Wednesday, 9 December 2015

अ नशेड़ी इन नोएडा

कल्पना कीजिये कि हर रोज़ की तरह आप किसी रिक्शे पर बैठकर दफ़्तर जा रहे हैं और रास्ते में अचानक एक छह फुट का लम्बा-चौड़ा आदमी रिक्शे को धक्का देकर चौराहे पर गिरा दे, क्या समझेंगे आप? क्या ख्याल दौड़ेगा आपके दिमाग में? दौड़ेगा भी या नहीं? सोचिये।

नॉएडा के सेक्टर-६२ में स्थित मशहूर फोर्टिस अस्पताल के पास बने चौराहे पर एक आदमी ने आज ऐसा ही किया। रिक्शे पर बैठी मैं उम्मीद लगा रही थी कि दफ़्तर जल्दी पहुँच जाऊंगी, मग़र दिल को बहलाने के लिए बस ये ख्याल ही अच्छा था। असल में उस वक़्त चौराहे पर जाम बहुत ज़्यादा था । वो रिक्शा चालक और मैं दोनों जाम खुलने की  राह देख रहे थे। एकाएक ये नशे में धुत्त शख़्स सूट - बूट पहने आया और इसने हमारा रिक्शा पलट दिया।

कुछ पल तक समझ में ही नहीं आया कि आख़िर ये हुआ क्या? रिक्शा चालक और मैं दोनों सही-सलामत थे। न जाने क्या पुण्य किये थे हम दोनों ने। मन तो कर रहा था कि सूट वाले भाईसाहब के कान के नीचे दो धर दिए जाएँ, लेकिन कम्बख़त का साइज इतना बड़ा था कि वहां तक हाथ ही नहीं पहुँचता शायद। अचानक वो भाईसाहब हाथ जोड़ कर मुझसे माफ़ी माँगते हुए बोले, "मैडम, आपको परेशान करने का इरादा नहीं था मेरा।" अब जब इनका मुँह खुला तो पता चला कि ये महाराज न जाने कितनी बोतलें उड़ेलकर इस चौराहे पर नुक्कड़ नाटक खेल रहे हैं। आते-जाते लोगों को बिना वजह मार रहे हैं या गालियाँ दिए चले जा रहे हैं।

जी तो कर रहा था कि डंडे से इ  महान आत्मा की धुलाई कर दी जाए मगर ना तो इतना समय था और ना ही इस प्रक्रिया में कोई सभ्यता मालूम होती थी।

मैंने तुरंत १०० नंबर डायल किया। पीसीआर ने जवाब दिया, "हमारे पास पहले भी दो बार शिकायत आ चुकी है।" सवाल था कि ऐक्शन कब लिया जायेगा? लेकिन सवाल-जवाब करने का मौका नहीं मिला, दफ्तर के लिए देर जो हो रही थी।

जाम में फँसे हुए पूरे बीस मिनट बीत चुके थे। ना पीसीआर आई और ना ही किसी नागरिक ने कोई एक्शन ले पाया। चारों तरफ से लोग जाम से निकलकर बस जल्द-से-जल्द अपनी मंज़िल तक पहुंचना चाहते थे। हर किसी का ध्यान उस नशेड़ी की ओर था मग़र जल्दी भी सभी को थी। मुझे भी थी इसलिए आख़िरकार मैं रिक्शे से उतरी और पैदल ही दफ़्तर निकल गई। क्या करें, किसी नशेड़ी की वजह से कोई अपना हॉफ डे काहे लगवायेगा दफ़्तर में।

ज़हन में ये ख्याल था कि एक नशे में धुत्त इंसान के ना तो मुँह लगना चाहिए और ना ही उस पर कभी भरोसा करना चाहिए। अफ़सोस इस बात का है कि उस वक़्त मेरे फ़ोन का कैमरा काम नहीं किया वरना आपको भी 'अ नशेड़ी इन नोएडा' के दर्शन ज़रूर होते। या फिर यही ठीक ही है क्यूंकि ऐसे आदमी को भला कोई क्यों देखना चाहेगा। आप ही बताइये।

आज एक नशेड़ी मिला है कल कोई और मिल जायेगा। अजीब ही दुनिया है ये। बहरहाल आप सावधान रहें और अपना ख्याल रखें। जागरूक रहें।











Monday, 28 September 2015

मिठाई पुल की कड़वी कहानी

एनडीटीवी के प्राइम टाइम में आज रवीश सर ने दालों की कहानी सुनायी। मालूम हुआ कि पुरानी दिल्ली में स्थित मिठाई पुल नामक एक जगह है। यहाँ हर रविवार को एक बाज़ार लगता है, जहाँ मिठाइयाँ नहीं मिलतीं। जी हाँ, इस बाजार में दालें मिलती हैं, चावल और मसाले मिलते हैं, ख़ासतौर पर मध्यम वर्ग और ग़रीब तबके के लोगों के लिए। ऐसा बताया उन्होंने।

