सुबह के आठ बजकर छत्तीस मिनट हो रहे हैं। मैं इस वक़्त ग़ाज़ियाबाद से चलकर नई दिल्ली तक जाने वाली एक लोकल ईएमयू ट्रेन में बैठकर दफ़्तर जा रही हूँ। हाथों में एक काग़ज़ का टुकड़ा और लाल रंग की कलम लिए, कानों में इयरफोन लगाए मैं इस गाड़ी के महिला डिब्बे में एक खिड़की वाली सीट के पास किसी चट्टान की तरह अडिग बैठी हुई हूँ। एक ग़ज़ल जो मेरे कानों में बज रही है आज मुझे कुछ ख़ास अच्छी नहीं लग रही।
इस ट्रेन के बाहर मैं कुछ ढूंढ़ रही हूँ -- शायद सुकून। अफ़सोस कि खिड़की से बाहर दिखने वाले ये नज़ारे मुझे मेरे ज़िंदा होने का एहसास नहीं दिला पा रहे। मैं कुछ लिख रही हूँ पर मेरे हाथ काँप रहे हैं। लग रहा है जैसे ये कलम मेरे हाथ से छूटकर अभी नीचे गिर जाएगी।
सहसा वो ग़ज़ल जो मेरे कानों में चिल्ला रही थी, ख़त्म हो चुकी है। अब एक नया गाना बज रहा है। मुझे इन गानों की हेर-फेर तो समझ आ रही है, लेकिन मैं इन्हें सुनकर भी सुन नहीं पा रही हूँ। ये सिर्फ इसलिए चल रहे हैं क्योंकि मैं शायद इस दुनिया से भागने का कोई रास्ता तलाश रही हूँ।
अचानक अपनी आँखों में मुझे पत्थर से चुभते महसूस हो रहे हैं। अरे नहीं! ये तो मेरे आँसूं हैं।
हाँ, एक आँसूं अभी-अभी इसी कागज़ पर टपका जिसपे मैं पिछले दस मिनट से अपने मन का ग़ुबार उतारने की कोशिश कर रही हूँ। मगर मैंने ऐसी कोई बात नहीं लिखी है जो सचमुच "बात" हो। मैं सिर्फ़ कुछ हर्फ़ों का अपनी कलम की नोक तले क़त्ल कर रही हूँ।
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दो स्टेशन जा चुके हैं। तीसरे स्टेशन से भी अब गाड़ी चल पड़ी है। मैं अभी तक समझ नहीं पा रही हूँ कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ। |
दो स्टेशन जा चुके हैं। तीसरे स्टेशन से भी अब गाड़ी चल पड़ी है। मैं अभी तक समझ नहीं पा रही हूँ कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ। लिखते-लिखते हर दो सेकेंड बाद मेरी निगाहें फिर इस गाड़ी की खिड़की के बाहर तकती जा रही हैं, पर बाहर का कोई भी मंज़र मुझे इस कागज़ पर उतारने लायक नहीं लगता।
आखिर क्या लिखूं? इस खिलखिलाती धूप की किरणें, इन पेड़ों की घनी छाया, इस छुक-छुक करती रेलगाड़ी का कान-फोड़ता शोर, पटरियों पर लावारिस से बिछे ये पत्थर या अगले पांच मिनट में जिस यमुना नदी का मुझे दीदार होने को है -- उसका नदी से गटर बनने तक का सफ़र ?
मैं हर रोज़ ही यमुना को तकती हूँ। पता नहीं मुझे इसमें क्या इतना अच्छा लगता है।
फिलहाल वो पांच मिनट बीत गए हैं और यमुना के काले पानी में मेरी निगाहें गड़ी हुई हैं। ये गाड़ी इस वक़्त यमुना के ऊपर से गुज़र रही है और धीरे-धीरे ये दिलवालों की यमुना मेरी आँखों से ओझल होती जा रही है।
यमुना पार कर एक स्टेशन आया है। इस के बाद वाले स्टेशन पर मुझे उतरना है।
मेरे आस-पास कुछ लोग हैं जो काफ़ी देर से मेरे हाथ में महफ़ूज़ इस कागज़ और कलम को देख रहे हैं। एक माहिला ने मेरे इस काग़ज़ में झाँककर कुछ समझने की कोशिश भी की है। पर उसकी क़िस्मत ख़राब है शायद क्योंकि अब से कुछ घंटों बाद ये अपना लिखा मैं ख़ुद भी नहीं पहचान पाऊँगी।
अचानक मेरे ज़हन में एक सवाल आया है। "क्या ये लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि पिछले आधे घंटे से मैं क्या लिखती चली जा रहो हूँ?"
जवाब नहीं है मेरे पास।
यमुना को पीछे छोड़ हम जिस स्टेशन पर पहुँचे हैं, वहाँ कुछ महिलाएँ उतर गईं हैं। ये डब्बा आधा खाली हो गया है। अब अगले स्टेशन पर मुझे भी उतरना है।
गाड़ी फिर से चल दी है। दो मिनट बाद मेरा स्टेशन आ जाएगा। मैंने फिर खिड़की के बाहर झाँकना शुरू कर दिया है। मैं शायद फिर इन हवाओं में -- जो मेरे चेहरे को छूकर गुज़र रही हैं, मेरी लटों को बार-बार मेरे माथे पर ला रही हैं -- एक आखिरी बार अपने होने के एहसास को पाने की कोशिश कर रही हूँ।
इस एहसास को खोजते-खोजते मुझे एकदम प्रतीत हुआ है कि गाड़ी रुक गई है। और इसी के साथ मेरी कलम भी।
समय हो रहा है नौ बजकर पांच मिनट। मैं अब ट्रेन से उतर रही हूँ। मेरे कदम दफ़्तर की ओर बढ़ रहे हैं उसी ख़याल को ज़हन में किसी बोझ की तरह ढोए जिसे लिखने के लिए मैंने ये काग़ज़ और कलम निकली थी, मगर कुछ नहीं लिखा।
और हाँ! वो आँसूं जो इस काग़ज़ पर टपका था, उसकी वजह मुझे अब तक नहीं मालूम।
बहरहाल, मेरी प्लेलिस्ट में अगला गाना आ गया है -- "एक हो गए हम और तुम......... हम्मा हम्मा हम्मा।"