ये ज़िन्दगी भी बड़ी बदमाश है। हर पल, हर दिन कुछ ऐसा कर देती है कि जज़बात इस हद तक उमड़ आते हैं कि फिर आँसू रोके नहीं रुकते। बहुत दिन हो गए थे इससे बात किये, शायद तभी नाराज़ है। वक़्त नहीं दे पाती ना मैं इसे। ख़ैर कोई नहीं, तुम फ़िक्र मत करो। आज हर लम्हा मैंने तुम्हारे लिए ही क़ैद किया है। बहुत दिनों बाद फुरसत मिली है। आओ ज़रा तुमसे दो पल गुफ्तगू कर लूँ।
बचपन से लेकर अब तक तुम्हारे साथ जीते जीते बहुत कुछ सीखा है। हँसी, ख़ुशी, ग़म, दुःख- लगभग हर जज़्बात बस तुम्हीं से बाँटा है। क्यों न बाँटू, आख़िर तुम्हीं इसकी असली हक़दार हो। स्कूल गयी तो कुछ दोस्त मिले, जब छूटा तो कुछ का साथ भी छूट गया और मैं भी उन्हें भूल ही गयी। शायद ही कभी उनकी याद भी आयी हो। फिर स्कूल चेंज हो गया, दोस्त भी बदल गये। कुछ अच्छे थे, तो कोई दिल के क़रीब था, इतना कि आज भी उसकी बहुत सी बातें याद करुँ तो चेहरे पर मुस्कान के साथ आँखों में आंसुओं का सैलाब भी चला आता है। दूसरे स्कूल का साथ छूटने के बाद भी आज तक कुछ लोग साथ हैं। पर जो सबसे क़रीब था, उसकी शक्ल तक याद नहीं। है न मज़ेदार।
ख़ैर, छोड़ो उसे। आज कॉलेज ख़त्म होने के बाद जब एक छोटी सी नौकरी लग गयी है तो वहाँ भी कुछ लोग मिल गए हैं। अच्छे हैं या बुरे मालूम नहीं। बस इतने सालों में मुझे तो अभी तक यही समझ में आया है कि एक तुम ही हो जो हमेशा मेरे साथ रहती हो। चाहे मैं कितनी ही व्यस्त क्यों न हूँ, पर जब भी मुझे तुम्हारा ख्याल आता है, तुम हमेशा मुझे गले से लगाती हो।
दफ़्तर में भी अलग अलग तरह के लोग हैं। कोई अच्छा, कोई बुरा। पर मुझे किसी के क़िरदार का फैसला नहीं करना। कौन, कब तक, कितना साथ देगा क्या पता? बस कुछ दिन बिताने हैं, सो बिता रहे हैं। हम भी और वो भी। कल कौन कहाँ होगा ये किसे पता है? दुआ बस इतनी है कि जो भी जहाँ भी हो, हमेशा खुश रहे।
यही तो होता है। हर जगह लोग कुछ पल का साथ देते हैं और फिर वो सारा वक़्त पीछे छूट जाता है। कौन देखता है पलटकर? जैसे पहले एक स्कूल था, फिर दूसरा। स्कूल की ज़िन्दगी ख़त्म हुई तो कॉलेज शुरू हुआ। स्कूल में कुछ लोग थे, कॉलेज में भी थे। आज इस दफ्तर में हैं, कल दूसरे में भी होंगे। पर कौन कब तक साथ देगा यह तय कर पाना मुश्किल है, बहुत मुश्किल है। आज एक दफ़्तर है, कुछ लोग हैं। कल फिर कोई और दफ्तर होगा, कुछ और लोग भी होंगे। पर ज़िन्दगी, तुम पर मुझे इतना भरोसा है कि मैं जहाँ भी रहूँ, तुम तो हमेश साथ ही रहोगी। है ना।
यही तो होता है। हर जगह लोग कुछ पल का साथ देते हैं और फिर वो सारा वक़्त पीछे छूट जाता है। कौन देखता है पलटकर? जैसे पहले एक स्कूल था, फिर दूसरा। स्कूल की ज़िन्दगी ख़त्म हुई तो कॉलेज शुरू हुआ। स्कूल में कुछ लोग थे, कॉलेज में भी थे। आज इस दफ्तर में हैं, कल दूसरे में भी होंगे। पर कौन कब तक साथ देगा यह तय कर पाना मुश्किल है, बहुत मुश्किल है। आज एक दफ़्तर है, कुछ लोग हैं। कल फिर कोई और दफ्तर होगा, कुछ और लोग भी होंगे। पर ज़िन्दगी, तुम पर मुझे इतना भरोसा है कि मैं जहाँ भी रहूँ, तुम तो हमेश साथ ही रहोगी। है ना।
No comments:
Post a Comment