बहुत से ऐसे लोग दिखे जो मीलों दूर से यहाँ दालें खरीदने आये थे। दादरी, द्धारका, नोएडा, आदि जगहों से लोग यहाँ सिर्फ दालों की ही खातिर आये थे। ऐसी मार है महंगाई की, देख लीजिये। एक महिला से पूछने पर पता चला कि महंगाई के चलते वो हफ़्ते में सिर्फ एक ही बार दाल बनाती हैं। बाकी समय में गुज़ारा सब्ज़ी और रोटी से ही होता है। वो सभी लोग जो वहां सामान लेने आये थे, उन सबका एक सामान्य मत ये था कि उनके घर के पास वाली दुकानों में लगभग हर दाल का दाम सौ रुपये से भी ज़्यादा है। यही कारण है कि वे लोग इस मिठाई पुल पर दालें लेने आये थे। शायद यही उनके लिए किसी मिठाई से कम नहीं।

इस सबके बीच हैरानगी की बात ये थी कि जो दालें वहाँ बिक रही थीं, उनकी गुणवत्ता बहुत ही ख़राब थी। लोग ऐसा अनाज खाने को मजबूर हैं जो हाई सोसाइटी के लोग अक्सर चिड़िया और कबूतरों के लिए ले जाया करते हैं, ऐसा एक दाल बेचने वाले ने बताया। अब ऐसे में ये समझना मुश्किल है कि इंसान की हालत बत्तर हो रही है या पक्षियों की बेहतर। दालें जिनमें छेद हो चुके हैं, वो चालीस से साठ रूपए प्रति किलो मिलती हैं और चावल के मिटटी भरे टुकड़े पंद्रह रूपए प्रति किलो मिलते हैं इस बाजार में। लोग इसे ही ले जाते हैं, वो भी बहुत भारी मात्रा में। हर महीने इनका एक रविवार इसी बाज़ार के लिए रिज़र्व रहता है।

ये दयनीय हालत है हमारे मध्यम और ग़रीब तबके के लोगों की। मालूम ये भी हुआ कि कुछ मध्यम वर्गीय लोगों को शर्म महसूस होती है समाज के आगे ये स्वीकारने में कि वे इस बाजार से सामान खरीदते हैं। अजीब विडम्बना है, पेट देखें या स्टेटस। रिक्शेवाले से लेकर मकान बनाने वाले मजदूर तक, हर ग़रीब आदमी यहाँ पेट भरने की उम्मीद लेकर आता है और महीने भर का राशन ले जाता है। बड़ी मेहनत की कमाई होती है और उम्मीद सिर्फ दो वक़्त की रोटी पेट में जाने की होती है।

इन सभी लोगों के साथ अफ़सोस जताया जाए या इनकी हिम्मत की दाद दी जाए, मालूम नहीं। अफ़सोस इस बात का कि काश इन्हें भी इंसानों वाला खाना नसीब हो, वो जो बड़े लोग खाते हैं, और हिम्मत इस बात की कि आज भी इनमें इतना हौंसला क़ायम है कि महंगाई से लड़ रहे हैं, यहाँ इस मिठाई पुल पर आकर। बहरहाल, ये है दिल्ली के मिठाई पुल की कड़वी कहानी। आप सोचते रहिये।

जय हिन्द। जय भारत। मेरा भारत महान, करे ग़रीबों का काम-तमाम। 

Wednesday, 23 September 2015

अ-रूप.............

ये लिखते हुए हाथ काँप रहे हैं, आँखें नाम हैं लेकिन शायद यही सब ज़िन्दगी के कुछ पहलू हैं जो इसकी नाख़ुश हक़ीक़तों के साथ समझौता कर जीने का साहस देंगे। मेरे बड़े मुझे बहुत कुछ समझाते हैं, कुछ समझ आता है, कुछ नहीं। जो आ जाता है वो ठीक है, जो नहीं आता, वो समझाने के लिए ज़िन्दगी अपने खेल खेल देती है। जैसा कि आज हुआ।

हर दिन की तरह मैं घर से दफ्तर जाने के लिए निकली थी और अचानक पता चला कि मेरे एक कलीग अब इस दुनिया में नहीं हैं। व्हाट्सप्प पर एक मेसेज आया और मैं हक्की-बक्की रह गई। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि एक शख़्स जो कल तक आपके सामने अच्छा-खासा मौजूद था, वो अब इस दुनिया में नहीं है। अरूप दादा अब इस दुनिया में नहीं हैं, वो अब कभी दफ़्तर नहीं आएंगे।

ख़बर मिलते ही पहला ख्याल दिमाग में ये आया कि उन्होंने कहा था कि एक दिन मैं साहिबाबाद आऊंगा तो तेरे घर ज़रूर आऊंगा। एक बार आये भी थे मगर तब मेरे घर नहीं आये। मैंने कहा उनको आई नो आप क्यों नहीं आये, मेरे घर में एसी नहीं है ना। थोड़े दिन रुक जाओ, मैं एसी लगवा लूँ फिर आपको खींचकर अपने घर लेकर जाऊंगी। बहुत गर्मी लगती है ना आपको। होठों पर एक हल्की-सी मुस्कान के साथ ऑटो में बैठे आँखों से आंसू गिरते चले जा रहे थे। यकीन ही नहीं हो रहा था कि ऐसा कुछ हो गया है। पर सच से कितनी देर तक भागा जा सकता है। सच वही था कि कल रात एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई थी। पोस्टमॉर्टम के लिए उनकी बॉडी दिल्ली के एम्स अस्पताल ले जाई गई थी। 

