Monday, 24 December 2018

सुनो, मैं जा रही हूँ।

"सुनो।"
"जी बोलिये।"

"मैं जा रही हूँ।"
"कहाँ?"

"तुम्हें छोड़कर।"
"अरे! पर कहाँ?"

"इससे तुम्हें क्या?"
"शादी कर रही हो क्या ?"

"इससे भी तुम्हें क्या ?"
"अरे! दोस्तों को तो बता ही सकते हैं।"

"तुम मेरे दोस्त नहीं हो।"
"अब बता भी दो। मैं कौन-सा कुछ बिगाड़ दूंगा?"

"अब इससे ज़्यादा क्या बिगाड़ोगे ?"
"बताओ भी।"

"बताना महज़ इतना है कि अब हम कभी नहीं मिलेंगे।"
"मग़र क्यों ?"

"क्योंकि ये दुनिया बहुत बड़ी है और हम दोनों के पास वक़्त बहुत कम है।"
"पर क्या हम दोस्त नहीं रह सकते ?"

उसने उसके आख़िरी सवाल का जवाब नहीं दिया। जवाब शायद उसे मालूम था। 

आज भी कई सवाल उसके दिमाग की नसों में रेंगते रहते हैं, क़िस्मत शायद जिनके जवाब तलाश रही है।  

Sunday, 15 July 2018

इश्क़-ए-चाय

उस कप को और हर सुबह ठीक साढ़े दस बजे उसमें डलने वाली चाय को शायद उसके होठों का ज़ायका बेहद पसंद था।

पहली बार दंसवी कक्षा में उसके होठों ने चाय को चूमा था और उसके बाद साल-दर-साल उसकी चैय्यास बढ़ती चली गई। धीरे-धीरे चाय के लिए उसका जूनून बढ़ रहा था पर इस बात का एहसास उसे नौकरी का तनाव झेलने के बाद हुआ। अक्सर लोगों को ये देर से समझ में आता है कि वे इश्क़ में हैं। 

उसे चाय से बेइन्तेहाँ मुहब्बत थी। पर उस दिन उसने तय किया कि वो दफ़्तर पहुँच कर चाय नहीं पियेगी। 

वो पहुँची, उसने कंप्यूटर ऑन किया और काम करने लगी। इतना मशगूल हो गई कि नज़र डेस्क पर सामने रखे कप पर पड़ी तक नहीं । 

साढ़े दस बजे, सवा ग्यारह भी और आख़िर में साढ़े ग्यारह बजे उसके कानों को एक आवाज़ ने छुआ, "मैडम आज आप चाय नहीं पियेंगी?"

"नहीं, मन नहीं है।"

"अरे मैडम! चाय बुरा मान जाएगी।"

"अरे भैया! आप भी ना। चलिए ठीक है ले आइये एक चाय," उसने हँसते हुए पैंट्री वाले को पैसे दिए और फिर काम में लग गई।

चाय के आने तक एसी की ठंडक ने उसे जकड़ लिया था। ज़ुखाम और बढ़ गया था। आँखें जल रही थीं। बुख़ार जिस्म तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था। 

उसे चाय से बेइन्तेहाँ मुहब्बत थी। पर उस दिन उसने तय किया कि वो दफ़्तर पहुँच कर चाय नहीं पियेगी। 

पैंट्री वाला चाय कप में डालकर जा चुका था। पर वो काम के चलते उसे तवज्जो देना भूल गई। 

अचानक उसकी सीट के पास लगे पंखे ने दिशा बदली और एक हवा के झोंके से चाय की ख़ुशबू उसकी नाक से टकराई। उसे महसूस हुआ कि चाय कप में पड़ी-पड़ी उसके होठों को तक रही है। उसने तुरंत मुस्कुराते हुए कप उठाया और इश्क़-ए-चाय मुक़म्मल हुआ। उसके होठों की लाली ने उस कप की तलब को तसल्ली दी जो महीनों से उनके कोमल स्पर्श की आदि थी।  

जिस्म को जब चाय की गर्मी मिली तो बुख़ार ने किनारा कर लिया। वो फिर काम में व्यस्त हो गई। दिन बीत गया और शाम को जल्दी घर जाने के कारण वो डेस्क पर झूठा कप ही छोड़ गई। 

