Sunday, 31 July 2016

संवर रहा है उत्तर प्रदेश, बता रहे हैं अखिलेश।

पिछले रविवार को मेरे घर पे अख़बार के साथ एक सप्लिमेंट आया। उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी ने उस 22 पन्नों के बुकलेट में अपनी उपलब्धियाँ गिनवाई हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

* समाजवादी पेंशन योजना- ग्रामीण उत्तर प्रदेश के ग़रीब परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से समाजवादी पेंशन के रूप में सरकार द्वारा उनके बैंक खाते में पाँच सौ रुपये की प्रतिमाह पेंशन।
* मुफ्त लैपटॉप- लगभग पंद्रह लाख ऐसे बालक एवं बालिकाओं को, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली है।
* 1090 विमेन हेल्पलाइन- इस पावर लाइन की शुरुआत महिलाओं को फ़ोन पर परेशान करना, अश्लील सन्देश भेजना, राह चलते उन्हें परेशान करना जैसे अपराधों को रोकने के लिए की गई है।
* किसानों का सशक्तिकरण- किसानों को न सिर्फ नहरों से सिंचाई की मुफ्त सुविधा दी जा रही है, बल्कि उन्हें मुफ्त बीज के साथ-साथ उर्वरक एवं खाद भी उपलब्ध कराई जा रही है।

इनके अलावा भी कुछ और चीज़ें लिखी गई हैं उस बुकलेट में, सब कुछ यहाँ लिखना संभव नहीं। लेकिन समझ में ये नहीं आता कि इतना कुछ कर कब दिया मंत्री जी ने। ख़ैर, कुछ मोटी-मोटी लाइनें और भी लिखी हैं।

* लखनऊ को देने रफ़्तार, हो रही मेट्रो तैयार 
* एक्सप्रेस-वेज़ से मिलेगी उत्तर प्रदेश की प्रगति को गति 
* ग्रामीण 'विकास' के वादे हुए पूरे 
* कौशल 'विकास' के पथ पर निरंतर अग्रसर उत्तर प्रदेश 
* उत्तर प्रदेश में अद्वितीय औद्योगिक 'विकास' के चार वर्ष 
* चार वर्षों की अवधि में राज्य सरकार ने ऊर्जा क्षेत्र में किया उल्लेखनीय सुधार 
* यू. पी. पर्यटन को भरपूर प्रोत्साहन 

इन्हीं मुद्दों का थोड़ा तफ्सील में वर्णन किया गया है। मज़े की बात ये है कि हमारे देश में "विकास" सबका चाहिता है। विकास का होना बहुत ज़रूरी है, फिर चाहें सरकार मोदी जी की हो या अखिलेश जी की या किसी और की भी। बुकलेट का थीम है "विकास के चार वर्ष।" जब इस पर नज़र पड़ी तो हँसी रुक ही नहीं पायी। शायद मंत्री जी को मालूम नहीं है कि विकास कभी यूपी की सड़कों के ट्रैफिक जैम में फस जाता है, तो कभी नॉएडा और वैशाली के गड्ढों में डूबता दिखाई देता है, या कभी वसुंधरा के कूड़े के ढेर में सड़ रहा होता है। उम्मीद है कि राज्य में और भी कई ऐसे इलाके होंगे जिनमें विकास अपना ये रूप दिखा रहा होगा।

जैसे-जैसे मेरी उँगलियाँ उस बुकलेट के पन्नों को पलट रहीं थीं, मेरी उलझनें भी बढ़ती जा रहीं थीं। इतने बारीक़ अक्षरों में न जाने क्या-क्या लिखा हुआ था। पढ़ने की इच्छा नहीं हुई। मगर जितना भी पढ़ा उस पे कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं है। और वैसे भी किसी भी प्रतिक्रिया से किसको क्या फ़र्क पड़ता है।

बात दरअसल ये है कि उस बुकलेट के पहले पन्ने पर ही एक दिलचस्प कविता लिखी हुई थी। शीर्षक था -"उम्मीदों का उत्तर प्रदेश।" कविता की पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं (मेरी समझ के विष्लेषण के साथ):