हम सब अस्पताल के बाहर खड़े इंतज़ार कर रहे थे। दफ्तर में छुट्टी की घोषणा हो गई थी। कोई काम नहीं कर रहा था। तीन घंटे बीत गए थे वहां खड़े-खड़े मगर मैं उन्हें देख नहीं पायी। एक आखरी बार देखना चाहती थी पर शायद मुझमें साहस ही नहीं था इसलिए चुपचाप चली आई बस। अपने दफ्तर में सबसे छोटी हूँ, कुछ की लाडली भी, जिनमें से दादा भी एक थे। कभी उनको किसी बात के लिए शुक्रिया अदा करो तो कहते थे 'छोटी है न, ज़्यादा मत बोला कर। ध्यान रख। कोई परेशानी हो तो बताया कर।' कई बार मुझे आवाज़ लगाते थे और न सुन पाने पर कहते थे-'एकाँकी, ध्यान कहाँ है तेरा? चार बार आवाज़ लगाया मैंने।' मैं कहती थी- 'सॉरी दादा।' 

'सॉरी सॉरी क्या? क्या, हुआ क्या है तुझे?'- पूछा करते थे। कुछ होता ही नहीं था तो बताती क्या। 

दादा के साथ बीता एक पल 


दादा की सबसे अच्छी बात लगा करती थी कि वो बिना कुछ उम्मीद किये हर किसी की मदद किया करते थे। हर बार, हर वक़्त। और उससे भी अच्छी बात ये थी कि उनसे कभी भी मदद मांगने में हिचकिचाना नहीं पड़ता था। मालूम होता था कि जो कहा है, वो करें देंगे। कोई विशिष्ट रूप नहीं था उनका, जब जैसी ज़रुरत होती थी, वो उसमे ढल जाते थे। बस इतने वक़्त में इतना ही समझी थी मैं उनको। अक्सर उनसे पूछा करती थी - 'अगर मैं आपके लिए एक ब्लॉग लिखूँ तो आप पढोगे?' जवाब होता था - 'नहीं।' सच ही तो कहा था दादा आपने। 

पता नहीं कौन पढ़ेगा, पर आप तो नहीं ही पढ़ोगे। है न? 







Wednesday, 9 September 2015

मुबारक़ हो, आप मर्द हैं

जी हाँ, आप, जो कल ऑटो में तनकर बैठे हुए थे, आप ही से कहना चाह रही हूँ मैं। नोएडा सुरक्षित क्षेत्र नहीं है, ये शायद आपको तब मालूम होता जब आपकी अपनी कोई बहन या बेटी होती जिसे हर दिन नौकरी करने यहाँ आना पड़ता।

माना कि आप उस ऑटो वाले को उतने ही पैसे दे रहे थे जितने मैं भी देने की हैसियत रखती हूँ, मग़र शायद आप ये समझ सकते थे कि किसी भी इलाके में जैसे-जैसे अँधेरा बढ़ता है, एक महिला असुरक्षित महसूस करने लगती है। ख़ैर, आप क्यों इतना कष्ट करेंगे, आप महिला थोड़ी ना हैं। वैसे आजकल तो ज़माना ऐसा है कि महिला भी महिला की दुशमन हो चली है। पर अब क्या ही कहें। छोड़िये।

बड़ी आसानी से आपने कह दिया कि मैं आगे नहीं बैठूंगा। मैं ही बेवक़ूफ़ थी जो समझ रही थी कि शायद आप में 'कर्टसी' नाम की कोई चीज़ होगी। आफ्टर आल, आप तो मर्द हैं जो औरत को कुछ नहीं समझते या कुछ समझते भी हैं तो बस पाँव की जूती या हो सकता है उससे भी बत्तर कुछ और। आप ही जानें।

पर हार तो मैंने भी नहीं मानी। तेहा में उस ऑटो को छोड़कर आगे बढ़ गई। क़िस्मत अच्छी थी या बुरी मालूम नहीं, पर दस मिनट बाद वही ऑटो खाली होकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ, और आप अब भी वहीँ बैठे हुए थे। सहसा ऑटो वाले ने पूछा-" मैडम, मोहन नगर?"

मैंने कहा- "हाँ भैया।"

मैं ऑटो में चढ़ी और सीना तानकर आपके ही बगल में बैठ गई। गुस्सा और हँसी  दोनों मेरे चेहरे पर साफ़ झलक रहे थे। आपकी भी शक्ल देखने लायक थी। दिल कर रहा था आपका एक फोटो ले लूँ और सोशल मीडिया पर वायरल कर दूँ। पर क्या फायदा, आप जैसी शख्सियत को पॉपुलर करने का?

मुझे बस इतना ही कहना है- "न जाने किस बात पर गुमान करने वाले, मुबारक़ हो, आप मर्द हैं।"

Tuesday, 14 July 2015

सुप्रभात सर!