रात को सोने से पहले अलार्म लगाने के लिए मोबाइल उठाया तो व्हाट्सएप्प पर कुछ सन्देश आये हुए थे। एक मैसेज उसका भी था। लाल लिपस्टिक के निशान को फोकस करते हुए उसने उसके कप की एक फोटो खींचकर उसे भेजी थी। मैसेज में लिखा था "तुम नहीं सुधरोगी।" वो दफ़्तर में उसकी आख़िरी नाईट शिफ्ट थी। 

अगले दिन उसके डेस्क पर उस लिपस्टिक लगे कप की जगह उसका कप रखा था। 


Tuesday, 29 May 2018

स्टोरी

"यार तुम पत्रकार भारतीय रेल की बुरी हालत पर कोई स्टोरी क्यों नहीं करते?"
"माफ़ कीजियेगा मोहतरमा, ये मेरी बीट नहीं है।"

"अरे इतने बड़े पत्रकार हो, किसी बीट वाले को ढूंढ़ो। मुझे पता है तुम अगर स्टोरी कर नहीं सकते तो कम से कम करवा तो ज़रूर सकते हो।"
"तुम बड़ा जानती हो मुझे।"

"और नहीं तो क्या।"
"वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि आपके आयडल मशहूर पत्रकार रविश कुमार जी ने अपने प्राइम टाइम में इंडियन रेलवेज़ पर एक पूरी सिरीज़ की है।"

"मुझे पता है। पर अफ़सोस मैंने उसका एक भी एपिसोड नहीं देख पाया।"
"ओह! क्यों?"

"कुछ महीनों से टीवी ख़राब है और ज़िंदगी में मसरूफ़ियत इतनी है कि बेचारे को ठीक करवाने का समय ही नहीं मिलता। अब यूट्यूब पर देखूंगी। "
"हम्म! बात तो सही कह रही हो तुम। हर कोई बड़ा बिज़ी है आजकल।"

"हां, तुम्हें कब मेरी कोई बात लगती है।"
"तुम कभी कुछ ग़लत कहती ही नहीं।"

"हां, तो मानो मेरी बात। करवा दो एक और स्टोरी।"
"पर कहानी है क्या?"

ये जो दूर तक ले जाने वाली रेलगाड़ियां हर रोज़ लेट होती हैं, इनके कारण सभी लोकल ट्रेनें भी देरी से चलती हैं और दिल्ली के दफ़्तरों में जाने वाले डेली कम्मयूटर्स बहुत परेशान होते हैं। 

"ये जो दूर तक ले जाने वाली रेलगाड़ियां हर रोज़ लेट होती हैं, इनके कारण सभी लोकल ट्रेनें भी देरी से चलती हैं और दिल्ली के दफ़्तरों में जाने वाले डेली कम्मयूटर्स बहुत परेशान होते हैं।"
"ये तो होगा ही। ज़ाहिर-सी बात है। पर लगता है तुम सबसे ज़्यादा परेशान होती हो।"

"मैं भला क्यों परेशान होंगी? मैं तो मेट्रो में चलती हूं ना।"
"हां, तुम्हारे माथे पर शिकन तो सिर्फ़ उस एक लम्हे में आती है जब तुम हर सुबह उस लोकल ट्रेन से उतरकर अपने पांव मेरे दफ़्तर ले जाने वाले मोड़ की ओर बढ़ाती हो और मुझसे मिले बिना ही चली जाती हो।"

Sunday, 1 April 2018

8:20 वाली लोकल का सफ़र

सुबह के आठ बजकर छत्तीस मिनट हो रहे हैं। मैं इस वक़्त ग़ाज़ियाबाद से चलकर नई दिल्ली तक जाने वाली एक लोकल ईएमयू ट्रेन में बैठकर दफ़्तर जा रही हूँ। हाथों में एक काग़ज़ का टुकड़ा और लाल रंग की कलम लिए, कानों में इयरफोन लगाए मैं इस गाड़ी के महिला डिब्बे में एक खिड़की वाली सीट के पास किसी चट्टान की तरह अडिग बैठी हुई हूँ। एक ग़ज़ल जो मेरे कानों में बज रही है आज मुझे कुछ ख़ास अच्छी नहीं लग रही।

