कॉलेज ख़त्म होने के बाद पहली ही नौकरी ऐसी मिल गयी कि साथ पढ़ने वाले लोग ही दफ़्तर के कलीग भी बन गए। इस इत्तफ़ाक से लगभग सभी खुश थे। हमारे बीच दूरियाँ मिटने लगीं थीं, सब एक दूसरे से और अधिक घुलने-मिलने लगे थे।
सब कुछ ठीक था उस दिन तक जब अचानक हमने देखा कि धीरे - धीरे कुछ एम्प्लोईज़ को बिना वजह दफ़्तर छोड़ने को कहा जा रहा था। एक - एक कर सब जाने लगे थे और हलके - हलके हम सब पर इसका नकारात्मक असर पड़ने लगा। फिर भी, हम काम तो कर रहे थे पर उसे करने में सुकून हासिल नहीं हो रहा था।
एकाएक एक दिन मेरी टीम लीडर का स्वास्थ्य बिगड़ गया। उसने एक मेसैज से इत्तिला किया कि वह उसी शाम की गाड़ी से घर जा रही है । वापस कब आएगी, इसका अंदाजा नहीं था।
अगले दिन हम सब दफ़्तर पहुंचे तो मेरी टीम के बाक़ी लोग भी उस जगह से जान छुड़ाने के बारे में सलाह-मशवरा कर रहे थे, न चाहते हुए भी मैं जिसका हिस्सा थी। शाम होने को आई और मुझसे मेरा फैसला पूंछा गया। मैंने कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं समझा। बस बैग उठाया और घर की ओर चल दी।
उसी रात उसका फ़ोन आया। उसने मुझसे वादा किया कि वह ज़रूर वापस आएगी, मेरी ख़ातिर। दफ़्तर की इस नयी ज़िन्दगी में वो कब मेरी अच्छी दोस्त बन गयी पता ही नहीं चला। ख़ैर, बात बस ये थी कि उसके अल्फ़ाज़ों ने मेरे मन में उम्मीद की एक नयी किरण रोशन कर दी थी।
उसके बाद से मेरा हर दिन बस उसके इंतज़ार में कटता रहा। दफ़्तर पहुँच कर मैं हर रोज़ उस कुर्सी को देखा करती, जिस पर बैठ वह हर काम ज़िम्मेदारी से निभाती थी। हँसी और तनाव के लम्हे आँखों में अश्कों का सैलाब ले आते थे। हर दिन मै उससे बात किया करती थी। अचानक ही वो एक दिन किसी वजह से ख़ामोश हो गयी। उसकी चुप्पी को मैं समझ न सकी। बस अंदाजा लगाने लगी की शायद अब वो नहीं आएगी।
कुछ दिन बाद फिर उसका फ़ोन आया। उसने कहा कि वो दिल्ली आ रही है। मै ख़ुशी से झूम उठी। इससे पहले कि मैं कुछ कहती, उसने अपना वाक्य पूरा किया "अपना सामान लेने"। मैं चुप रह गयी। कुछ कहने की न तो हिम्मत ही हुई, न इच्छा।
"ठीक है"- मैंने दबे स्वर में कहा।
"वक़्त मिले तो एक आख़री बार मिल लेना" - उसने कहा।
"मैं कोशिश करुँगी"- कहते ही मैंने फ़ोन रख दिया।
अगले ही दिन वो दिल्ली आ गयी। मैं उससे मिलने भी गयी। मुलाक़ात बस दस मिनट की थी।
"काश फ़िर किसी कंपनी में तुम मेरी कलीग बनो"- मैंने इच्छा जताई।
"अपना ध्यान रखना। अच्छे से रहना"- यह कहकर वो स्टेशन की ओर चल दी।
उसके चले जाने के बाद जब पहला फ़ोन आया था तब ये उम्मीद जगी थी कि हम शायद फिर से एक साथ काम कर पाएंगे। वही पागलपन, वही जुनून फिर उस दफ़्तर में दिखेगा। मगर सच्चाई तो कुछ और ही थी। सच ये था कि वो वापस आई तो थी, पर वापस ही चले जाने के लिए।