हम सब जानते हैं कि एक शिक्षक अपने विद्यार्थी के जीवन में अहम किरदार अदा करते हैं। और फिर जिनके नाम में ही प्रभात हो, वो तो अपने विद्यार्थियों का जीवन रोशनी से ही उजागर करेंगे। ऐसा ही उन्होंने किया भी है। कम से कम उनका विद्यार्थी होने के बाद मुझे तो ऐसा महसूस हुआ है।

दिन का कोई भी पहर हो, उन्होंने हर बार, हर वक़्त हर असमंजस को दूर करने में मेरी मदद की है। वो निजी स्तर पर हो या प्रोफेशनल, वो अधिकतर मेरे साथ खड़े रहे हैं। पता नहीं क्यों मगर इस बात पर मुझे बेहद ख़ुशी और गर्व है।

इतने सालों का पत्रकारिता का अनुभव जब वो कक्षा में साझा किया करते थे तो एहसास होता था कि उनकी बताई ज्ञान की बातें हर पल मुझे अपनी मंज़िल की और बढ़ने का हौंसला दे रही हैं। इसके अलावा सबसे खूबसूरत पल वो हुआ करता था जब कभी वो लेक्चर की शुरुआत ' ओरियो' बिस्किट्स के साथ किया करते थे। ख़ुशी इस बात की ज़्यादा है कि आज भी अगर उनसे अपनी सफलता का कोई क़िस्सा साझा करो तो वो कहते हैं- 'एन्जॉय विद एन ओरियो टुडे'।

एक पुरानी याद 
शुरुआत के दिनों में उनके डाँट देने से बहुत डर भी लगता था। उस डाँट का अंदाज़ भी कुछ अलग ही किस्म का था। डर लगने के साथ जो होता था वो ये कि हार ना मानकर आगे बढ़ने का हौंसला मिलता था। उनके कहे हर शब्द से प्रेरणा मिलती थी। यहाँ तक कि उनकी वो जेन्युइन स्माइल आज भी याद करो तो सुकून मिलता है।

जब सब कहते हैं कि दुनिया ऐसी है, लोग वैसे हैं, उस वक़्त वो हौंसला देते हैं ये कहकर कि 'वीर तुम बढ़े चलो'। रास्ता आसान नहीं है लेकिन उनके जैसे शिक्षक का जब तक साथ है, शायद हर मुश्किल का हल आसान है। आख़िरकार जीवन में कुछ हासिल करना है तो सिर पर एक अनुभवी शिक्षक का हाथ होना ज़रूरी है। अब तक उन्होंने हर पल सहारा दिया है और मुझे यक़ीन है कि आने वाले वक़्त में भी वो मेरे सपोर्ट बने रहेंगे। कुछ खूबसूरत लम्हें ऐसे भी हैं जिनमें उन्हें मुझ पर गर्व महसूस हुआ है। आगे भी ऐसा कुछ तो ज़रूर होगा, ये उम्मीद अभी बाक़ी है। 

Saturday, 13 June 2015

साइंस के साइंस

घर से दफ्तर जाने के बीच आज बस एक फांसला था- साइंस (विज्ञान)। सेक्टर ६२ की चौकी से जैसे ही ऑटो पकड़ा, सामने ग्रेटर नॉएडा में स्थित जी एल बजाज कॉलेज की दो छात्राएं आकर बैठ गयीं। दोनों बीटेक फाइनल ईयर में थीं। उनमें से एक अचानक बोली - मैम, एक्सक्यूज़ मी!

मैंने कहा - जी।

मैम, हम दोनों हमारे प्रोजेक्ट के लिए एक सर्वे कर रहे हैं। आपसे कुछ सवाल पूछने हैं।

मैंने कहा - जी पूछिये।

कोमल ने कुल पाँच सवाल पूछे। साथ ही मेरा नाम, फ़ोन नंबर और ईमेल आई डी ले ली।

सवाल थे रेस्ट्रॉन्ट और उनकी सर्विसेज़ से रिलेटेड। कोमल और उसकी दोस्त माहेश्वरी एक ऐसी मोबाइल ऐप्प बना रहे हैं जिससे आप जब कभी किसी रेस्ट्रॉन्ट में जाएंगे तो किसी वेटर को आकर आपका आर्डर लेने की ज़रुरत नहीं होगी। आप बस बैठिये, मोबाइल से अपना आर्डर दीजिये और आपका खाना आपकी टेबल पर होगा। खाने का स्वाद लेने के बाद बिल भी आपके मोबाइल पर आ जायेगा और आप अपने मोबाइल से ही ऑनलाइन पेमेंट भी कर सकेंगे। यदि किसी रेस्ट्रॉन्ट का खाना या सर्विसेज आपको पसंद नहीं आयीं तो आप इस ऐप्प के द्वारा रिव्यु या शायद शिकायत भी दर्ज कर सकते हैं। ये ऐप्प आने पर कन्फर्म हो जाएगा।

ख़ुशी की बात ये है कि इस ऐप्प से आप जो भी पहला आर्डर देंगे, वो मुफ्त होगा। मुझे जानकारी देने के बाद कोमल ऑटो में बैठी बाक़ी महिलाओं से भी वही सवाल पूछने लगी। एक महिला ने कहा कि वो जहाँ काम करती है, वहां भी उन्होंने 'ई-रेस्ट्रॉन्ट' नाम की एक एप्प बनायीं है। सुनकर मुझे हँसी आ गयी। सोचा कि मैं भी बोल ही दूँ कि मैं भी 'ई-गव' मैगज़ीन में काम करती हूँ, फिर लगा कि अगर बात बढ़ती है तो उन दोनों का समय जाया होगा। कुछ नहीं कहा।

