेते वक़्त मन किया कुछ तसवीरें लेने का, ले लीं।  मेरा अनुभव कहता है कि पिछले कुछ सालों में यह शहर क़ाफी बदल गया है। मेरा फ़ोन ज्यादा हाई- फाई तो नहीं है मगर फिर भी आप कोशिश कीजियेगा यह देखने की कि कितना बदला है वैशाली।

पहली तस्वीर वैशाली से मोहन नगर आने वाले ऑटो की है। फोटो लेने से खुद को रोक पाना मुश्किल था। क्योंकि ऑटो चल रहा था इसलिए फोटो साफ़ नहीं है।  इन दो लाइनों में निम्नलिखित शब्द लिखे हैं-
                       
                                               हँस मत पगली प्यार हो जाएगा,
                                    कृपया खुले पैसे दें वरना 10 का नोट पूरा हो जाएगा।

सारी दुनिया के कवि एक तरफ , ऑटो वालों की शायरी एक तरफ।  इनका किसी से भी मुक़ाबला करना मुश्किल है। बाक़ी आप देखते रहिये।















Friday, 11 April 2014

यादें......!!!!!!!!

मात्र सात दिन हुए थे उस न्यूज़रूम से रूबरू हुए, और एक पल में ही साथ छूट गया। आज ही तो कुछ चीज़ें समझ आने लगी थीं, रास्ते अपने से लगने लगे थे।  उस "औरा" से जान-पहचान सी होने लगी थी। पर मालूम नहीं था कि  इतनी जल्दी इतना कुछ हो जायेगा। जो आइडेंटिटी कार्ड इतनी मशक्कतों के बाद कल मिला था वो आज वापिस भी हो गया।  लगा कि आया ही क्यों वो हाथ में जब वापिस ही जाना था।  ख़ैर अब जो हो गया वो ठीक ही हुआ होगा शायद।

आगे एक नयी ज़िन्दगी है।   हो सकता है कि फिर कहीं आगे आने वाली ज़िन्दगी में यादें सिर्फ यादें ना रहें ।   










Thursday, 10 April 2014

हिंदुस्तान का वोटर.......

हिंदुस्तान की राजनीति की तरह उसका वोटर भी बड़ा अजीब है। जहाँ मतदान के दिन कुछ लोग वोट डालने के लिए अति इच्छुक होते हैं, वहीँ कुछ ऐसे भी हैं  जो अपना मत नहीं देते या देना नहीं चाहते। और इसके अनेकों कारण हैं।  कुछ सुबह सोकर नहीं उठ पाते, कुछ बीमार होते हैं, किसी का एक्सिडेंट हो गया होता है, कोई पहले से अस्पताल में एडमिट होता है, कोई वोट देना नहीं चाहता क्यूंकि उसे राजनीती में दिलचस्पी नहीं है। कोई कहता है की "कौन  इतनी दूर जाये वोट डालने", किसी को जल्दी ऑफिस पहुंचना है (अगर बदक़िस्मती से छुट्टी नहीं है तो) और वापिस कब आना है मालूम  नहीं। आजकल हर कोई बहुत व्यस्त है। और  कुछ तो ऐसे भी हैं जिनके पास अपना वोटर आई डी नहीं है, किसी ने अपना आई डी बनवाया ही नहीं है।  ऐसी स्थिती मैं मतदान प्रतिशत कैसे बढ़ेगा बताइये मगर फिर भी बढ़ जाता है (भगवान जाने कैसे)।

ख़ैर, इन्ही वोटरों में कुछ ऐसे भी हैं जो बड़ी बेसब्री से इस दिन का इंतज़ार करते हैं।  सुबह - सुबह  इनका सबसे पहला काम मतदान का ही होता है।  कदम बढ़ाये पोलिंग बूथ की ओर जाते हैं और पहुँचने के बाद पता चलता है कि वोटिंग लिस्ट में नाम ही नहीं है। अलग-अलग वार्ड के पर्चे बिखरे पड़े रहते हैं और वोटर पोलिंग बूथ पे पहुँच कर सीधा वोट करने की बजाये उन पर्चों में अपना नाम ढूंढ रहा होता है।  बड़ी मशक्कत के बाद यदि उस लिस्ट में अपना नाम मिल जाये तो वोटर अपना वोट देकर ख़ुशी-ख़ुशी घर वापिस चला जाता है, और अगर वो मतदान नहीं कर पाता तो सिस्टम को कोसता हुआ लौट आता है। 

चुनाव की खातिर ऑफिस, कॉलेज और स्कूल भी बंद रहते हैं।  कायदे से सभी को इस छुट्टी का फायदा उठाकर वोट डालने जाना चाहिए मगर ऐसा होता है क्या? सड़कें खाली नज़र आती हैं, ट्रैफिक नहीं होता। लगता है मानो हर रोज़ एक ही रास्ते से दफ्तर या कॉलेज जाने वाले आज स्पेशली वोट डालने के लिए छुट्टी किये बैठे हैं।  हमारा यूथ जो सबसे ज़्यादा जागरूक है (ऐसा माना जाता है), बदलाव के लिए अग्रसर है।

(खाली सड़कें)


              (लिस्ट में नाम ढूंढते वोटर) 



(खुद ही अपने नाम की पर्ची काटते वोटर) 
















जानेंगे 16 मई को, क्या किया है हिंदुस्तान के वोटर ने।  बाक़ी आप तो समझदार हैं ही।  

Sunday, 6 April 2014

बौखलायीं मोहतरमा

टीवी में दिखने वाली टीवी की दुनिया को क़रीब से देखा, एक चैनल के न्यूज़रूम  का दीदार किया। कमरे में पहला कदम रखते ही नज़र दौड़ी सामने डेस्क पर रखे 100 कंप्यूटर सिस्टम्स की ओर, जिन पर काम करते लोग इतने व्यस्थ थे कि अपने साथ खड़े - बैठे लोगों की ओर देखने तक की फुरसत नहीं। एक मोहतरमा से बात हुई तो वो  पगलाई सी झल्लाकर कुछ बोलीं। जो भी उन्होंने कहा वो यहाँ लिखना तो असम्भव है, मगर कोई बात नहीं।  ठीक है मैडम हम आपकी फृस्त्रशन समझते हैं। चैंनलों  में यही होता है। जो होता है, वो दिखता  नहीं, लेकिन जो दिखता है वो कहीं ना कहीं घटता ज़रूर है।

एक सज्जन से कुछ दिन पहले मुलाक़ात हुई थी।  उम्र में काफी बड़े हैं। पहली मीटिंग में ही नंबर एक्सचेंज हो गए।  लगभग हर रोज़ बात भी होने लगी।  एक दिन बातों बातों में वो अचानक बोले - "बीइंग अ सीनियर आई कांट बी राईट ऑल द टाइम।  आई हैव सीनियर्स हू वर नेवर रेडी टू कॉन्फेस देयर फुलिशनेस।" आप सही थे सर।  सीनियर हैं तो क्या ग़लती नहीं कर सकते?  हैं तो आखिर इंसान ही।

ख़ैर अब मोहतरमा से क्या शिकायत  करना।  उनके भी अपने अनुभव हैं।  पर एक बात अब तक समझ नहीं आयी कि बौखलाने की वजह क्या वो एक सवाल था या वो उनके अपने अनुभव ही हैं जो उन्हें अब तक कलपने पर मजबूर कर रहे हैं ? इसका जवाब पता नहीं किसके पास है लेकिन ईशवर से यही प्रार्थना है कि वो उनकी फृस्ट्रटेड आत्मा को शान्ति दे।