इस ट्रेन के बाहर मैं कुछ ढूंढ़ रही हूँ --  शायद सुकून। अफ़सोस कि खिड़की से बाहर दिखने वाले ये नज़ारे मुझे मेरे ज़िंदा होने का एहसास नहीं दिला पा रहे। मैं कुछ लिख रही हूँ पर मेरे हाथ काँप रहे हैं। लग रहा है जैसे ये कलम मेरे हाथ से छूटकर अभी नीचे गिर जाएगी।

सहसा वो ग़ज़ल जो मेरे कानों में चिल्ला रही थी, ख़त्म हो चुकी है। अब एक नया गाना बज रहा है। मुझे इन गानों की हेर-फेर तो समझ आ रही है, लेकिन मैं इन्हें सुनकर भी सुन नहीं पा रही हूँ। ये सिर्फ इसलिए चल रहे हैं क्योंकि मैं शायद इस दुनिया से भागने का कोई रास्ता तलाश रही हूँ।

अचानक अपनी आँखों में मुझे पत्थर से चुभते महसूस हो रहे हैं। अरे नहीं! ये तो मेरे आँसूं हैं।

हाँ, एक आँसूं अभी-अभी इसी कागज़ पर टपका जिसपे मैं पिछले दस मिनट से अपने मन का ग़ुबार उतारने की कोशिश कर रही हूँ। मगर मैंने ऐसी कोई बात नहीं लिखी है जो सचमुच "बात" हो। मैं सिर्फ़ कुछ हर्फ़ों का अपनी कलम की नोक तले क़त्ल कर रही हूँ।

दो स्टेशन जा चुके हैं। तीसरे स्टेशन से भी अब गाड़ी चल पड़ी है।
 मैं अभी तक समझ नहीं पा रही हूँ कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ। 

दो स्टेशन जा चुके हैं। तीसरे स्टेशन से भी अब गाड़ी चल पड़ी है। मैं अभी तक समझ नहीं पा रही हूँ कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ। लिखते-लिखते हर दो सेकेंड बाद मेरी निगाहें फिर इस गाड़ी की खिड़की के बाहर तकती जा रही हैं, पर बाहर का कोई भी मंज़र मुझे इस कागज़ पर उतारने लायक नहीं लगता।

आखिर क्या लिखूं? इस खिलखिलाती धूप की किरणें, इन पेड़ों की घनी छाया, इस छुक-छुक करती रेलगाड़ी का कान-फोड़ता शोर, पटरियों पर लावारिस से बिछे ये पत्थर या अगले पांच मिनट में जिस यमुना नदी का मुझे दीदार होने को है -- उसका नदी से गटर बनने तक का सफ़र ?

 मैं हर रोज़ ही यमुना को तकती हूँ। पता नहीं मुझे इसमें क्या इतना अच्छा लगता है।

फिलहाल वो पांच मिनट बीत गए हैं और यमुना के काले पानी में मेरी निगाहें गड़ी हुई हैं। ये गाड़ी इस वक़्त यमुना के ऊपर से गुज़र रही है और धीरे-धीरे ये दिलवालों की यमुना मेरी आँखों से ओझल होती जा रही है।

यमुना पार कर एक स्टेशन आया है। इस के बाद वाले स्टेशन पर मुझे उतरना है।

मेरे आस-पास कुछ लोग हैं जो काफ़ी देर से मेरे हाथ में महफ़ूज़ इस कागज़ और कलम को देख रहे हैं। एक माहिला ने मेरे इस काग़ज़ में झाँककर कुछ समझने की कोशिश भी की है। पर उसकी क़िस्मत ख़राब है शायद क्योंकि अब से कुछ घंटों बाद ये अपना लिखा मैं ख़ुद भी नहीं पहचान पाऊँगी।

अचानक मेरे ज़हन में एक सवाल आया है। "क्या ये लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि पिछले आधे घंटे से मैं क्या लिखती चली जा रहो हूँ?"