सब कुछ 'ई' ही हो रहा है आजकल भारत में। वैसे 'ई' के दो मायने हो सकते हैं। पहला ये कि सब कुछ इलेक्ट्रॉनिक हो रहा है, डिजिटल इंडिया बन रहा है। दूसरा ये कि देखो ई क्या हो रहा है, लालू जी की भाषा में। असल में ये सब साइंस के साइंस हैं।

अब आप रेस्ट्रॉन्ट में जाकर बस बैठ जाइए। इंसान नहीं, अब सब कुछ मोबाइल करेगा। बहरहाल, सोचने वाली बात बस इतनी है कि ये साइंस कहीं इंसान को ही मशीन न कर दे। अब शायद यही बाक़ी रह गया है बस।

ख़ैर, जब जो होगा तब वो देखेंगे। फिलहाल कोमल और माहेश्वरी के लिए ढेर सारी शुभकामनायें। आप भी दुआ कीजिये कि उन दोनों की मेहनत जल्दी ही सफल हो। फायदा आपका ही है, ऐप्प से पहला आर्डर करने पर खाना जो मुफ्त मिलेगा। 

Tuesday, 9 June 2015

तुम और मैं

ये क्या लिखा है तुमने? क्यों क़त्ल-ए-आम कर रही हो?
किस बारे में फ़रमा रहे हैं जनाब? ज़रा तफ्सील में बताइये।

पढ़ो, ये तुमने ही लिखा है न?  इतनी जल्दी भूल भी गयीं?
हाँ, लिखा तो मैंने ही है।

क्यों लिखा है? ऐसा ख़याल आया भी कैसे तुम्हें?
क्यों? किसी ने कुछ कहा क्या?

कौन क्या कहेगा?
कोई कुछ भी कह सकता है।

ख़ैर अब ये बताओ कि ये ख़याल आया कैसे?
अरे! ख़याल ही तो है। किसी से पूछकर थोड़े ही आएगा।

 हम्म। तुम्हें अपने धैर्य की सीमा बढ़ानी चाहिए।
मैं वाक़िफ़ हूँ। तुम न बताओ।

अच्छा ठीक है। गलती हो गई। अब कुछ नहीं कहूँगा।
अरे! मेरा वो मतलब नहीं था।

जो भी था। मैं बस तुम्हें समझा रहा था। बाक़ी तुम्हारी मर्ज़ी।
हम्म। वैसे तुम जो समझाना चाहते हो, वो सब मैं पहले से समझती हूँ, बस स्वीकार नहीं कर पा रही हूँ।

अच्छा!  कोई बात नहीं। अकसर ऐसा होता है, मगर तुम निराश मत हो।
हम्म। कोशिश  तो जारी है। उम्मीद है बहुत जल्द वक़्त बहुत कुछ सिखा देगा। लेकिन फिर भी धैर्य रखना अलग बात है और ग़लत चीज़ बर्दाश्त करना अलग।

क्या ग़लत हुआ?
कुछ भी नहीं।

बताओ मुझे।
मेरी नज़र से देखने का साहस है?

उफ्फ़, तुम पागल हो।
जानती हूँ।

तुम नहीं सुधरोगी।
ये तो तुम भी जानते हो।

यूँ बहलाओ मत। ठीक-ठीक बताओ क्या हुआ है?
तुम्हें बताना मुनासिब नहीं।

क्यों ?
तुम पर ऐतबार नहीं।

ऐसा क्या गुनाह किया मैंने?
सोचोगे तो समझ भी जाओगे।

कहीं तुम्हें पागलख़ाने की ज़रुरत तो नहीं?
नहीं, बस इश्क़ .................................. (ख़ामोशी)

क्या?
कुछ भी तो नहीं। 

Saturday, 23 May 2015

नमस्कार! मैं रवीश कुमार.......... (एक ख़्वाब के जज़्बात)

कोई अपने नाम के आगे नमस्कार लगाता है क्या ? पिछले १६ साल से वो यही करते आ रहे हैं। मुझे ज़्यादा ज्ञात नहीं, मगर लगभग इतने साल तो हो ही गए हैं। पत्रकारिता का रूप बदल देने वाले रवीश, बेबाक़ और बेख़ौफ़ होकर तथ्यों को नागरिकों तक पहुँचाने वाले एक क़ाबिल पत्रकार।

कल प्रगति मैदान में हो रहे इवेंट में जब अचानक उन्हें देखा, ख़ुशी का ठिकाना न रहा। सालों से उनसे मिलने की तमन्ना अचानक एक झटके में पूरी हो गयी। जब तक वो सिर्फ टीवी पर नज़र आते थे तो ख़्वाहिश हुआ करती थी कि एक दिन इनसे मिलना है और 'ये - ये' कहना है। 'वो - वो' पूछना है। मग़र जब वो सामने थे तो मानो बोलती ही बंद हो गयी। बीच रास्ते में खड़ी मैं बस उन्हें देखती रह गई। नज़रें हट ही नहीं रही थीं। वो अपना काम कर रहे थे और मैं बस उन्हें देखती ही जा रही थी, मेरे रोल मॉडल। कहना था कि सर, पत्रकारिता के लिये कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुएँ बता दीजिये, कहा भी था, लेकिन उनके पास समय नहीं था जवाब देने का।