सब कुछ ठीक था उस दिन तक जब अचानक हमने देखा कि धीरे - धीरे कुछ एम्प्लोईज़ को बिना वजह दफ़्तर छोड़ने को कहा जा रहा था। एक - एक कर सब जाने लगे थे और हलके - हलके हम सब पर इसका नकारात्मक असर पड़ने लगा। फिर भी, हम काम तो कर रहे थे पर उसे करने में सुकून हासिल नहीं हो रहा था।
एकाएक एक दिन मेरी टीम लीडर का स्वास्थ्य बिगड़ गया। उसने एक मेसैज से इत्तिला किया कि वह उसी शाम की गाड़ी से घर जा रही है । वापस कब आएगी, इसका अंदाजा नहीं था।
अगले दिन हम सब दफ़्तर पहुंचे तो मेरी टीम के बाक़ी लोग भी उस जगह से जान छुड़ाने के बारे में सलाह-मशवरा कर रहे थे, न चाहते हुए भी मैं जिसका हिस्सा थी। शाम होने को आई और मुझसे मेरा फैसला पूंछा गया। मैंने कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं समझा। बस बैग उठाया और घर की ओर चल दी।
उसी रात उसका फ़ोन आया। उसने मुझसे वादा किया कि वह ज़रूर वापस आएगी, मेरी ख़ातिर। दफ़्तर की इस नयी ज़िन्दगी में वो कब मेरी अच्छी दोस्त बन गयी पता ही नहीं चला। ख़ैर, बात बस ये थी कि उसके अल्फ़ाज़ों ने मेरे मन में उम्मीद की एक नयी किरण रोशन कर दी थी।
उसके बाद से मेरा हर दिन बस उसके इंतज़ार में कटता रहा। दफ़्तर पहुँच कर मैं हर रोज़ उस कुर्सी को देखा करती, जिस पर बैठ वह हर काम ज़िम्मेदारी से निभाती थी। हँसी और तनाव के लम्हे आँखों में अश्कों का सैलाब ले आते थे। हर दिन मै उससे बात किया करती थी। अचानक ही वो एक दिन किसी वजह से ख़ामोश हो गयी। उसकी चुप्पी को मैं समझ न सकी। बस अंदाजा लगाने लगी की शायद अब वो नहीं आएगी।
कुछ दिन बाद फिर उसका फ़ोन आया। उसने कहा कि वो दिल्ली आ रही है। मै ख़ुशी से झूम उठी। इससे पहले कि मैं कुछ कहती, उसने अपना वाक्य पूरा किया "अपना सामान लेने"। मैं चुप रह गयी। कुछ कहने की न तो हिम्मत ही हुई, न इच्छा।
"ठीक है"- मैंने दबे स्वर में कहा।
"वक़्त मिले तो एक आख़री बार मिल लेना" - उसने कहा।
"मैं कोशिश करुँगी"- कहते ही मैंने फ़ोन रख दिया।
अगले ही दिन वो दिल्ली आ गयी। मैं उससे मिलने भी गयी। मुलाक़ात बस दस मिनट की थी।
"काश फ़िर किसी कंपनी में तुम मेरी कलीग बनो"- मैंने इच्छा जताई।
"अपना ध्यान रखना। अच्छे से रहना"- यह कहकर वो स्टेशन की ओर चल दी।
उसके चले जाने के बाद जब पहला फ़ोन आया था तब ये उम्मीद जगी थी कि हम शायद फिर से एक साथ काम कर पाएंगे। वही पागलपन, वही जुनून फिर उस दफ़्तर में दिखेगा। मगर सच्चाई तो कुछ और ही थी। सच ये था कि वो वापस आई तो थी, पर वापस ही चले जाने के लिए।
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