बदल रही है तस्वीर यहाँ की,
बदल रहा है भेष। 
फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(बात तो बिलकुल सही है। गौ-रक्षक बीफ खाने वालों को पीट-पीट कर उनका भेष बदल देते हैं इस प्रदेश में। अख़लाक़ जैसे लोग मर जाते हैं, इस बात का फ़क्र तो होना ही चाहिए। इसी प्रकार की करतूतों से इस राज्य की तस्वीर बदल रही है। देखते हैं और कितना बदलना बाक़ी है।)

फ़ासले मिनटों में सिमट रहे,
एम्बुलेंस झटपट जान बचाती है। 
विकास ही नहीं खुशियों में भी,
हो रहा निवेश। 

फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(जैसे ग़ाज़ियाबाद से नोएडा तो हम बस दस मिनटों में पहुँच जाते हैं और एम्बुलेंस उड़ कर मरीज़ के पास पहुँच जाती है, इस हद तक ये प्रदेश तरक़्क़ी कर चुका है। इसके अलावा सैफई के त्यौहार को देखकर पता चल ही जाता है कि मंत्री जी की खुशियों में सम्पूर्ण निवेश हो ही रहा है, तो फ़क्र होना ज़रूरी है भाई। वो अकेले क्यों फ़क्र करें, आपकी इच्छा है तो आप भी उनका साथ दे सकते हैं। )

 वृद्ध आत्मनिर्भरता से जी रहे,
महिलाएँ बेख़ौफ़ बाहर जाती हैं। 
फ़ैल रहा है चारों ओर,
खुशियों का सन्देश। 

फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(उम्मीद हैं मंत्री जी की पेंशन योजना वृद्धों का उद्धार कर ही रही होगी। साफ़ कर दूँ कि किसी वृद्ध से मेरी कोई चर्चा नहीं हुई है इस विषय पर। लेकिन महिलाएँ बेख़ौफ़? उत्तर प्रदेश में? बदायूं गैंगरेप तो गुजरात में नहीं हुआ था शायद। और जहाँ तक मुझे याद है स्नैपडील में काम करने वाली दीप्ति सरना भी हरियाणा से किडनैप नहीं हुई थी। पर क्या पता मीडिया वालों ने ही ग़लत खबर दिखा दी हो। वैसे भी आजकल मंत्रियों से ज़्यादा मीडिया बदनाम है। शायद मंत्री जी को इसी बात का फ़क्र है। आख़िर वो राज्य के मुख्यमंत्री हैं, ख़ुशफ़हमी तो होनी ही चाहिए न।)

भाईचारा हवा में घुल रहा,
सौ हाथ मदद को बढ़ते हैं। 
मिल रहे दिल और अमन का,
हो रहा प्रवेश।  

फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(ये भूलना मुश्किल है कि मुज़फ्फरनगर और बरेली के दंगों ने भाईचारे की कितनी अच्छी मिसाल क़ायम की है। बावरी मस्जिद और राम मंदिर से जो अमन स्थापित हुआ है पिछले कुछ सालों में, वो तो फ़क्र करने लायक ही है। अख़लाक़ के परिवार के सिर्फ सात सदस्यों के ख़िलाफ़ एफआईआर करवा उसके घरवालों की ज़िन्दगी भी संवार दी है मंत्री जी ने। क्या अब उन्हें इस बात का फ़क्र है कि इस बार कुछ ब्राह्मण वोट भी इखट्टे हो जाएंगे?)

पर्यटन दिन-ब-दिन बढ़ रहा,
अब स्मार्ट सिटीज़ की तैयारी है। 
बदलाव की इस लहर को,
देख रहा है देश। 

फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(मंत्री जी शायद शुक्रगुज़ार हों मुग़लों के जिनके नाम पर उनके राज्य में इतने पर्यटन स्थल बने हुए हैं। मग़र ये यक़ीन करना बहुत मुश्किल है कि इस जन्म में हम उत्तर प्रदेश में स्मार्ट सिटी देख पाएंगे। बहरहाल, मुझे फिलहाल ये नहीं पता कि किस बदलाव की लहर को देखने की बात हो रही है- स्मार्ट सिटी के खोखले वादे या रेलवे स्टेशनों और नुक्कड़ों पर मौजूद 'स्मार्ट' कचरा। कभी मौक़ा मिले तो पूछा जाए।)

पता नहीं क्यों मुझे उस शख़्स पर तरस आ रहा है जिसने ये कविता लिखी होगी। जो बातें मेरे ज़ेहन में हैं क्या वो उनसे वंचित होगा? हर वो नागरिक जिसने वो बुकलेट पढ़ा होगा क्या वो मेरी यहाँ लिखी बातों से इत्तेफ़ाक रखेगा ?

