Saturday, 13 June 2015

साइंस के साइंस

घर से दफ्तर जाने के बीच आज बस एक फांसला था- साइंस (विज्ञान)। सेक्टर ६२ की चौकी से जैसे ही ऑटो पकड़ा, सामने ग्रेटर नॉएडा में स्थित जी एल बजाज कॉलेज की दो छात्राएं आकर बैठ गयीं। दोनों बीटेक फाइनल ईयर में थीं। उनमें से एक अचानक बोली - मैम, एक्सक्यूज़ मी!

मैंने कहा - जी।

मैम, हम दोनों हमारे प्रोजेक्ट के लिए एक सर्वे कर रहे हैं। आपसे कुछ सवाल पूछने हैं।

मैंने कहा - जी पूछिये।

कोमल ने कुल पाँच सवाल पूछे। साथ ही मेरा नाम, फ़ोन नंबर और ईमेल आई डी ले ली।

सवाल थे रेस्ट्रॉन्ट और उनकी सर्विसेज़ से रिलेटेड। कोमल और उसकी दोस्त माहेश्वरी एक ऐसी मोबाइल ऐप्प बना रहे हैं जिससे आप जब कभी किसी रेस्ट्रॉन्ट में जाएंगे तो किसी वेटर को आकर आपका आर्डर लेने की ज़रुरत नहीं होगी। आप बस बैठिये, मोबाइल से अपना आर्डर दीजिये और आपका खाना आपकी टेबल पर होगा। खाने का स्वाद लेने के बाद बिल भी आपके मोबाइल पर आ जायेगा और आप अपने मोबाइल से ही ऑनलाइन पेमेंट भी कर सकेंगे। यदि किसी रेस्ट्रॉन्ट का खाना या सर्विसेज आपको पसंद नहीं आयीं तो आप इस ऐप्प के द्वारा रिव्यु या शायद शिकायत भी दर्ज कर सकते हैं। ये ऐप्प आने पर कन्फर्म हो जाएगा।

ख़ुशी की बात ये है कि इस ऐप्प से आप जो भी पहला आर्डर देंगे, वो मुफ्त होगा। मुझे जानकारी देने के बाद कोमल ऑटो में बैठी बाक़ी महिलाओं से भी वही सवाल पूछने लगी। एक महिला ने कहा कि वो जहाँ काम करती है, वहां भी उन्होंने 'ई-रेस्ट्रॉन्ट' नाम की एक एप्प बनायीं है। सुनकर मुझे हँसी आ गयी। सोचा कि मैं भी बोल ही दूँ कि मैं भी 'ई-गव' मैगज़ीन में काम करती हूँ, फिर लगा कि अगर बात बढ़ती है तो उन दोनों का समय जाया होगा। कुछ नहीं कहा।

सब कुछ 'ई' ही हो रहा है आजकल भारत में। वैसे 'ई' के दो मायने हो सकते हैं। पहला ये कि सब कुछ इलेक्ट्रॉनिक हो रहा है, डिजिटल इंडिया बन रहा है। दूसरा ये कि देखो ई क्या हो रहा है, लालू जी की भाषा में। असल में ये सब साइंस के साइंस हैं।

अब आप रेस्ट्रॉन्ट में जाकर बस बैठ जाइए। इंसान नहीं, अब सब कुछ मोबाइल करेगा। बहरहाल, सोचने वाली बात बस इतनी है कि ये साइंस कहीं इंसान को ही मशीन न कर दे। अब शायद यही बाक़ी रह गया है बस।

ख़ैर, जब जो होगा तब वो देखेंगे। फिलहाल कोमल और माहेश्वरी के लिए ढेर सारी शुभकामनायें। आप भी दुआ कीजिये कि उन दोनों की मेहनत जल्दी ही सफल हो। फायदा आपका ही है, ऐप्प से पहला आर्डर करने पर खाना जो मुफ्त मिलेगा। 

Tuesday, 9 June 2015

तुम और मैं

ये क्या लिखा है तुमने? क्यों क़त्ल-ए-आम कर रही हो?
किस बारे में फ़रमा रहे हैं जनाब? ज़रा तफ्सील में बताइये।

पढ़ो, ये तुमने ही लिखा है न?  इतनी जल्दी भूल भी गयीं?
हाँ, लिखा तो मैंने ही है।

क्यों लिखा है? ऐसा ख़याल आया भी कैसे तुम्हें?
क्यों? किसी ने कुछ कहा क्या?

कौन क्या कहेगा?
कोई कुछ भी कह सकता है।

ख़ैर अब ये बताओ कि ये ख़याल आया कैसे?
अरे! ख़याल ही तो है। किसी से पूछकर थोड़े ही आएगा।

 हम्म। तुम्हें अपने धैर्य की सीमा बढ़ानी चाहिए।
मैं वाक़िफ़ हूँ। तुम न बताओ।

अच्छा ठीक है। गलती हो गई। अब कुछ नहीं कहूँगा।
अरे! मेरा वो मतलब नहीं था।

जो भी था। मैं बस तुम्हें समझा रहा था। बाक़ी तुम्हारी मर्ज़ी।
हम्म। वैसे तुम जो समझाना चाहते हो, वो सब मैं पहले से समझती हूँ, बस स्वीकार नहीं कर पा रही हूँ।

अच्छा!  कोई बात नहीं। अकसर ऐसा होता है, मगर तुम निराश मत हो।
हम्म। कोशिश  तो जारी है। उम्मीद है बहुत जल्द वक़्त बहुत कुछ सिखा देगा। लेकिन फिर भी धैर्य रखना अलग बात है और ग़लत चीज़ बर्दाश्त करना अलग।

क्या ग़लत हुआ?
कुछ भी नहीं।

बताओ मुझे।
मेरी नज़र से देखने का साहस है?

उफ्फ़, तुम पागल हो।
जानती हूँ।

तुम नहीं सुधरोगी।
ये तो तुम भी जानते हो।

यूँ बहलाओ मत। ठीक-ठीक बताओ क्या हुआ है?
तुम्हें बताना मुनासिब नहीं।

क्यों ?
तुम पर ऐतबार नहीं।

ऐसा क्या गुनाह किया मैंने?
सोचोगे तो समझ भी जाओगे।

कहीं तुम्हें पागलख़ाने की ज़रुरत तो नहीं?
नहीं, बस इश्क़ .................................. (ख़ामोशी)

क्या?
कुछ भी तो नहीं।