Sunday, 15 July 2018

इश्क़-ए-चाय

उस कप को और हर सुबह ठीक साढ़े दस बजे उसमें डलने वाली चाय को शायद उसके होठों का ज़ायका बेहद पसंद था।

पहली बार दंसवी कक्षा में उसके होठों ने चाय को चूमा था और उसके बाद साल-दर-साल उसकी चैय्यास बढ़ती चली गई। धीरे-धीरे चाय के लिए उसका जूनून बढ़ रहा था पर इस बात का एहसास उसे नौकरी का तनाव झेलने के बाद हुआ। अक्सर लोगों को ये देर से समझ में आता है कि वे इश्क़ में हैं। 

उसे चाय से बेइन्तेहाँ मुहब्बत थी। पर उस दिन उसने तय किया कि वो दफ़्तर पहुँच कर चाय नहीं पियेगी। 

वो पहुँची, उसने कंप्यूटर ऑन किया और काम करने लगी। इतना मशगूल हो गई कि नज़र डेस्क पर सामने रखे कप पर पड़ी तक नहीं । 

साढ़े दस बजे, सवा ग्यारह भी और आख़िर में साढ़े ग्यारह बजे उसके कानों को एक आवाज़ ने छुआ, "मैडम आज आप चाय नहीं पियेंगी?"

"नहीं, मन नहीं है।"

"अरे मैडम! चाय बुरा मान जाएगी।"

"अरे भैया! आप भी ना। चलिए ठीक है ले आइये एक चाय," उसने हँसते हुए पैंट्री वाले को पैसे दिए और फिर काम में लग गई।

चाय के आने तक एसी की ठंडक ने उसे जकड़ लिया था। ज़ुखाम और बढ़ गया था। आँखें जल रही थीं। बुख़ार जिस्म तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था। 

उसे चाय से बेइन्तेहाँ मुहब्बत थी। पर उस दिन उसने तय किया कि वो दफ़्तर पहुँच कर चाय नहीं पियेगी। 

पैंट्री वाला चाय कप में डालकर जा चुका था। पर वो काम के चलते उसे तवज्जो देना भूल गई। 

अचानक उसकी सीट के पास लगे पंखे ने दिशा बदली और एक हवा के झोंके से चाय की ख़ुशबू उसकी नाक से टकराई। उसे महसूस हुआ कि चाय कप में पड़ी-पड़ी उसके होठों को तक रही है। उसने तुरंत मुस्कुराते हुए कप उठाया और इश्क़-ए-चाय मुक़म्मल हुआ। उसके होठों की लाली ने उस कप की तलब को तसल्ली दी जो महीनों से उनके कोमल स्पर्श की आदि थी।  

जिस्म को जब चाय की गर्मी मिली तो बुख़ार ने किनारा कर लिया। वो फिर काम में व्यस्त हो गई। दिन बीत गया और शाम को जल्दी घर जाने के कारण वो डेस्क पर झूठा कप ही छोड़ गई। 

रात को सोने से पहले अलार्म लगाने के लिए मोबाइल उठाया तो व्हाट्सएप्प पर कुछ सन्देश आये हुए थे। एक मैसेज उसका भी था। लाल लिपस्टिक के निशान को फोकस करते हुए उसने उसके कप की एक फोटो खींचकर उसे भेजी थी। मैसेज में लिखा था "तुम नहीं सुधरोगी।" वो दफ़्तर में उसकी आख़िरी नाईट शिफ्ट थी। 

अगले दिन उसके डेस्क पर उस लिपस्टिक लगे कप की जगह उसका कप रखा था।