 जवाब नहीं है मेरे पास।

यमुना को पीछे छोड़ हम जिस स्टेशन पर पहुँचे हैं, वहाँ  कुछ महिलाएँ उतर गईं हैं। ये डब्बा आधा खाली हो गया है। अब अगले स्टेशन पर मुझे भी उतरना है।

गाड़ी फिर से चल दी है। दो मिनट बाद मेरा स्टेशन आ जाएगा। मैंने फिर खिड़की के बाहर झाँकना शुरू कर दिया है। मैं शायद फिर इन हवाओं में -- जो मेरे चेहरे को छूकर गुज़र रही हैं, मेरी लटों को बार-बार मेरे माथे पर ला रही हैं --  एक आखिरी बार अपने होने के एहसास को पाने की कोशिश कर रही हूँ।

इस एहसास को खोजते-खोजते मुझे एकदम प्रतीत हुआ है कि गाड़ी रुक गई है। और इसी के साथ मेरी कलम भी।

समय हो रहा है नौ बजकर पांच मिनट। मैं अब ट्रेन से उतर रही हूँ। मेरे कदम दफ़्तर की ओर बढ़ रहे हैं उसी ख़याल को ज़हन में किसी बोझ की तरह ढोए जिसे लिखने के लिए मैंने ये काग़ज़ और कलम निकली थी, मगर कुछ नहीं लिखा।

और हाँ! वो आँसूं जो इस काग़ज़ पर टपका था, उसकी  वजह मुझे अब तक नहीं मालूम।

बहरहाल, मेरी प्लेलिस्ट में अगला गाना आ गया है -- "एक हो गए हम और तुम......... हम्मा हम्मा हम्मा।"

Saturday, 3 February 2018

शहर और मोहब्बत

हम सभी का जन्म किसी शहर, गाँव या ज़िले में हुआ है। मेरे इस लेख में शहर का ज़िक्र है क्योंकि मेरा जन्म शहर में हुआ है। अगर आप इसे पढ़ रहे हैं तो इसे उस जगह से जोड़कर पढ़िए जहाँ आपका जन्म हुआ है।

ये ज़ाहिर- सी बात है कि मैं, आप, हम सभी किसी न किसी शहर में तो जन्मे हैं, पले-बढ़े हैं। इसी पलने-बढ़ने के दौरान हम अपने शहर की गलियों से वाक़िफ़ होने लगते हैं। हर रोज़ उन्हीं सड़कों पर चलना, एक ही चौराहे से गुज़रना, बसों और ऑटो में चढ़ना, पड़ोसियों से मिलना-जुलना, उन्हें जानना - ये सब हमें अपने शहर की मिटटी से जोड़ता है। और जब हम इस मिट्टी से जुड़ने लगते हैं, यक़ीनन हमें अपने शहर से प्यार होने लगता है।

एनसीआर - नेशनल कैपिटल रीजन - एक ऐसा इलाका है जिसमें कैपिटल है हमारी राजधानी दिल्ली और इससे जुड़े हुए हैं कुछ और शहर - ग़ाज़ियाबाद, नॉएडा, फरीदाबाद और गुड़गांव। इस एनसीआर की ख़ास बात ये है कि यहाँ किसी भी अजनबी से मुलाक़ात हो तो ये पता चलता है कि वो शख़्स अपना शहर छोड़कर यहाँ नौकरी करने के लिए आया है। हालाँकि कुछ और शहर जैसे सपनों की नगरी मुंबई, बंगलुरू और चेन्नई जैसे अन्य बड़े शहरों के पास भी ये विशेषाधिकार है।

मेरा वास्ता एनसीआर से है तो बात यहाँ की। मध्य प्रदेश, बंगाल, राजस्थान, असम, जम्मू कश्मीर, हरियाणा, पंजाब और लगभग हर राज्य से कोई ना कोई हमसे यहाँ टकरा ही जाता है। यहाँ तक कि बाहर देश के लोग भी। कितने लोग अपना वो शहर छोड़कर, जहाँ उनका जन्म हुआ, जहाँ उनका अपना घर है, माता-पिता हैं, भाई-बहन हैं, किसी दूसरे शहर में जीवन-यापन के साधन खोज उसमें इतना व्यस्त हो जाते हैं कि फिर शायद ही कुछ याद रह जाता है। ज़िन्दगी तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ने लगती है और सब कुछ ठीक ही मालूम होता दिखाई देता है।

हम नए शहर के रंग-ढंग में ढलने लगते हैं, चीज़ो को नए सिरे से देखने और समझने की कोशिश करने लगते हैं। कई बार सफल तो कई बार असफल हो जाते हैं।

