Monday, 24 December 2018

सुनो, मैं जा रही हूँ।

"सुनो।"
"जी बोलिये।"

"मैं जा रही हूँ।"
"कहाँ?"

"तुम्हें छोड़कर।"
"अरे! पर कहाँ?"

"इससे तुम्हें क्या?"
"शादी कर रही हो क्या ?"

"इससे भी तुम्हें क्या ?"
"अरे! दोस्तों को तो बता ही सकते हैं।"

"तुम मेरे दोस्त नहीं हो।"
"अब बता भी दो। मैं कौन-सा कुछ बिगाड़ दूंगा?"

"अब इससे ज़्यादा क्या बिगाड़ोगे ?"
"बताओ भी।"

"बताना महज़ इतना है कि अब हम कभी नहीं मिलेंगे।"
"मग़र क्यों ?"

"क्योंकि ये दुनिया बहुत बड़ी है और हम दोनों के पास वक़्त बहुत कम है।"
"पर क्या हम दोस्त नहीं रह सकते ?"

उसने उसके आख़िरी सवाल का जवाब नहीं दिया। जवाब शायद उसे मालूम था। 

आज भी कई सवाल उसके दिमाग की नसों में रेंगते रहते हैं, क़िस्मत शायद जिनके जवाब तलाश रही है।  

Sunday, 15 July 2018

इश्क़-ए-चाय

उस कप को और हर सुबह ठीक साढ़े दस बजे उसमें डलने वाली चाय को शायद उसके होठों का ज़ायका बेहद पसंद था।

पहली बार दंसवी कक्षा में उसके होठों ने चाय को चूमा था और उसके बाद साल-दर-साल उसकी चैय्यास बढ़ती चली गई। धीरे-धीरे चाय के लिए उसका जूनून बढ़ रहा था पर इस बात का एहसास उसे नौकरी का तनाव झेलने के बाद हुआ। अक्सर लोगों को ये देर से समझ में आता है कि वे इश्क़ में हैं। 

उसे चाय से बेइन्तेहाँ मुहब्बत थी। पर उस दिन उसने तय किया कि वो दफ़्तर पहुँच कर चाय नहीं पियेगी। 

वो पहुँची, उसने कंप्यूटर ऑन किया और काम करने लगी। इतना मशगूल हो गई कि नज़र डेस्क पर सामने रखे कप पर पड़ी तक नहीं । 

साढ़े दस बजे, सवा ग्यारह भी और आख़िर में साढ़े ग्यारह बजे उसके कानों को एक आवाज़ ने छुआ, "मैडम आज आप चाय नहीं पियेंगी?"

"नहीं, मन नहीं है।"

"अरे मैडम! चाय बुरा मान जाएगी।"

"अरे भैया! आप भी ना। चलिए ठीक है ले आइये एक चाय," उसने हँसते हुए पैंट्री वाले को पैसे दिए और फिर काम में लग गई।

चाय के आने तक एसी की ठंडक ने उसे जकड़ लिया था। ज़ुखाम और बढ़ गया था। आँखें जल रही थीं। बुख़ार जिस्म तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था। 

उसे चाय से बेइन्तेहाँ मुहब्बत थी। पर उस दिन उसने तय किया कि वो दफ़्तर पहुँच कर चाय नहीं पियेगी। 

पैंट्री वाला चाय कप में डालकर जा चुका था। पर वो काम के चलते उसे तवज्जो देना भूल गई। 

अचानक उसकी सीट के पास लगे पंखे ने दिशा बदली और एक हवा के झोंके से चाय की ख़ुशबू उसकी नाक से टकराई। उसे महसूस हुआ कि चाय कप में पड़ी-पड़ी उसके होठों को तक रही है। उसने तुरंत मुस्कुराते हुए कप उठाया और इश्क़-ए-चाय मुक़म्मल हुआ। उसके होठों की लाली ने उस कप की तलब को तसल्ली दी जो महीनों से उनके कोमल स्पर्श की आदि थी।  

जिस्म को जब चाय की गर्मी मिली तो बुख़ार ने किनारा कर लिया। वो फिर काम में व्यस्त हो गई। दिन बीत गया और शाम को जल्दी घर जाने के कारण वो डेस्क पर झूठा कप ही छोड़ गई। 

रात को सोने से पहले अलार्म लगाने के लिए मोबाइल उठाया तो व्हाट्सएप्प पर कुछ सन्देश आये हुए थे। एक मैसेज उसका भी था। लाल लिपस्टिक के निशान को फोकस करते हुए उसने उसके कप की एक फोटो खींचकर उसे भेजी थी। मैसेज में लिखा था "तुम नहीं सुधरोगी।" वो दफ़्तर में उसकी आख़िरी नाईट शिफ्ट थी। 

