Monday, 28 March 2016

माँ- शब्द ही काफ़ी है

बचपन से हम पढ़ते और सुनते आये हैं कि माँओं में बहुत हौंसला होता है। हर मुश्किल को बड़ी ही आसानी से झेल जाती हैं हमारी माँएं, ख़ासतौर पर अपने बच्चों के लिए तो वो कुछ भी कर-गुज़रने का हौंसला रखती हैं।

पर ज़िन्दगी में हम किताबों और शिक्षकों द्वारा पढ़ाई गयी बातों से ज़्यादा अपने खुद के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखते हैं। ऐसा ही एक तजुर्बा मैं साझा करने जा रही हूँ, पढ़ियेगा :

सुबह-सुबह हम अस्पताल पहुँचे, माँ को वार्ड में ले जाकर कपड़े बदलने को कहा गया। आसमानी रंग के मरीज़ों वाले कपड़े पहन कर माँ बिस्तर पर लेट गई। मैं वहीँ उनके पास बैठकर उन्हें बातों में उलझाने लगी। हालाँकि ऑपरेशन ज़्यादा बड़ा नहीं था, पर फिर भी कहीं-न-कहीं हम दोनों घबरा रहे थे। मोबाइल में उनकी तसवीरें लेकर मैं उनका ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही थी, पर वो भी शायद सब कुछ समझ रही थीं। उनके होठों पर सजी मंद-मंद मुस्कान डर को छिपाने में सफल थी।

थोड़ी ही देर बाद डॉक्टर साहिबा आ गईं। आते ही उन्होंने माँ से पूछा- "तैयार हो?"

"हाँ डॉक्टर साहिब," माँ ने धीमे स्वर में कहा।

तभी एक नर्स एक ट्रे में न जाने कितने प्रकार के इंजेक्शन्स और कई अन्य सामान ले आई। इतना सब देखकर मेरी आँखें फटी रह गईं। मेरा पहला अनुभव था। पहले कभी इस तरह की स्थिति से सामना नहीं हुआ था। अब घर की बड़ी बेटी होने के नाते सब कुछ मुझे सम्भालना था। यद्यपि ज़िम्मेदारी मुझपर थी, लेकिन पापा से ज़्यादा नहीं। वो भी हमारे साथ ही मौजूद थे और मुझसे भी ज़्यादा भाग-दौड़ कर रहे थे।

नर्स ने पहले माँ के बाएं हाथ में इंजेक्शन लगाया, फिर कमर में। मुझसे देखा तो नहीं जा रहा था पर मैंने निश्चय किया था कि आज अपना इम्तिहान मुझे खुद ही लेना है, बिना डरे सभी इंजेक्शन्स का सामना करना है। कुछ ही पलों में मुझे महसूस होने लगा कि मैं धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही थी। जब तीसरा इंजेक्शन लग रहा था, मेरे पैर काँपने लगे और मैं साइड में रखे स्टूल पर बैठ गई। सर बहुत तेज़ चकरा रहा था पर इरादा यही था कि माथे पर कोई शिकन ना दिखे।

बाहर से एक बूढ़ी महिला व्हीलचेयर लेकर आयीं जिस पर बैठकर माँ को ऑपरेशन थिएटर जाना था। मेरा शरीर पूरी तरह से काँप रहा था पर मैं किसी तरह माँ को चेयर तक ले गई और उन्हें बिठाते ही अपने होश खो बैठी।

हल्की-हल्की आवाज़ से पापा को पुकारने लगी पर मन में एक ही ख़्याल चल रहा था कि माँ के आगे कमज़ोर नहीं पड़ना है। अफ़सोस, मैं हार गई। माँ की व्हीलचेयर मुझसे दूर जाती जा रही थी पर मुझे सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था। जो थोड़ा-बहुत याद है वो ये कि माँ बार-बार पलट-पलट कर मुझे देख रही थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरी ऐसी हालत देखकर उन्हें बहुत बुरा लग रहा होगा लेकिन वो जल्दी ही मेरी आँखों से ओझल हो गईं।

मैं अभी तक पापा का हाथ थामे खड़ी थी। अचानक एक और नर्स कुर्सी लेकर आई। मुझे बिठाया गया, पानी पिलाया गया। हल्ला होने लगा कि इसको एडमिट कर दो पर मैं जानती थी कि मुझे एडमिट होने की कोई ज़रूरत नहीं। ये सच है कि सर बहुत तेज़ घूम रहा था और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा था, लेकिन मुझे कमज़ोर नहीं पड़ना था बस।

चेहरा पसीना-पसीना हो गया था। मैं कुछ देर कुर्सी पर बैठी, गहरी सांस ली और ठीक महसूस करने लगी।

अब मुझे इंतज़ार था बस माँ के लौट आने का। वार्ड में अकेले ख़ामोश बैठी मैं माँ का इंतज़ार कर रही थी।  क़रीब दो घंटे बाद उन्हें वहाँ शिफ्ट किया गया। एनेस्थीसिया का असर अभी भी था। वो चुपचाप लेटी हुई थीं किसी मासूम बच्चे की तरह। मैं बस उनके पास बैठकर उन्हें देखती जा रही थी, सुकून और शान्ति महसूस हो रही थी। उनके चेहरे पर वो हौंसला पढ़ने की कोशिश कर रही थी जिसकी मदद से वो इतने सालों से हमें पालती-पोसती आई थीं, हर परेशानी से जूझती आई थीं, और उस दिन ऑपरेशन थिएटर से वार्ड के उस बिस्तर तक आई थीं ।