चुनाव नज़दीक हैं। वोट माँगने की तैयारी अभी से ही करनी पड़ेगी। इस दिशा में ये बुकलेट शायद मंत्री जी का पहला क़दम है। आगे आने वाली नीतियों का इंतज़ार रहेगा। धन्यवाद। 

संवर रहा है उत्तर प्रदेश,
बता रहे हैं अखिलेश। 

Thursday, 28 July 2016

वो कहाँ चलीं गईं ?

बात दो साल पुरानी है। मैं तब गुड़गाँव में स्थित एक विशाल और बेहद शानदार बिल्डिंग "टाइम्स इंटरनेट" में इंटरव्यू देने गयी थी।

पहुँचते ही एचआर से मुलाक़ात हुई। उन्होंने मुझे इंतज़ार करने को कहा और मेरे लिए टेस्ट पेपर लेने चली गईं। मैं चुपचाप अपने सामने बैठे बाक़ी के इंटरव्यू देने आये लोगों को देखने लगी। वे सभी काफ़ी अनुभवी मालूम होते थे। शायद मैं ही सबसे छोटी थी वहाँ।

अभी ये सब सोचकर डर महसूस होना शुरू ही हुआ था कि अचानक एक महिला पर नज़र पड़ी। बहुत ही खुशमिज़ाज़ मालूम होती थीं वो। मेरा ध्यान बार-बार उनकी ओर जा रहा था।

मैंने उन्हें तराशना शुरू किया ही था कि एचआर टेस्ट पेपर लेकर आ गयी। हमारे हाथों में  उन्हें थमा दिया गया और नीचे जाकर हमें एक कमरे में बैठने को कहा गया। हम केवल चार या छह लोग होंगे लेकिन वो कमरा बहुत बड़ा था।

हम सबने पेपर लिखना शुरू किया। कमरे में घोर सन्नाटा था। वो महिला लेकिन उस सन्नाटे की खामोशी को तोड़ रही थीं। कुछ ढूँढ रहीं थीं अपने बैग में, शायद पेन।

सारी मशक़्क़त करने के बाद उन्होंने पूछ ही लिया, "एनीवन हैज़ गॉट एन एक्स्ट्रा पेन?"

सबकी नज़रें उन पर थीं। मैंने तुरंत अपनी सीट से उठकर उनके पास जाकर उन्हें पेन दे दिया। बड़े दिल से उन्होंने मेरा धन्यवाद किया। मैं वापिस अपनी सीट पर बैठकर टेस्ट करने लगी।

कुछ घंटे बीत गए थे। लोग कमरा छोड़कर जाने लगे थे। आख़िर में वहाँ तीन ही लोग बचे थे- मैं, वो महिला और एक पुरुष और।

मैं तेज़ी से अपना टेस्ट ख़त्म करने की कोशिश कर रही थी। थोड़ी देर बाद मेरा टेस्ट ख़त्म हुआ और  मैं अपना सामान उठकर जाने लगी। सहसा याद आया कि मेरा पेन उस महिला के पास है।

मैं वहीँ खड़ी होकर इंतज़ार करने लगी और उनकी ओर देखने लगी। हाँलाकि एक पेन दान देने में कोई हर्ज नहीं था, लेकिन अगर मैं वहाँ खड़ी ना रहती तो हम शायद इतने अच्छे दोस्त नहीं बन पाते, जितने कि आज बन गए हैं।

आज वो ख़ासतौर पर मुझसे मिलने आयीं थीं। टाइम्स इन्टरनेट में हुई मुलाक़ात के बाद आज हम दूसरी बार मिल रहे थे। इस बीच फेसबुक और व्हाट्सएप्प ने हमें जोड़े रखने में काफ़ी मदद की।

दो सालों में बहुत कुछ बदल गया था। जिन श्वेता से मैं तब मिली थी वो तो किसी हँसते-खेलते छोटे से बच्चे की तरह थीं। तब हम अजनबी थे लेकिन जितने प्यार से उन्होंने मुझे तब गले लगाया था, वो आज मौजूद नहीं था।