अगले दिन उसके डेस्क पर उस लिपस्टिक लगे कप की जगह उसका कप रखा था। 


Tuesday, 29 May 2018

स्टोरी

"यार तुम पत्रकार भारतीय रेल की बुरी हालत पर कोई स्टोरी क्यों नहीं करते?"
"माफ़ कीजियेगा मोहतरमा, ये मेरी बीट नहीं है।"

"अरे इतने बड़े पत्रकार हो, किसी बीट वाले को ढूंढ़ो। मुझे पता है तुम अगर स्टोरी कर नहीं सकते तो कम से कम करवा तो ज़रूर सकते हो।"
"तुम बड़ा जानती हो मुझे।"

"और नहीं तो क्या।"
"वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि आपके आयडल मशहूर पत्रकार रविश कुमार जी ने अपने प्राइम टाइम में इंडियन रेलवेज़ पर एक पूरी सिरीज़ की है।"

"मुझे पता है। पर अफ़सोस मैंने उसका एक भी एपिसोड नहीं देख पाया।"
"ओह! क्यों?"

"कुछ महीनों से टीवी ख़राब है और ज़िंदगी में मसरूफ़ियत इतनी है कि बेचारे को ठीक करवाने का समय ही नहीं मिलता। अब यूट्यूब पर देखूंगी। "
"हम्म! बात तो सही कह रही हो तुम। हर कोई बड़ा बिज़ी है आजकल।"

"हां, तुम्हें कब मेरी कोई बात लगती है।"
"तुम कभी कुछ ग़लत कहती ही नहीं।"

"हां, तो मानो मेरी बात। करवा दो एक और स्टोरी।"
"पर कहानी है क्या?"

ये जो दूर तक ले जाने वाली रेलगाड़ियां हर रोज़ लेट होती हैं, इनके कारण सभी लोकल ट्रेनें भी देरी से चलती हैं और दिल्ली के दफ़्तरों में जाने वाले डेली कम्मयूटर्स बहुत परेशान होते हैं। 

"ये जो दूर तक ले जाने वाली रेलगाड़ियां हर रोज़ लेट होती हैं, इनके कारण सभी लोकल ट्रेनें भी देरी से चलती हैं और दिल्ली के दफ़्तरों में जाने वाले डेली कम्मयूटर्स बहुत परेशान होते हैं।"
"ये तो होगा ही। ज़ाहिर-सी बात है। पर लगता है तुम सबसे ज़्यादा परेशान होती हो।"

"मैं भला क्यों परेशान होंगी? मैं तो मेट्रो में चलती हूं ना।"
"हां, तुम्हारे माथे पर शिकन तो सिर्फ़ उस एक लम्हे में आती है जब तुम हर सुबह उस लोकल ट्रेन से उतरकर अपने पांव मेरे दफ़्तर ले जाने वाले मोड़ की ओर बढ़ाती हो और मुझसे मिले बिना ही चली जाती हो।"

Sunday, 1 April 2018

8:20 वाली लोकल का सफ़र

सुबह के आठ बजकर छत्तीस मिनट हो रहे हैं। मैं इस वक़्त ग़ाज़ियाबाद से चलकर नई दिल्ली तक जाने वाली एक लोकल ईएमयू ट्रेन में बैठकर दफ़्तर जा रही हूँ। हाथों में एक काग़ज़ का टुकड़ा और लाल रंग की कलम लिए, कानों में इयरफोन लगाए मैं इस गाड़ी के महिला डिब्बे में एक खिड़की वाली सीट के पास किसी चट्टान की तरह अडिग बैठी हुई हूँ। एक ग़ज़ल जो मेरे कानों में बज रही है आज मुझे कुछ ख़ास अच्छी नहीं लग रही।

इस ट्रेन के बाहर मैं कुछ ढूंढ़ रही हूँ --  शायद सुकून। अफ़सोस कि खिड़की से बाहर दिखने वाले ये नज़ारे मुझे मेरे ज़िंदा होने का एहसास नहीं दिला पा रहे। मैं कुछ लिख रही हूँ पर मेरे हाथ काँप रहे हैं। लग रहा है जैसे ये कलम मेरे हाथ से छूटकर अभी नीचे गिर जाएगी।

सहसा वो ग़ज़ल जो मेरे कानों में चिल्ला रही थी, ख़त्म हो चुकी है। अब एक नया गाना बज रहा है। मुझे इन गानों की हेर-फेर तो समझ आ रही है, लेकिन मैं इन्हें सुनकर भी सुन नहीं पा रही हूँ। ये सिर्फ इसलिए चल रहे हैं क्योंकि मैं शायद इस दुनिया से भागने का कोई रास्ता तलाश रही हूँ।