सब कुछ साफ़-साफ़ लिखा था उस चेहरे पर- वो हौंसला, वो संघर्ष, वो जज़्बा, वो हिम्मत और ये ज़िन्दगी। 



Sunday, 13 March 2016

बदलता वक़्त, बदलते लोग

एक साल बीत चुका था। उस दिन फिर वैसी ही सुबह थी। ठंडी-ठंडी हवा का एहसास और नॉएडा की सड़कों पर तेज़ रफ़्तार से चलती एक गाड़ी जिसमें हम सब सवार थे (मैं और मेरे कुछ सहकर्मी)।

शायद एक अरसे बाद सूरज को सुबह-सवेरे किरणें बिखेरते हुए देखा था। अच्छा महसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था मानो गाड़ी में बैठे-बैठे पूरा नॉएडा घूम लिया हो। रास्ते में बड़े-बड़े बिल्डरों के बड़े-बड़े हाउसिंग प्रॉजेक्ट के ज़रिये नॉएडा की बदलती सूरत देखने को मिल रही थी। हो सकता है इसी वजह से एक 'ग्रेटर' नॉएडा की आवश्यकता आन पड़ी है। एक सेक्टर तो ऐसा था, देखकर लगा मानो यहाँ बिल्डिंगों की बाढ़-सी आ गई हो। और चलते-चलते पिछली बार की तरह हम इस बार भी ग्रेटर नॉएडा में स्थित स्टेलर जिमख़ाना पहुंच गए। वहाँ की हरी घास, बड़ी-सी बिल्डिंग, झील, फ़ूल, पौधे और बड़ा-सा मैदान उस जिमख़ाने की खूबसूरती को साफ़-साफ़ बयाँ कर रहा था।

मैदान क्रिकेट खेलने के लिए बिल्कुल तैयार था, हम सब भी पूरी तरह कमर कसकर मैदान में उतर गए। एकाएक ही बारिश ने मौसम का रुख़ बदल दिया, मग़र हम भी कहाँ हार मानने वाले थे। सब लोगों पर बैट और बल्ले का ऐसा जूनून सवार था कि आख़िरकार बारिश को हार माननी ही पड़ी।

बारिश बंद हुई और खेल शुरू हुआ। मुझे किसी टीम का 'एक्स्ट्रा प्लेयर' रखा गया था। अधिकतर महिलाओं के साथ यही हुआ था। ख़ैर, मुद्दा ये नहीं है। मन में उत्साह था तो सही पर कहीं-न-कहीं डगमगा-सा रहा था। सभी टीम के खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। मैंने भी फ़ील्ड पर और अपनी पारी खेलते वक़्त कुछ ख़ास प्रदर्शन तो नहीं किया मग़र कोशिश ज़रूर अच्छी की। अफ़सोस कि उस कोशिश के बावजूद मेरी टीम हार गयी।

इसके बाद ही क्रिकेट से ध्यान हटकर बाक़ी की एक्टिविटीज़ पर चला गया। वॉल क्लाइम्बिंग, आर्चरी, शूटिंग, ज़िप लाइन, इत्यादि। पिछली बार भी वो सारी चीज़ें की थीं। हौंसला बढ़ाने वाले तब भी थे, अब भी थे। इस बार सारे स्टंट्स कर लिए, फिर मौका क्या पता कब मिले?

जैसे-जैसे दिन बीत रहा था, कुछ लोगों की कमी महसूस होती जा रही थी। वो लोग जो उस साल इस खेल में शुमार थे, इस बार मगर संस्थान में ही नहीं थे। अच्छा नहीं लग रहा था। वो लोग होते तो शायद और मज़ा आता, और ख़ुशी होती, और अच्छा लगता। जो लोग मगर मौजूद थे उनकी वजह से भी दिन खूबसूरत बना, अच्छा लगा। वो भी इस दिल के करीब हैं। मैं अगर किसी क़ाबिल हूँ, तो उसमें उन सबका श्रेय है।

जगह वही थी, जज़बात वही थे, बस लोग बदल गए थे। वो अंग्रेजी में कहते हैं न "चेंज इज़ कांस्टेंट," वैसा ही कुछ था। कुछ अच्छा था, कुछ बुरा ; कुछ सही था, कुछ ग़लत भी। बस तजुर्बा था, कुछ सीखने का, आगे बढ़ने का।

पिछली बार भी क्रिकेट खेलना नहीं आता था मुझको, इस बार भी कुछ ख़ास नहीं किया। उम्मीद है एक दिन मैं सीख जाऊंगी और किसी दिन ऐसी ही किसी टीम की जीत का कारण बनूँगी। (सीरियसली मत लीजियेगा)।


माहौल दर्शाती एक सेल्फ़ी।