उस दिन किसी बात पर वो कहना चाह रहीं थीं, "माय हस्बैंड इज़...... "

"हस्बैंड?" इसे पहले कि उनका  वाक्य  पूरा होता मैंने बड़े अचंभे से पूछा था।

"हाँ। " ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा था।

"आप मैरिड हो ?" और भी आश्चर्य के साथ मैंने पूछा था।

"हाँ।" ज़ोर से हँसते हुए उन्होंने कहा था।

"आप तो शादीशुदा लगती ही नहीं हो।" मैंने फिर अचम्भे में कहा था।

"वाओ! दैट्स सच आ लवली कॉम्प्लिमेंट। आई विल टेल दिस टू मय हस्बैंड।" उन्होंने हँसते हुए कहा और मुझे गाला लगा लिया था।

एक पल को मुझे ऐसा लगा था जैसे वो अजनबी हैं ही नहीं।

आज मग़र एक-दूसरे को जानते हुए भी मैं उन्हें अजनबी-सा महसूस कर रही थी। वो जब से आईं थीं, कुछ-कुछ बोलती जा रहीं थीं। मेरे ज़ेहन में ख़याल कुछ ऐसा था कि जब वो आएँगी तो हम घंटों बातें करेंगे, खूब मस्ती करेंगे ,सेल्फियाँ खिंचवा-खिंचवा के फेसबुक पर अप्लोड करेंगे।

अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं हुआ। वो जब लगातार बोलती जा रही थीं, बीच में किसी का फ़ोन आया। वो फ़ोन पर बात करने लगीं और मैं उनकी आँखों में, उनकी बातों में, उनकी वो पुरानी अजनबी शख़्सियत तलाशने की कोशिश करने लगी जो उस दिन एक पल में मेरी दोस्त बन गई थी। कोफ़्त इस बात का हुआ कि वो मुझे नहीं मिली।

"आपको कुछ हो गया है।" उनके फ़ोन रखते ही मैंने उनसे कहा।

"हेहे! काम की टेंशन है यार।" एक फ़र्ज़ी सी हंसी दिखा दी उन्होंने मुझे अपने होठों पर।

"आपकी आँखों से मैं पकड़ पा रही हूँ कि कुछ तो तक़लीफ़ है।" मैंने ज़ोर देते हुए कहा।

"पकड़ा तो तुमने बिल्कुल सही है।" फिर से उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, आँखों में आये सैलाब को उँगलियों से रोकते हुए।

कुछ तो था जो शायद वो मुझे दोस्त के नाते बता सकतीं थीं पर बंदिश तो हर रिश्ते में होती ही है। शायद हमारे रिश्ते की भी कोई हद ज़रूर होगी। उसी को निभाते हुए वो फिर मुस्कुराईं और जाने के लिए कहने लगीं। मैंने भी रुकने को नहीं कहा।

हज़ारों सवाल और ख़याल मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में दौड़ रहे थे उस पल। लेकिन होठों को जैसे शब्द ही नहीं मिल रहे थे। मैं चुप थी। मन ही मन दुआ कर रही थी कि उनकी तक़लीफ़ की जो भी वजह है वो बस ख़त्म हो जाए।

जाते वक़्त उन्होंने फिर मुझे गले लगाया मगर आज वो बात थी ही नहीं जो दो साल पहले थी। न जाने क्या हो गया है उनको? पहले से काफ़ी बदल गईं हैं।

वैसे तो वक़्त बदल गया है।  मैं ख़ुद भी बहुत बदल गई हूँ, तो फिर उनके बदले मिजाज़ से इतनी हैरत क्यों?

ज़िन्दगी ऐसी ही होती है शायद। हर दिन अच्छा नहीं होता और हर दूसरा दिन बुरा नहीं होता। हो सकता है उस वक़्त कोई वजह हो जो उन्हें परेशान कर रही हो पर मुझे इस बात की ख़ुशी होनी चाहिए कि उन्होंने बेहद मसरूफ होने के बावजूद मुझसे मिलने के लिए वक़्त निकाला और मैं खुश हूँ भी, बहुत खुश।

मगर वो जिनसे मिलने की मुझे उम्मीद थी वो कहाँ चली गईं ? क्या वो वापिस आएँगी? इस सवाल का जवाब कौन देगा ?