कोई अंदाजा नहीं मुझे कि उन्होंने मेरी बात सुनी भी या नहीं। मैं उस भीड़ में कुछ - कुछ बोलती चली जा रही थी। कौन सुन रहा था या जिनके लिए कह रही थी उन्होंने सुना या नहीं, कुछ नहीं मलूम। बस इतना पता था कि जो भी मन में है वो कहना है। शूट चल रहा था और हमारे अध्यापक ने सिखाया था कि कैसा व्यवहार किया जाता है शूटिंग के दौरान। थोड़ा सभ्य बनना था। कैमरा में दिखना उद्देश्य नहीं था, बस कुछ बातें उनसे साझा करनी थीं। वो जहाँ - जहाँ चलते रहे, मैं उनके पीछे पीछे चलती रही। महसूस हो रहा था कि कैसे हम अपने ख़्वाबों का पीछा करते हैं। एक अजीब- सा एहसास।

पीछा करने के लिए मग़र हिम्मत चाहिए। जहाँ रवीश आ जाते हैं, वहाँ इतनी भीड़ हो जाती है कि ख़ुद को उस भीड़ से अलग दिखाना मुश्किल मालूम होता है। अगर वो तीन लोग हौंसला ना देते तो वो सेल्फ़ी नहीं खिंचती, वो दो शब्द जिनकी अदला-बदली हुई, वो नहीं होती। मेरे और उनके बीच बस एक चीज़ थी - "भीड़"। चाहिए था तो बस हौंसला। सबने कहा "यू नेवर नो कि वो दोबारा तुम्हें कब मिलेंगे। गो, मीट हिम, शो सम गट्स। "

आसान नहीं था लेकिन जब कुछ करने की ठान लो तो भगवान भी साथ दे ही देते हैं और रविश जी ने भी दे ही दिया। एक फोटो मिल गई। शुक्रिया उन सभी का जिनकी वजह से हौंसला मिला। ये भी महसूस हुआ कि जब आपका ख़्वाब सामने हों तो साहस खुद ही जुटाना पड़ता है। कोई कब तक साथ देगा, और क्यों देगा? इसलिए अपनी पहचान खुद बनाने का एक जज़्बा-सा जगा, जद्दोजेहद अब जारी है। लेकिन वो सभी लोग जिनकी वजह से अब तक इतनी सारी चीज़ें हासिल हो गई है उनका शुक्रगुज़ार होना लाज़मी है। मैं चाहें सफलता के शिखर तक पहुँचू या नहीं, लेकिन अब तक जहाँ भी हूँ अपनी ज़िन्दगी में आये हर शख़्स की शुक्रगुज़ार थी, हूँ और रहूँगी। उन सबकी दुआएँ न होती, साथ न होता तो शायद हम भी नहीं होते।

एक खूबसूरत लम्हा................ 



आप पढ़ रहे थे एक ख़्वाब के जज़्बात। नमस्कार।

Tuesday, 14 April 2015

कॉर्पोरेट की दिखावटी दुनिया


आजकल की प्रॉफेशनल ज़िन्दगी भी बहुत अजीब-सी शानदार है। आजकल की ही क्यों, पहले की भी कुछ ऐसी ही होगी, पर मुझे शायद अब मालूम हुआ है जब पाँव घर के बाहर निकल पड़े हैं। कुछ नया ढूंढने, कुछ अलग देखने, तरह-तरह के लोगों से मिलने, उनकी मानसिकताओं को समझने के लिए कदम आगे बढ़ते जा रहे हैं। एक कॉर्पोरेट का हिस्सा होना अजीब-सा अनुभव है। प्रोफेशनलिज्म के नाम पर पता नहीं कितने चोचले देखने को मिलते हैं। उन्हें देख कर कभी हँसी आती है, कभी गुस्सा, कभी अफ़सोस होता है तो कभी ख़ुशी। सही और ग़लत का फर्क करना मुश्किल होता है। जो बाक़ियों को सही लगता है, मुझे ग़लत लगता है और जो उन्हें ग़लत लगता है, वो मुझे ठीक लगता है। पर ये भी ज़रूरी नहीं कि हर बार सही-ग़लत का अंतर्विरोध सामने लाया ही जाए। कभी-कभी चुप रहकर अपने दिल की भी सुनी जा सकती है और ज़्यादा समझदारी भी शायद इसी में है।

ऊँची-ऊँची इमारतों में बसी कॉर्पोरेट कंपनियाँ कभी-कभी ज़िन्दगी पर तंज़-सी मालूम होती हैं। लोग दिन रात ऐसी फॉर्मल्टी निभाते हैं, जिससे वे खुद भी अवगत नहीं होते। क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं कुछ नहीं मालूम, जिस बात की ख़बर है वो बस ये है कि न चाहते हुए भी वो हर रोज़ वही करते जा रहे हैं जिसे वो बोझ समझते हैं, करना नहीं चाहते और उसी वजह से झल्लाने लगते हैं। हँसना और बोलना भूल जाते हैं। इतना सब मात्र चंद अमूल्य कागज़ के टुकड़ों के लिए।

