एक शख़्स, जो कहता है कि वो उसकी परवाह करता है, उससे मुहब्बत करता है; मगर अपनी कामकाजी दुनिया में बहुत व्यस्त है, इतना कि उसके साथ कुछ लम्हें बिताने का भी समय नहीं। वो हर दिन एक उम्मीद लगाती है कि शायद आज वो उससे बात करने की कोशिश करेगा, या कल वो उससे मिलने की योजना बना रहा होगा। बस इन्हीं ख्यालों के साथ उसकी ज़िन्दगी का हर दिन बीत रहा है। अब शायद इंतज़ार करना मुश्किल हो रहा है और धीरे-धीरे उसके अंदर उस एक शख़्स को अपने साथ देखने की उम्मीद मर रही है। वो शख़्स जो उसे अपना ख़ास कहता है, वो अचानक ही उससे बात करने में हिचकिचाने लगी है।
अभी उसे उसकी ख़ास हुए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ है। साथ ही उसे ये भी समझना होगा कि कोई यूँहीँ किसी का नहीं हो जाता। मुहब्बत मज़ाक नहीं है, और न ही इतनी आसान कि कोई कभी भी किसी के भी इश्क़ में डूब जाए। शायद वो उम्र के उस पड़ाव पर है जहाँ इश्क़ के जज़बातों की गहराई को समझना सरल है, बशर्ते उसमें इतना साहस हो।
वो शख्स कितना व्यस्त है ये वो नहीं जानती, पर शायद इतना समझती है कि जो हमारे ख़ास होते हैं, उनसे वो बेझिझक बात करती है। उनसे कुछ भी कहने से पहले उसे कोई भी योजना बनाने की ज़रुरत नहीं पड़ती। बेबाक़ अपनी बात कहती है।
मग़र ग़ौर फ़रमाने की बात ये है कि उस शख़्स से कोई भी बात करने से पहले उसे दस बार सोचना पड़ता है कि क्या बात करनी है, क्या कहना चाहिए। और उस पर तंज़ ये है कि 'वो' कभी कुछ कहता ही नहीं। एक शख्स ने उसे अपना ख़ास क्या कह दिया, वो तो हज़ारों सपने और उम्मीदें सजा बैठीं। पागल है वो।
जिस शख्स पर वो अपना हक़ जताने से घबराती हो, वो उसे अपना ख़ास शायद ही समझता होगा। इतनी नादान क्यों है वो, सच को समझने की कोशिश क्यों नहीं करती? वैसे भी उसे उस शख़्स से तो कभी मुहब्बत थी ही नहीं। पर अब जब वो उससे दूरियाँ बढ़ा रहा है, तो उसे इतनी तकलीफ़ क्यों हो रही है?
वो कभी कुछ नहीं समझ पाएगी, हमेशा यूँही भटकती रहेगी। अतीत के काले बादलों ने उसे इस क़दर घेरा है कि उसे रोशनी की ओर जाने का रास्ता ही नहीं मिल रहा। वो हमेशा उन बादलों में घिरी रहेगी। कोई उसे उन अंधेरों से बाहर नहीं ला सकेगा क्यूँकि न तो उसमें खुद इतना धैर्य है, और न ही उस एक शख्स में इतनी हिम्मत कि उसे उन अंधेरों से बाहर खींच ले। उसने तो उसे सियहख़ाने से बाहर लाने के लिए उसकी ओर अपना हाथ बढ़ाया था, पर वो ही उसे थामने का साहस नहीं दिखा पायी। अफ़सोस।
अभी उसे उसकी ख़ास हुए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ है। साथ ही उसे ये भी समझना होगा कि कोई यूँहीँ किसी का नहीं हो जाता। मुहब्बत मज़ाक नहीं है, और न ही इतनी आसान कि कोई कभी भी किसी के भी इश्क़ में डूब जाए। शायद वो उम्र के उस पड़ाव पर है जहाँ इश्क़ के जज़बातों की गहराई को समझना सरल है, बशर्ते उसमें इतना साहस हो।
वो शख्स कितना व्यस्त है ये वो नहीं जानती, पर शायद इतना समझती है कि जो हमारे ख़ास होते हैं, उनसे वो बेझिझक बात करती है। उनसे कुछ भी कहने से पहले उसे कोई भी योजना बनाने की ज़रुरत नहीं पड़ती। बेबाक़ अपनी बात कहती है।
मग़र ग़ौर फ़रमाने की बात ये है कि उस शख़्स से कोई भी बात करने से पहले उसे दस बार सोचना पड़ता है कि क्या बात करनी है, क्या कहना चाहिए। और उस पर तंज़ ये है कि 'वो' कभी कुछ कहता ही नहीं। एक शख्स ने उसे अपना ख़ास क्या कह दिया, वो तो हज़ारों सपने और उम्मीदें सजा बैठीं। पागल है वो।
जिस शख्स पर वो अपना हक़ जताने से घबराती हो, वो उसे अपना ख़ास शायद ही समझता होगा। इतनी नादान क्यों है वो, सच को समझने की कोशिश क्यों नहीं करती? वैसे भी उसे उस शख़्स से तो कभी मुहब्बत थी ही नहीं। पर अब जब वो उससे दूरियाँ बढ़ा रहा है, तो उसे इतनी तकलीफ़ क्यों हो रही है?
वो कभी कुछ नहीं समझ पाएगी, हमेशा यूँही भटकती रहेगी। अतीत के काले बादलों ने उसे इस क़दर घेरा है कि उसे रोशनी की ओर जाने का रास्ता ही नहीं मिल रहा। वो हमेशा उन बादलों में घिरी रहेगी। कोई उसे उन अंधेरों से बाहर नहीं ला सकेगा क्यूँकि न तो उसमें खुद इतना धैर्य है, और न ही उस एक शख्स में इतनी हिम्मत कि उसे उन अंधेरों से बाहर खींच ले। उसने तो उसे सियहख़ाने से बाहर लाने के लिए उसकी ओर अपना हाथ बढ़ाया था, पर वो ही उसे थामने का साहस नहीं दिखा पायी। अफ़सोस।