रिवाज तो यही है कि शहरों में लोग बसते हैं, पर कभी-कभी लोगों में शहर भी बसता है। 

पर सौ बात की एक बात ये है कि कभी-कभी जब हम इस नए शहर से ऊब जाते हैं, तब ये होता है कि हमें अपना घर, अपना शहर, अपने लोग याद आने लगते हैं। ये एहसास होने लगता है कि हमारा शहर भी हमें उतना ही चाहता है जितना हम उसे आज तक चाहते आये हैं या इस पल से पहले कभी चाहते थे। ये वो पल होता है जब हमें ये लगने लगता है कि हमारा शहर हमें बुला रहा है - अभी, इसी वक़्त।

याद इतनी गहरी होती है कि बेक़रारी बढ़ने लगती है। पर ये बेक़रारी मिट तब जाती है जब इस नए शहर में कोई 'अपने' उस शहर वाला टकरा जाए जिसे हम छोड़कर आये हैं। वही अपनापन, वही मीठी बोली, वही व्यवहार - ये सब कुछ पल का सुकून मयस्सर कर देते हैं।

रिवाज तो यही है कि शहरों में लोग बसते हैं, पर कभी-कभी लोगों में शहर भी बसता है। जिन रास्तों, सड़कों, चौराहों, गलियों, मंदिर- मस्जिदों से हम वास्ता रखते हैं, वही वास्ता कोई और भी रखे तो हम अपने शहरीपन को और बेहतर महसूस कर सकते हैं, अपने भीतर अपने शहर की यादों से सदा अथक मोहब्बत कर सकते हैं और जब जैसे चाहें उसे जी सकते हैं।




Monday, 30 October 2017

प्यार

प्यार - एक छोटा-सा शब्द जो इंसान के जीवन की नींव है। इस शब्द के कई प्रकार हैं, ये आप लोगों के लिए कोई नयी बात नहीं होगी। सबसे पहले आता है माँ-बाप का प्यार, फिर भाई-बहन का, दोस्तों का, गुरु का, रिश्तेदारों का और जीवन में आने वाले न जाने किन-किन लोगों का। इन सबके अलावा एक और प्यार होता है जिसे हम तहज़ीब की भाषा में "इश्क़" कहते हैं। इससे भी आप सभी परिचित ही होंगे।

मगर आजकल के जिस दौर में हम 'इंसान' जी रहे हैं, उसमें इस प्यार के कुछ नए, अपग्रेडेड और इनोवेटिव रूप जुड़ गए हैं। उदाहरण के लिए सोशल मीडिया का प्यार, अपने मुंह मियाँ मिट्ठू प्यार, फॉर्मल्टी वाला प्यार, जिस्मानी प्यार, दिखावे वाला प्यार और सबसे दिलचस्प "हम तुमसे बहुत प्यार करते हैं" वाला प्यार।

ख़ुदा ने इस जहाँ में कुछ ऐसी शख़्सियतें भी बनायीं हैं जो जब भी किसी से प्यार करती हैं तो दुनिया भुला देती हैं। ये प्यार की वो श्रेणी है जिसमें प्यार का छल, कपट या स्वार्थ से किसी भी तरह का कोई भी वासता नहीं होता। उनके लिए प्यार सिर्फ प्यार होता है। दे आर सेल्फलेस सोल्स जिनके लिए प्यार का मतलब सिर्फ अपनों को ख़ुश देखना होता है। किसी को दिल से प्यार करने की इस पूरी प्रक्रिया में अगर कोई उनको "फॉर ग्रांटेड" भी ले ले तो भी उन्हें कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि वो साहसी होते हैं, कपट की घिनौनी दुनिया से बहुत ही दूर।

आज का ये दौर जहाँ अक्सर रिश्तों में प्यार सिर्फ़ अपना उल्लू सीधा करने तक सीमित रह गया है, या जहाँ इश्क़ की परिभाषा फ़्लर्टिंग में सिमट गई है -- यहाँ कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इस सबसे परे हटकर प्यार जताना जानते हैं, अपनापन साबित करना जानते हैं, ये यक़ीन दिलाना जानते हैं कि उनके लिए प्यार सिर्फ़ प्यार है न कि किसी के कंधे पर बन्दूक रख कर अपने स्वार्थों को पूरा करने का कोई ज़रिया।