अचानक अपनी आँखों में मुझे पत्थर से चुभते महसूस हो रहे हैं। अरे नहीं! ये तो मेरे आँसूं हैं।

हाँ, एक आँसूं अभी-अभी इसी कागज़ पर टपका जिसपे मैं पिछले दस मिनट से अपने मन का ग़ुबार उतारने की कोशिश कर रही हूँ। मगर मैंने ऐसी कोई बात नहीं लिखी है जो सचमुच "बात" हो। मैं सिर्फ़ कुछ हर्फ़ों का अपनी कलम की नोक तले क़त्ल कर रही हूँ।

दो स्टेशन जा चुके हैं। तीसरे स्टेशन से भी अब गाड़ी चल पड़ी है।
 मैं अभी तक समझ नहीं पा रही हूँ कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ। 

दो स्टेशन जा चुके हैं। तीसरे स्टेशन से भी अब गाड़ी चल पड़ी है। मैं अभी तक समझ नहीं पा रही हूँ कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ। लिखते-लिखते हर दो सेकेंड बाद मेरी निगाहें फिर इस गाड़ी की खिड़की के बाहर तकती जा रही हैं, पर बाहर का कोई भी मंज़र मुझे इस कागज़ पर उतारने लायक नहीं लगता।

आखिर क्या लिखूं? इस खिलखिलाती धूप की किरणें, इन पेड़ों की घनी छाया, इस छुक-छुक करती रेलगाड़ी का कान-फोड़ता शोर, पटरियों पर लावारिस से बिछे ये पत्थर या अगले पांच मिनट में जिस यमुना नदी का मुझे दीदार होने को है -- उसका नदी से गटर बनने तक का सफ़र ?

 मैं हर रोज़ ही यमुना को तकती हूँ। पता नहीं मुझे इसमें क्या इतना अच्छा लगता है।

फिलहाल वो पांच मिनट बीत गए हैं और यमुना के काले पानी में मेरी निगाहें गड़ी हुई हैं। ये गाड़ी इस वक़्त यमुना के ऊपर से गुज़र रही है और धीरे-धीरे ये दिलवालों की यमुना मेरी आँखों से ओझल होती जा रही है।

यमुना पार कर एक स्टेशन आया है। इस के बाद वाले स्टेशन पर मुझे उतरना है।

मेरे आस-पास कुछ लोग हैं जो काफ़ी देर से मेरे हाथ में महफ़ूज़ इस कागज़ और कलम को देख रहे हैं। एक माहिला ने मेरे इस काग़ज़ में झाँककर कुछ समझने की कोशिश भी की है। पर उसकी क़िस्मत ख़राब है शायद क्योंकि अब से कुछ घंटों बाद ये अपना लिखा मैं ख़ुद भी नहीं पहचान पाऊँगी।

अचानक मेरे ज़हन में एक सवाल आया है। "क्या ये लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि पिछले आधे घंटे से मैं क्या लिखती चली जा रहो हूँ?"

 जवाब नहीं है मेरे पास।

यमुना को पीछे छोड़ हम जिस स्टेशन पर पहुँचे हैं, वहाँ  कुछ महिलाएँ उतर गईं हैं। ये डब्बा आधा खाली हो गया है। अब अगले स्टेशन पर मुझे भी उतरना है।

गाड़ी फिर से चल दी है। दो मिनट बाद मेरा स्टेशन आ जाएगा। मैंने फिर खिड़की के बाहर झाँकना शुरू कर दिया है। मैं शायद फिर इन हवाओं में -- जो मेरे चेहरे को छूकर गुज़र रही हैं, मेरी लटों को बार-बार मेरे माथे पर ला रही हैं --  एक आखिरी बार अपने होने के एहसास को पाने की कोशिश कर रही हूँ।

इस एहसास को खोजते-खोजते मुझे एकदम प्रतीत हुआ है कि गाड़ी रुक गई है। और इसी के साथ मेरी कलम भी।

समय हो रहा है नौ बजकर पांच मिनट। मैं अब ट्रेन से उतर रही हूँ। मेरे कदम दफ़्तर की ओर बढ़ रहे हैं उसी ख़याल को ज़हन में किसी बोझ की तरह ढोए जिसे लिखने के लिए मैंने ये काग़ज़ और कलम निकली थी, मगर कुछ नहीं लिखा।

और हाँ! वो आँसूं जो इस काग़ज़ पर टपका था, उसकी  वजह मुझे अब तक नहीं मालूम।

बहरहाल, मेरी प्लेलिस्ट में अगला गाना आ गया है -- "एक हो गए हम और तुम......... हम्मा हम्मा हम्मा।"

