Tuesday, 23 December 2014

अजनबी दिल की गुहार

सुनो,

उसे तुमसे अपने दिल की बात ज़ाहिर करनी है। वो बहुत खुश है ये जानकर कि 'तुम'  जैसे एक शख़्स को उससे मुहोब्बत हुई। "आई मुहब्बत यू", ये वही शब्द हैं जो तुमने उससे कहे थे।

जैसा कि उसने तुम्हें पहले भी बताया था कि उसके दिल में हमेशा से तुम्हारे लिए एक ख़ास जगह थी। तुम्हारी शख़्सियत में कोई तो ऐसी बात है जो उसने आज तक किसी में नहीं आँकी। ये सच है कि उसे तुमसे मुहब्बत नहीं है, पर हाँ, वो अपने दिल को एक मौक़ा देना चाहती है।

बहुत सख़्त है वो, कभी इश्क़ के जज़बात को समझना ही नहीं चाहा उसने। अब आरज़ू ये है कि काश तुम्हारी मुहोब्बत में इतनी शिद्दत हो कि तुम उसे अपना बना लो। कुछ बातें तुमने कहीं कि तुम उसकी "इन-उन" अदाओं पर फ़िदा हो। उसकी सादगी के क़ायल हो, और शायद उसी पर मर बैठे हो। अच्छा है।

बात ये है कि उसकी अब तक की छोटी-सी ज़िन्दगी की कुछ बहुत बड़ी-बड़ी कहानियां हैं, जिन्हे वो तुमसे बाँटना चाहती है। साथ ही, उसे ये भी यकीं है कि तुम्हारी भी कोई दिलचस्प कहानी ज़रूर है, जो वो बेसब्री से सुनना चाहेगी। 

जिस दिन से तुमने इज़हार-ए-मुहोब्बत किया है, तब से हर दिन ऐसा होने लगा है की तुम चौबीसों घंटे उसके दिल-ओ-दिमाग़ में घूमते हो।

उसे नहीं पता कि क़िस्मत का इरादा क्या है, पर वो इतना जानती है कि वो तुम्हें खोना नहीं चाहती।  तुम दोस्त की तरह ही मिलो या आँखों में मुहोब्बत की चमक साथ ले आओ, ये अब तुम पर है।

उसे सिर्फ इतना कहना है कि अगर तुम ये कर सकते हो तो कर दो।  उसे अपनी मुहब्बत में रंग लो। उसका दिल ग़मों, उलझनों, परेशानियों और असमंजसों का ग़ुलाम बना हुआ है। इस सबसे आज़ाद कर उसे अपनी बाहों के घेरे में महफूज़ कर लो।

पलकों पर उम्मीद सजाये....

तुम्हारी "वो"!!! 


Saturday, 6 December 2014

दिखावे के बाजार में !!

आज हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, वहां दिखावे का बहुत महत्त्व है। ये न हो तो लोग एक दूसरे से रूबरू होना ही छोड़ दें।  लोग अक्सर एक दूसरे से इसलिए मिलते हैं ताकि अपनी विशेष उपलब्धियों को अत्यधिक  रूप से ज़ाहिर कर सकें।

शायद दिखावा ही वो शब्द है जिससे हम और आप अमीर-गरीब में अंतर करना सीख गए हैं। गाड़ी, बंगला, एसी, टैब, आईफोन - ये सब मात्र प्रदर्शन के प्रतीक हैं। ज़रूरत अपनी जगह ठीक  है, पर अक्सर लोग इन चीज़ों का इस्तेमाल सिर्फ सामने वाले को दिखाने के लिए करते हुए पाये जाते हैं।

एक और ख़ास चीज़ जिसका दिखावा आजकल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, वो है "रिश्ते"। जन्म  से ही हम हज़ारों रिश्तों से घिर जाते हैं, पर  कौन-सा रिश्ता हमारा अपना है, और कौन हमारे लायक नहीं है, इसकी समझ अधिकतर लोगों को देर से ही आती है। कुछ रिश्ते खून के होते हैं, अनिवार्य होते हैं जिन्हें हम दिल-ओ-जान से निभाना चाहते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो मात्र संयोग से बन जाते हैं। उन्हें निभाना या न निभाना पूरी तरह हमारा अपना निर्णय होता है।

कभी किसी ऐसी शख़्सियत से रिश्ता बन जाता है जिससे हम कोई  उम्मीद नहीं रखते पर वो कुछ ऐसा कर देता है जिसे देखकर दिल को सुकून मिलता है। वो अचानक ही आपसे कई सालों बाद मिला, पर उसका आपको गले लगाना दिल में एक उम्मीद जगाता है कि शायद आज भी आप उसके लिए महत्त्वपूर्ण हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि नाम के लिए एक रिश्ता  है तो, पर हम शायद ही उसे निभाने की कोशिश करते हैं। हम खुद भी कभी समझ नहीं पाते कि वो रिश्ता हमारे लिए कोई मायने रखता भी है या नहीं।

यही नुकसान है दिखावे के बाजार में रिश्तों का मोल ढूंढने का। कोई हमसे रिश्ता रखना चाहे या हमें अपनी ज़िन्दगी में तवज्जो दे, तो भी हम इतने सक्षम नहीं कि ये बात समझ पायें। सारी गलती इस दिखावेपन की है, हमारी है, उस सामने वाले उस तरह की शख़्सियत (जो हर कोई नहीं होता) की है जो अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए हमारी ओर कुछ पल के लिए ध्यान देता है और फिर अचानक ही लात मार देता है। किसी को भी ये विशलेषण करने का मौका ही नहीं मिलता कि आख़िर हुआ क्या ?

बस यही है हमारी कलयुग की दुनिया के रिश्तों का दिखावटी बाजार, जहाँ कुछ पल के प्रदर्शन के लिए रिश्ते निभाये जाते हैं और फिर तू कौन, मैं कौन का राग अलापा जाता है। आप समझ पाएं रिश्तों की अहमियत तो अच्छा है। जो रिश्ता मायने रखता है वो समाज में आपकी प्रतिष्ठा बढ़ाता है। वरना जिस सम्बन्ध की कोई महिमा नहीं है, वो बस नहीं है; फ़िर चाहें वो रिश्ता जज़्बात का हो, एहसास का हो या एहसान का।