"अजीब है ये ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी अजीब है"- किसी गाने की ये बिल्कुल सच्ची कड़ी है। पर ये ज़िन्दगी अजीब नहीं है, असल में इसे जीने वाले अजीब हैं। न जाने क्यों लोग ज़िन्दगी को सीधा-सादा नहीं रहने दे सकते? उन्हें अपने आस-पास पता नहीं क्या चाहिए, कभी किसी चीज़ से संतुष्ट ही नहीं होते। बस यही अजीब है, बहुत अजीब। क्या फायदा इतनी मेहनत का कि रातों को नींद ही ना आये, कुछ पैसों की ख़ातिर दस बीमारियाँ लग जाएँ। मानो लोगों को पैसों की ज़रूरत नहीं, भूँख है (जो दाल-चावल से नहीं मिट सकती)।

सबसे अलग होने की इच्छा नहीं है, मगर इन प्रोफ़ेशनल लोगों के रंग में ढलने से डर लगता है। किसी ने कहा था कि कई सालों तक जब इंसान खुद को बड़ी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में घिसता रहता है तो उसमें हँसने, मुस्कुराने की न तो इच्छा होती है और न ही हिम्मत। शायद इतना घिस जाते हैं कि असली लक्ष्य याद नहीं रहता।

अब सवाल ये है कि आख़िर क्यों ज़िन्दगी को इतनी कश्मकशों से क़ैद करना है? क्या इसी को प्रोफेशनलिज्म कहते हैं? आप सोफिस्टिकेशन में ही सारी उम्र बिता देंगे तो दिल की कब सुनेंगे? कुछ लोग शायद सुनते होंगे पर सिर्फ़ वीकेंड्स पे। इतनी बंदिशें…उफ़्फ़!

कुछ मन तो साइलेंट ही पड़ चुके हैं। ये ठीक नहीं हैं। दिखावे की दुनिया में जो असली चीज़ें हैं वो मरती जा रही हैं। उम्मीद है कि कोई तो इन्हें ज़िंदा रखेगा। दुआ कीजियेगा कि उन कोई में "आप" और "हम" भी हों। वरना सबकी तरह बनने और दुनिया के रंग में ढलने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी। फिर सोचते रहिएगा।  

Saturday, 14 March 2015

एक शख़्स

एक शख़्स, जो  कहता है कि वो उसकी परवाह करता है, उससे मुहब्बत करता है; मगर अपनी कामकाजी दुनिया में बहुत व्यस्त है, इतना कि उसके साथ कुछ लम्हें बिताने का भी समय नहीं। वो हर दिन एक उम्मीद लगाती है कि शायद आज वो उससे बात करने की कोशिश करेगा, या कल वो उससे मिलने की योजना बना रहा होगा। बस इन्हीं ख्यालों के साथ उसकी ज़िन्दगी का हर दिन बीत रहा है। अब शायद इंतज़ार करना मुश्किल हो रहा है और धीरे-धीरे उसके अंदर उस एक शख़्स को अपने साथ देखने की उम्मीद मर रही है। वो शख़्स जो उसे अपना ख़ास कहता है, वो अचानक ही उससे बात करने में हिचकिचाने लगी है।

अभी उसे उसकी ख़ास हुए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ है। साथ ही उसे ये भी समझना होगा कि कोई यूँहीँ किसी का नहीं हो जाता। मुहब्बत मज़ाक नहीं है, और न ही इतनी आसान कि कोई कभी भी किसी के भी इश्क़ में डूब जाए। शायद वो उम्र के उस पड़ाव पर है जहाँ इश्क़ के जज़बातों की गहराई को समझना सरल है, बशर्ते उसमें इतना साहस हो।

वो शख्स कितना व्यस्त है ये वो नहीं जानती, पर शायद इतना समझती है कि जो हमारे ख़ास होते हैं, उनसे वो बेझिझक बात करती है। उनसे कुछ भी कहने से पहले उसे कोई भी योजना बनाने की ज़रुरत नहीं पड़ती। बेबाक़ अपनी बात कहती है।

मग़र ग़ौर फ़रमाने की बात ये है कि उस शख़्स से कोई भी बात करने से पहले उसे दस बार सोचना पड़ता है कि क्या बात करनी है, क्या कहना चाहिए। और उस पर तंज़ ये है कि 'वो' कभी कुछ कहता ही नहीं। एक शख्स ने  उसे अपना ख़ास क्या कह दिया, वो तो हज़ारों सपने और उम्मीदें सजा बैठीं। पागल है वो।

जिस शख्स पर वो अपना हक़ जताने  से घबराती हो, वो उसे अपना ख़ास शायद ही समझता होगा। इतनी नादान क्यों है वो, सच को समझने की कोशिश क्यों नहीं करती? वैसे भी उसे उस शख़्स से तो कभी मुहब्बत थी ही नहीं। पर अब जब वो उससे दूरियाँ बढ़ा रहा है, तो उसे इतनी तकलीफ़ क्यों हो रही है?