"हम तुमसे बहुत प्यार करते हैं" वाले लोगों के लिए ये प्यार महज़ दूसरों का मज़ाक बनाने और अपना एंटरटेनमेंट करने का एक तरीक़ा होता है। उन्हें इस प्यार पर अट्टाहस करने की इस क़दर आदत हो जाती है कि वो भूल जाते हैं कि एक इंसान के जीवन में सच्चा महत्त्व रखने वाले इस ढाई अक्षर के शब्द की बेक़दरी करने में उन्हें सिर्फ़ ढाई मिनट लगे हैं।

किसी और के कन्धों का सहारा लेने वाले बुज़दिल होते हैं। जो साहसी होते हैं वो अपनी बात कहने का दम ख़ुद रखते हैं। अफ़सोस कि निशाना भी उन्हीं कन्धों को बनाया जाता है जिनमें बग़ावत करने का हौंसला होता है। क्योंकि जो बाग़ी होते हैं, वही सच्ची मोहब्बत करते हैं।

टेक्नोलॉजी और बिना अक्ल के की जाने वाली नकल ने भी प्यार शब्द की धज्जियां उड़ाने में क़ाफी योगदान दिया है। सोशल नेटवर्किंग, दिन-रात की चैटिंग, ऑनलाइन डेटिंग, सेक्सटिंग एंड मच मोर -- इन सब प्यार के दिखावों में लोग असली जज़्बातों को महसूस करना तो अक़्सर भूल ही जाते हैं।

दिल से इश्क़ करने वाले समझते हैं कि सामने वाले के प्यार में कितनी शिद्दत है, पर उस सामने वाले के जज़्बातों में समानता का क्या स्तर है, ये आभासी दुनिया कभी नहीं बता सकती।

प्यार को मज़ाक समझने वाले, उसे बेज़ार करने वाले काफ़ी हद तक सफल लोग हैं। उनकी उपलब्धि और ख़ुशनसीबी है कि उनकी वजह से ही दिखावे वाला प्यार आजकल हैशटैग के साथ धड़ल्ले से ट्रेंड कर रहा है।

इस प्यार को अब ट्रोल कराने की ज़रूरत है और इसकोट्रोल सिर्फ़ वही करा सकते हैं जो हक़ीक़त में भी मोहब्बत को बिना किसी विशेष टैग के सिर्फ मोहब्बत ही समझते हैं और उसे साफ़ नीयत से जताना, निभाना और अपना बनाना जानते हैं।

दौर चाहें जो भी हो, ये याद रखा जाना चाहिए कि जब किसी साफ़ मन शख़्सियत के प्यार को बिना वजह ग़लत वजह के लिए 'इस्तेमाल' किया जाता है तो उसके प्यार को नफ़रत बनने में केवल एक लम्हा लगता है। और जब कोई बेइंतेहा मोहब्बत करने वाला नफ़रत करता है तो उसका असर दिलों में शरीर को धीरे-धीरे मार देने वाले ज़हर से भी बत्तर होता है।


Monday, 3 July 2017

बीफ़, भड़ास, ईद और जुनैद

अभी बीस साल का भी नहीं हुआ था वो जिसे बीस लोगों ने मिलकर मार दिया और मीडिया की ख़बरों के मुताबिक़ लगभग दो सौ लोग उसके साथ हुए इस दर्दनाक हादसे को देख नहीं पाए। वही लोग जो असावती रेलवे स्टेशन पर खड़े हुए थे या जो उसी ट्रेन में सवार थे जिसमें पंद्रह साल के जुनैद को पीट-पीट कर उसके प्राण निकाल लिए गए।

खून से लथपथ उसकी लाश उसके बड़े भाई के पैरों पर पड़ी थी जिसके आगे कई लोग झुंड लगाए खड़े थे मगर कितने साहसी थे सब -- पत्थर से मज़बूत और कठोर दिल वाले -- कि ये दृश्य देखकर किसी का भी दिल नहीं पसीजा।  

जुनैद ने दिल्ली सरकार में काम करने वाले पचास साल के एक बुज़ुर्ग को शायद ट्रैन में सीट देने से मना कर दिया था। बेचारा ईद की शॉपिंग करते-करते थक गया होगा इसलिए ट्रेन में सीट मिलने पर बैठा होगा। ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा होगा कि घर जाकर अपनी अम्मी को वो सारी चीज़ें दिखाएगा जो उसने खरीदी थीं। मगर उसे क्या पता था कि ये उसके जीवन की आख़िरी शॉपिंग है। 

हमारे देश में लोकल ट्रेनों का हाल बहुत अच्छा नहीं है। हर दिन भीड़ ख़ुद को किसी सीमेंट के बोरे-सा ट्रेनों में धकेलती है। ऐसे में कोई कैसे सीट मिलने की उम्मीद भी कर सकता है? 

