Thursday, 31 July 2014

एक रिश्ता - बातों का

इस दुनिया में जन्म लेते ही हम हज़ारों रिश्तों से बंध जाते हैं। एक रिश्ता माँ से, एक पिता से, भाई और बहन से भी। साथ ही कई रिश्तेदार - मामा, चाचा, ताऊ, बुआ और भी न जाने कौन कौन।  इतने सारे रिश्ते कि नए रिश्ते बनाने की ज़रुरत ही नहीं।

पर फिर भी एक रिश्ता है जो हम अपनी मर्ज़ी से बनाते हैं। हाँलाकि ख़ुदा ने ही वो रिश्ता हमें नवाज़ा है, पर फिर भी जन्म के साथ हम उससे नहीं बंधते। वो रिश्ता है दोस्ती का। वक़्त बीतता जाता है और जैसे-जैसे हम ज़िन्दगी में आगे बढ़ते हैं, दोस्त बनते जाते हैं और रिश्तों का आंकड़ा बढ़ता चला जाता है।

आजकल जो एक रिश्ता फैशन में है वो है "बातों का रिश्ता" । फेसबुक और कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने  (व्हाट्सएप्प को न भूलते हुए) लोगों को ये रिश्ता बनाने का मौका दिया। किसी को भी फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजिए, और हज़ारों मील दूर बैठे शख़्स से आप दिन रात बेइन्तहां बातें कर सकते हैं। अपने मोबाइल फ़ोन में एक नंबर सेव कीजिये, उसे इस्तेमाल करने वाला शख़्स अगर व्हाट्सएप्प पर है तो आप उससे खूब बातें कर सकते हैं। एक दूर बैठा शख़्स जिससे आप कभी कहीं मिले होंगे और उस मुलाक़ात में नंबर एक्सचेंज हुआ होगा। अचानक वो आपकी व्हाट्सएप्प की लिस्ट में दिखने लगा होगा, और शायद आप उसकी प्रोफाइल और स्टेटस पर नज़र रखने लगेंगे।

सहसा एक दिन आपको उसका स्टेटस भा जाता है और "नाइस स्टेटस" जैसा मैसेज लिखकर तारीफ़ करते हुए आपको उससे बात करने का मौक़ा मिल जाता है।  फिर इंट्रोडक्शन होता है।  याद किया जाता है कि हम कब और कहाँ मिले थे।  उसके बाद हलकी-फुल्की बातें शुरू होती हैं। और यही सिलसिला जारी रहता है। कहने को आप उसे दोस्त कह सकते हैं, पर यूँही बिना वजह किसी पर ऐतबार कर लेना ज़रा मुश्किल हो सकता है।  इसलिए आप इसे बातों का रिश्ता ही मान लीजिये।

ख़ैर, जो भी हो ये रिश्ता है बड़ा ही प्यारा।  इसी बात पर राजेश खन्ना  की फिल्म "आनंद" का एक डॉयलॉग याद अ गया।  "बाबुमुशायी! ज़िन्दगी में कोई इंसान अच्छा लगा, उसे रोक कर दो मिनट बात करो तो दिल को सुकून मिलता है"।

इसी तरह एक शख़्स जिससे कभी मुलकात हुई, नंबर एक्सचेंज हुआ; वो व्हाट्सएप्प पर मिला और उससे ढेर सारी बातों का सिलसिला शुरू हो गया। उसकी हर बात रास आने लगी, और ये उम्मीद होने लगी कि ये सिलसिला कभी ख़त्म न हो। वैसे तो आमने-सामने होकर भी बातें हो सकती हैं, पर तब शायद रिश्ता दोस्ती का हो जाए।  फिलहाल तो ये बातों का रिश्ता ही रंगीन है, जिसकी अहमियत और ज़िन्दगी आने वाला वक़्त ही तय करेगा। तब तक आप बातें करते रहिये। 