वो कभी कुछ नहीं समझ पाएगी, हमेशा यूँही भटकती रहेगी। अतीत के काले बादलों ने उसे इस क़दर घेरा है कि उसे रोशनी की ओर जाने का रास्ता ही नहीं मिल रहा। वो हमेशा उन बादलों में घिरी रहेगी। कोई उसे उन अंधेरों से बाहर नहीं ला सकेगा क्यूँकि न तो उसमें खुद इतना धैर्य है, और न ही उस एक शख्स में इतनी हिम्मत कि उसे उन अंधेरों से बाहर खींच ले। उसने तो उसे सियहख़ाने से बाहर लाने के लिए उसकी ओर अपना हाथ बढ़ाया था, पर वो ही उसे थामने का साहस नहीं दिखा पायी। अफ़सोस।


Monday, 2 February 2015

हँसना भूल जाते हैं लोग !!

सुना है कि पैसा कमाने की चाहत रखने वाले दिन-रात मेहनत करते हैं, इतनी कि उन्हें दिन और रात देखना ही नसीब नहीं होता। शायद वे समझते नहीं हैं कि वक़्त क्या होता है, या हो सकता है कि व्यावहारिक तौर पर वक़्त की क़ीमत उनसे ज़्यादा और कोई नहीं समझता। 

इसमें कोई शक़ नहीं कि सालों तक बड़ी-बड़ी इमारतों में शानदार सेट-अप में काम करने वाले लोग बहुत अनुभवी होते हैं। ऐसा मेरी समझ समझती है। ऐसे लोगों को देख ऐसा लगता है, मानो जीना ही भूल गए हैं। उनकी ज़िन्दगी उनकी अपनी नहीं है। जो नहीं चाहते, वही करते चले जा रहे हैं। भागती ज़िन्दगी के साथ कदम मिलाने की कोशिश तो कर रहे हैं, पर शायद पिछड़ते ही जा रहे हैं। भागने का भी कोई ख़ास फायदा नहीं नहीं हो रहा है। दौड़ लगाते-लगाते हाँफने लगे हैं। इतने व्यस्त हो गए हैं कि भूल जाते हैं कि दिन में एक बार मुस्कुरा लेने से वो थकान, घुटन और चिड़चिड़ापन ख़त्म हो जाएगा। कुछ पल के लिए ही सही, पर गर्व महसूस होगा, इस बात का कि आज हमने एक हँसी हंसी। 

ऐसा कहना ग़लत होगा कि वे हँसने से वंचित ही हो चुके हैं। हल्की-सी मुस्कान की झलक तो दिखेगी उन चेहरों पर, मगर वो मात्र किसी का उपहास उड़ा लेने भर को होगी। यह भी एक ज़रूरी हिस्सा है उन लोगों के जीवन का, जो खुद के लिए हँस नहीं पाते।  

पर इतना कर पाने की फुरसत हर दिन तो नहीं मिलती। ये बात हम और आप नहीं समझ सकते। उनकी जगह होते, उस दौर में जिए होते, तो एहसास होता कि वे क्या झेल रहे हैं। उनकी तरसती आँखों के पीछे क्या सच्चाई छिपी है, ये जानना आसान नहीं और शायद जानने की ज़रुरत भी नहीं, क्यूँकि वो आपको कुछ नहीं बताएँगे। आपको समझना चाहिये कि जिन लोगों के पास मुस्कुराने का समय नहीं है, वो आपको अपनी कहानी कैसे सुनाएंगे। 

मगर सच सिर्फ एक ही है, और वो है "पैसा"। इसके बिना कोई नहीं जी सकता। हम, आप, और वो सभी लोग जो अपनी खोयी हुई मुस्कान से परेशान तो हैं, मग़र हो सकता है कि उसे ढूंढने की कोशिश नहीं कर रहे। न ही अब उसे वापस पाना चाहते हैं। जो जैसा चल रहा है, उसी को अपनी ख़ुशी मान बैठे हैं, संतुष्ट हैं और उसे स्वीकार करते जा रहे हैं। परिवर्तन की उम्मीद रखते होंगे शायद, लकिन कुछ कर पाने में असमर्थ हैं। 

ख़ैर, कोई बात नहीं। पैसा कमाना ज़रूरी है, लेकिन आय की चाहत में खुद को मत खोइए। आजकल लोग एक-दूसरे को जानवर से भी बत्तर बताने लगे हैं। ये ठीक नहीं है। चीज़ों को स्वीकार करना सही है, मगर ग़लत की आदत डाल लेना और वही चीज़ आगे आने वाली पीढ़ी को सिखाना अमान्य है। 

आप अपने जैसे ही रहिये, क्यूँकि अगर आप "आप" ना रहे, तो उस आमदनी और अनुभव का क्या होगा जो आपने इतने साल जी कर कमाया है। कृप्या हँसिये, उपहास उड़ाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को खुश रखने के लिए। उस कागज़ के टुकड़े को, जो आपने दिन-रात एक कर के कमाया है, रद्दी न बनाइये।