Saturday, 3 February 2018

शहर और मोहब्बत

हम सभी का जन्म किसी शहर, गाँव या ज़िले में हुआ है। मेरे इस लेख में शहर का ज़िक्र है क्योंकि मेरा जन्म शहर में हुआ है। अगर आप इसे पढ़ रहे हैं तो इसे उस जगह से जोड़कर पढ़िए जहाँ आपका जन्म हुआ है।

ये ज़ाहिर- सी बात है कि मैं, आप, हम सभी किसी न किसी शहर में तो जन्मे हैं, पले-बढ़े हैं। इसी पलने-बढ़ने के दौरान हम अपने शहर की गलियों से वाक़िफ़ होने लगते हैं। हर रोज़ उन्हीं सड़कों पर चलना, एक ही चौराहे से गुज़रना, बसों और ऑटो में चढ़ना, पड़ोसियों से मिलना-जुलना, उन्हें जानना - ये सब हमें अपने शहर की मिटटी से जोड़ता है। और जब हम इस मिट्टी से जुड़ने लगते हैं, यक़ीनन हमें अपने शहर से प्यार होने लगता है।

एनसीआर - नेशनल कैपिटल रीजन - एक ऐसा इलाका है जिसमें कैपिटल है हमारी राजधानी दिल्ली और इससे जुड़े हुए हैं कुछ और शहर - ग़ाज़ियाबाद, नॉएडा, फरीदाबाद और गुड़गांव। इस एनसीआर की ख़ास बात ये है कि यहाँ किसी भी अजनबी से मुलाक़ात हो तो ये पता चलता है कि वो शख़्स अपना शहर छोड़कर यहाँ नौकरी करने के लिए आया है। हालाँकि कुछ और शहर जैसे सपनों की नगरी मुंबई, बंगलुरू और चेन्नई जैसे अन्य बड़े शहरों के पास भी ये विशेषाधिकार है।

मेरा वास्ता एनसीआर से है तो बात यहाँ की। मध्य प्रदेश, बंगाल, राजस्थान, असम, जम्मू कश्मीर, हरियाणा, पंजाब और लगभग हर राज्य से कोई ना कोई हमसे यहाँ टकरा ही जाता है। यहाँ तक कि बाहर देश के लोग भी। कितने लोग अपना वो शहर छोड़कर, जहाँ उनका जन्म हुआ, जहाँ उनका अपना घर है, माता-पिता हैं, भाई-बहन हैं, किसी दूसरे शहर में जीवन-यापन के साधन खोज उसमें इतना व्यस्त हो जाते हैं कि फिर शायद ही कुछ याद रह जाता है। ज़िन्दगी तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ने लगती है और सब कुछ ठीक ही मालूम होता दिखाई देता है।

हम नए शहर के रंग-ढंग में ढलने लगते हैं, चीज़ो को नए सिरे से देखने और समझने की कोशिश करने लगते हैं। कई बार सफल तो कई बार असफल हो जाते हैं।

रिवाज तो यही है कि शहरों में लोग बसते हैं, पर कभी-कभी लोगों में शहर भी बसता है। 

पर सौ बात की एक बात ये है कि कभी-कभी जब हम इस नए शहर से ऊब जाते हैं, तब ये होता है कि हमें अपना घर, अपना शहर, अपने लोग याद आने लगते हैं। ये एहसास होने लगता है कि हमारा शहर भी हमें उतना ही चाहता है जितना हम उसे आज तक चाहते आये हैं या इस पल से पहले कभी चाहते थे। ये वो पल होता है जब हमें ये लगने लगता है कि हमारा शहर हमें बुला रहा है - अभी, इसी वक़्त।

याद इतनी गहरी होती है कि बेक़रारी बढ़ने लगती है। पर ये बेक़रारी मिट तब जाती है जब इस नए शहर में कोई 'अपने' उस शहर वाला टकरा जाए जिसे हम छोड़कर आये हैं। वही अपनापन, वही मीठी बोली, वही व्यवहार - ये सब कुछ पल का सुकून मयस्सर कर देते हैं।

रिवाज तो यही है कि शहरों में लोग बसते हैं, पर कभी-कभी लोगों में शहर भी बसता है। जिन रास्तों, सड़कों, चौराहों, गलियों, मंदिर- मस्जिदों से हम वास्ता रखते हैं, वही वास्ता कोई और भी रखे तो हम अपने शहरीपन को और बेहतर महसूस कर सकते हैं, अपने भीतर अपने शहर की यादों से सदा अथक मोहब्बत कर सकते हैं और जब जैसे चाहें उसे जी सकते हैं।