शायद अंकल जी को नहीं पता होगा कि जुनैद कितना थका है या नहीं थका है। वो शायद अपनी नौकरी  से इतना थक और चिढ़ कर आये थे कि कई सालों का गुस्सा उस मासूम पर निकाल दिया। अपने साथ कुछ और लोगों को भी मौक़ा दिया कि वे भी अपनी भड़ास निकाल सकें। बाक़ी रहा-बचा काम बीफ़ ने कर दिया। ये कहा गया कि उसके बैग में बीफ़ है, वह मुसलमान है। बस इतना कहना ही काफ़ी था लोगों के दिमाग़ में हैशटैग ट्रेंड करने वाली बीफ़ से जुड़ी ख़बरों को हवा देने के लिए और फिर तो उस तूफ़ान ने एक जान ले ही ली। 

मारने वालों की भीड़ में शामिल एक बेहद समझदार शख़्स ने कहा, "मुझे नहीं मालूम क्या हुआ था। मैं शराब के नशे में था। सबने कहा मारो तो मैंने मारना शुरू कर दिया।"

मालूम होता है कि कुछ हिन्दुओं के लिए बीफ़ हऊआ-सा हो गया है। जहाँ नाम सुना नहीं, चिल्लाने लगते हैं -- कभी डर से तो कभी ग़ुस्से से। सामने वाले के पास बीफ़ है या नहीं, कोई इसकी जाँच नहीं करता। जब पीटने का काम वे कर सकते हैं तो जाँचने का क्यों नहीं? वैसे भी कौन-सी माँ (गौ माता) का प्यार नफ़रत सिखाता है?

डेली ओ में नामी पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक लेख में जुनैद के अब्बा जल्लालुद्दीन के साथ हुई बात का ज़िक्र किया है। बात क्या, उन्होंने असल में उनका इंटरव्यू ही किया है। 

जल्लालुद्दीन ने राजदीप को बताया, "इतना ग़ुस्सा सीट को लेकर नहीं होता सर। वो मेरे बेटे को एंटी-नेशनल कह रहे थे, उसकी टोपी और कपड़े को लेकर गाली दे रहे थे।"

उन्होंने सवाल किया, "वो हमसे इतनी नफ़रत क्यों करते हैं सर कि हमें महज़ धर्म के नाम पर जान से मार देते हैं?"

"मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना," इस पंक्ति से शायद सभी वाक़िफ़ होंगे, फिर भी इतनी नफ़रत किसलिए? माना कि हर धर्म में कुछ कट्टरवादी लोग होते हैं मगर कौन-सा धर्म ऐसा होगा  जो इंसानियत भुलाना सिखा दे? अगर इस इतने बड़े जहाँ में कहीं भी ऐसा कोई धर्म है तो मुझे उसे जानना है, पढ़ना है, समझना है। यक़ीनन अगर उन सभी मारने वालों में से एक के जिग़र में भी इंसानियत होती तो जुनैद आज ज़िन्दा होता। 

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार जुनैद इमाम बनने की इच्छा रखता था। वो मदरसे में पढ़ता था और दो महीनों के लिए जब भी घर आता था तो बड़ी शिद्दत से क़ुरआन की आयतें पढ़कर सबको सुनाता था। "शायद वो अल्लाह का बंदा था। क्या पता इसीलिए अल्लाह ने ईद के मुबारक़ मौक़े पर ही उसे अपने पास बुला लिया।" क्या ये वाक्य उसकी अम्मी को ताउम्र दिलासा दे सकेगा?

पीएस - अख़लाक़ से लेकर जुनैद तक हालात सिर्फ़ बद्तर हुए हैं। देश में भले ही सरकारें बदल जाएँ, कुछ हालात शायद कभी नहीं बदलेंगे। लेकिन आवाम को ये समझ लेना चाहिए कि महज़ झुंड बनाकर किसी को पीट देने से या उसकी जान ले लेने से अच्छाई की दिशा में कुछ भी हासिल नहीं होगा।