Saturday, 28 June 2014

गुफ्तगू

ये ज़िन्दगी भी बड़ी बदमाश है।  हर पल, हर दिन कुछ ऐसा कर देती है कि जज़बात इस हद तक उमड़ आते हैं कि फिर आँसू रोके नहीं रुकते। बहुत दिन हो गए थे इससे बात किये, शायद तभी नाराज़ है।  वक़्त नहीं दे पाती ना मैं इसे। ख़ैर कोई नहीं, तुम फ़िक्र मत करो। आज हर लम्हा मैंने तुम्हारे लिए ही क़ैद किया है।  बहुत दिनों बाद फुरसत मिली है। आओ ज़रा तुमसे दो पल गुफ्तगू कर लूँ।

बचपन से लेकर अब तक तुम्हारे साथ जीते जीते बहुत कुछ सीखा है।  हँसी, ख़ुशी, ग़म, दुःख- लगभग हर जज़्बात बस तुम्हीं से बाँटा है।  क्यों न बाँटू, आख़िर तुम्हीं इसकी असली हक़दार हो। स्कूल गयी तो कुछ दोस्त मिले, जब छूटा तो कुछ का साथ भी छूट गया और मैं भी उन्हें भूल ही गयी। शायद ही कभी उनकी याद भी आयी हो। फिर स्कूल चेंज हो गया, दोस्त भी बदल गये। कुछ अच्छे थे, तो कोई दिल के क़रीब था, इतना कि आज भी उसकी बहुत सी बातें याद करुँ तो चेहरे पर मुस्कान के साथ आँखों में आंसुओं का सैलाब भी चला आता है। दूसरे स्कूल का साथ छूटने के बाद भी आज तक कुछ लोग साथ हैं।  पर जो सबसे क़रीब था, उसकी शक्ल तक याद नहीं।  है न मज़ेदार।  

ख़ैर, छोड़ो उसे। आज कॉलेज ख़त्म होने के बाद जब एक छोटी सी नौकरी लग गयी है तो वहाँ भी कुछ लोग मिल  गए हैं। अच्छे हैं या बुरे मालूम नहीं। बस इतने सालों में मुझे तो अभी तक यही समझ में आया है कि एक तुम ही हो जो हमेशा मेरे साथ रहती हो। चाहे मैं कितनी ही व्यस्त क्यों न हूँ, पर जब भी मुझे तुम्हारा ख्याल आता है, तुम हमेशा मुझे गले से लगाती हो।  

दफ़्तर में भी अलग अलग तरह के लोग हैं। कोई अच्छा, कोई बुरा।  पर मुझे किसी के क़िरदार का फैसला नहीं करना।  कौन, कब तक, कितना साथ देगा क्या पता? बस कुछ दिन बिताने हैं, सो बिता रहे हैं। हम भी और वो भी। कल कौन कहाँ होगा ये किसे पता है? दुआ बस इतनी है कि जो भी जहाँ भी हो, हमेशा खुश रहे।

यही तो होता है।  हर जगह लोग कुछ पल का साथ देते हैं और फिर वो सारा वक़्त पीछे छूट जाता है। कौन देखता है पलटकर? जैसे पहले एक स्कूल था, फिर दूसरा। स्कूल की ज़िन्दगी ख़त्म हुई तो कॉलेज शुरू हुआ। स्कूल में कुछ लोग थे, कॉलेज में भी थे।  आज इस दफ्तर में हैं, कल दूसरे में भी होंगे। पर कौन कब तक साथ देगा यह तय कर पाना मुश्किल है, बहुत मुश्किल है। आज एक दफ़्तर है, कुछ लोग हैं।  कल फिर कोई और दफ्तर होगा, कुछ और लोग भी होंगे। पर ज़िन्दगी, तुम पर मुझे इतना भरोसा है कि मैं जहाँ भी रहूँ, तुम तो हमेश साथ ही रहोगी। है ना। 


Tuesday, 17 June 2014

वो ठीक नहीं थी।

एकाएक वो अपनी कुर्सी से उठकर वाशरूम की ओर भागी। उसकी आँखों में जैसे आँसुओं का समंदर - सा उमड़ पड़ा था।  सबसे मुँह छिपाए वो चलती चली गयी।  मैंने देखा तो था पर उसके पीछे जाने की हिम्मत नहीं हुई।  जब वो मेरी आँखों से ओझल हो गई, अचानक मैंने अपना कंप्यूटर बंद कर दिया और किसी गहरी सोच में डूब गयी। कुछ देर बाद जब ध्यान टूटा तो एहसास हुआ कि वो अब तक अपनी सीट पर वापिस नहीं आई है।  मुझे कोई डर सा सताने लगा और खुद को न रोक पाते हुए मैं भी उसके चले हुए रस्ते पर से गुज़रते हुए उसके पास पहुँच गयी।

पहुंचकर देखा कि वो शीशे के सामने खड़ी रो रही थी। दिल कर रहा था उसे एक बार गले लगा लूँ , कुछ तो सांत्वना मिलेगी उसे। अकेलापन दूर हो जाएगा, लगेगा कि आज भी मुझे उसकी परवाह है, इंसानियत के नाते ही सही। वो थोड़ा बेहतर महसूस करेगी शायद, पर डर इतना लग रहा था कि उससे नज़रें तक भी नहीं मिली। जैसे ही उसे एहसास हुआ कि कोई उसके पीछे खड़ा है, उसने वॉशबेसिन का नल खोला और मुँह पर पानी के छींटें मारने लगी। मैं अभी भी वहीं खड़ी उसे सिर्फ देख रही थी, कुछ भी कहने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। 

मुँह धोकर नज़रें झुकाये जब वो जाने लगी तो अचानक ही मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और पूछा - "तुम ठीक हो?" 

ज़मीन को घूरते हुए उसने कहा- "हम्म"। 

मैंने फिर उसकी गीली पलकों को देखते हुए कहा- "बात करना चाहोगी ?" 

हाथ छुड़ाते हुए उसने कहा "हम्म, मैं ठीक हूँ"।  

"आर यू श्योर ?"- मैंने फिर पूँछा। 

"हम्म" - दबी सी आवाज़ में उसने कहा, और चली गई। 

उसके जाते ही न जाने क्या हुआ।  मैंने खुद को नज़र भर उसी आईने में देखा और अपनी आँखों में आये आँसुओं के सैलाब का दीदार किया, जिसे देखकर मैं फूट - फूट कर रोने लगी।  कुछ समझ नहीं पा रही थी कि सहसा ये सब क्यों और कैसे हो रहा है ? जब कल पूरी रात मंथन किया तो कुछ ऐसा पाया कि शायद क़िस्मत एक कहानी दोहरा रही है, साथ ही दूसरी लिख भी रही है। मेरी ये  ख़्वाहिश है कि पहली वाली कहानी यहीं थम जाये और दूसरी की तो शायद कल ही शुरुआत हुई है, जिसका अंत बहुत ही रहस्यमयी - सा लगता है। ख़ैर जो भी हो, मुझे अब सिर्फ इसके अंत का बेसब्री से इंतज़ार है। 

और इतनी गुज़ारिश भी है उस ख़ुदा से, कि उसे हालात से लड़ने की हिम्मत दे।  मुझे बिलकुल एहसास नहीं कि उसके दिल- ओ- दिमाग में क्या चल रहा है।  बस बार - बार मुंह से एक दुआ निकलती है , भगवान उसे शक्ति दे। और मुझे भी।