Tuesday, 29 July 2014

गधों सी ज़िंदगी: नौ से पाँच

बचपन से लेकर जवानी तक हम इसीलिए पढ़ते-लिखते हैं कि एक दिन अपनी पसंद की नौकरी मिलेगी। दिन रात की मेहनत रंग लाएगी और हम अपना और अपने माता-पिता का हर सपना पूरा करेंगे, अपनी इच्छाएं पूरी करेंगे। भाग्य से  इतना कुछ करने के बाद लोग डॉक्टर, इंजीनियर, लॉयर बन ही जाते हैं। शायद कुछ लोगों के सपने पूरे हो जाते हों, पर इन्ही में से कुछ लोग होते हैं जो बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते हैं। ऐसी बहुत सी बड़ी बड़ी मल्टी नेशनल कंपनियां हैं जहाँ लोग काम कर बहुत ख़ुश हैं।

लोग सुबह सुबह घर से निकलते हैं।  कन्धों पर बैग टाँगे, हाथ में बड़ा सा टैब लिए, कानों में ईयरफ़ोन या हेडफ़ोन लगाए बस चलते चले जाते हैं। अधिकतर लोग नोएडा जाते हुए दिखते हैं। ग़ाजियाबाद की बात की जाये तो नोएडा ही एक ऐसा इलाका  है जहाँ अधिकतर एमएनसीज़ बसी हुई हैं। मेट्रो स्टेशनों पर लोग ऐसे खड़े होते हैं, मानो गधों का कोई गुट हो।  जैसे उसे को कोई फर्क नहीं पड़ता, जिस दिशा में घुमा दो चल देता है; वैसे ही इन एमएनसीज़ वाले गधों के भी हालात हैं। बॉस ने जब, जैसा कहा, बस कर दिया।

ख़ैर, अब गधों की बात हुई है तो आमिर खान की मशहूर फिल्म "थ्री इडियट्स" का डायलाग कैसे भुलाया जा सकता है। "वायरस यहाँ इस कॉलेज में गधे मैन्युफैक्चर कर रहा है। वो देखो तुम्हारा गधा "। बस, जैसे फिल्म में इम्पीरियल कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (आईएमई) के गधे थे, वैसे ही नॉएडा में इन एमएनसीज़ के गधे है, जो कन्धों पर बोझ लादे मेट्रो स्टेशनों पर लम्बी-लम्बी कतारों में लगे रहेंगे। नौ बजे तक ऑफिस पहुँचना है, पर भीड़ इतनी होती है कि आधा घंटा उस लाइन में खड़े-खड़े ही बीत जाएगा । उसके ऊपर कुछ कंपनियां महान श्रेणी की भी हैं, जहाँ यदि लोग पांच मिनट लेट हुए तो उनके कंजूस और महत्वाकांक्षी बॉस को उस दिन के कुछ पैसे काटने का मौका मिल जायेगा। कॉस्ट कटिंग करने का एकमात्र बेहतरीन तरीका।

ऑफिस पहुँचने के बाद ज़िन्दगी का मकसद सिर्फ इतना है कि अब लोग शाम के पाँच बजे तक अपनी कुर्सी पर बैठे रहेंगे और पांच बजते ही फिर जाकर उस मूक जानवर की तरह उसी लम्बी लाइन में खड़े हो जाएं। मेट्रो आएगी और लोग किसी जंग के लिए तैयार खड़े सैनिकों की तरह अंदर घुसने की कोशिश करते हैं।फिर आख़िरकार बहुत कोशिश के बाद उन्हें अंदर जाने की जगह मिल जाती है। एक-दूसरे को धक्का देते हुए लोग चढ़ जाते हैं और किसी न किसी तरह वापिस घर पहुँच ही जाते हैं।

बस यही है गधों सी ज़िन्दगी। लोग सुबह घर से निकल कर नौ से पाँच बजे तक उस कुर्सी पर बैठ कर बस कंप्यूटर पर टिक-टिक करते रहेंगे, आज एक एमएनसी में; कल किसी और बड़ी कंपनी में थोड़ी ज़्यादा तनख्वाह और शायद किसी ऊंची पोस्ट के साथ। चौबीस घंटे भागती-सी ज़िन्दगी की कहानी ऐसी हो चुकी है कि इंसान और गधे में फर्क करना मुश्किल हो गया है। हम सब इंसान से गधे ही बन चुके हैं।  मुबारक हो, पर शायद अब भी कुछ लोगों में वापिस इंसान बनने की चाह बाक़ी है। भगवान कम- से- कम  उनकी इस इच्छा को तो सलामत रखे। बाक़ी तो जो है वो रहेगा ही।