Monday, 6 October 2014

वो सीख रही है।

शिष्या- गुरूजी, क्या पत्रकारिता मात्र कूटनीति भर है?

गुरूजी- नहीं, इसकी नींव ईमानदारी है। सिर्फ ईमानदारी।

मुझे मालूम नहीं कि ऊपर लिखी गयी ये दो पंक्तियाँ किसको, कितना प्रभावित करेंगी, मग़र इतना ऐतबार ज़रूर है कि जिस शिष्य के पास उनके जैसा गुरु हो जो हर बार उसके बुरे समय में उसे संभल ले, उसका जीवन अवश्य ही सफल है। कक्षा के भीतर वे बताया  करते थे कि कभी भी कोई भी काम करो तो पूरी मेहनत, लगन और ईमानदारी से करो। वो बड़ी बड़ी बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती थीं, लेकिन जब उस कक्षा के बाहर की दुनिया देखी तो मालूम हुआ कि यहाँ तो नज़ारा कुछ और ही है।

लगता है जैसे धांधली के बिना दुनिया चल ही नहीं सकती। झूठ, फरेब, मक्कारी ही ज़िन्दगी जीने के महत्त्वपूर्ण तरीके हैं। लोग सोचते हैं कि ग़लत रास्ता अपनाये बग़ैर सफलता मिल ही नहीं सकती। पर गुरु  के दिए ज्ञान के अनुसार शिष्या ने फिलहाल यही निश्चय  किया है कि जीना तो ईमानदारी से ही है, तब तक जब तक कि हिम्मत नहीं टूट जाती। अभी हर दिन कदम सिर्फ़ ख़्वाब की ओर बढ़ रहे हैं जो शायद इस वक़्त कुछ ज़्यादा ही दूर है। यद्यपि इच्छा सिर्फ इतनी है कि सच का हाथ थामकर ही वहाँ तक पहुँचना है। मुमकिन है या नहीं, वो नहीं जानती। शायद गुरूजी भी नहीं जानते होंगे।

कुछ मालूम नहीं कब, कैसे, क्या होगा ? पर ज़हन में जो बात है वो बस इतनी सी है कि हालात चाहें जो भी हों, बस चलते जाना है और वो भी पूरी ईमानदारी के साथ। कुछ लोग, जैसे उसके गुरु शायद यही बात बार-बार याद दिलाने के लिए हमेशा उसके साथ रहेंगे। कुछ ऐसे होंगे जो दो पल का साथ निभाकर छोड़ भी जायेंगे। पर हर कोई कुछ न कुछ सिखा जायेगा। वो शिष्या सीखती चली जाएगी, और आगे बढ़ती चली जाएगी। मंज़िल न जाने कितनी दूर है पर ये कदम अब नहीं रुकेंगे। बिना रुके, बिना थके बस चलते जाने का संकल्प ही अब इस ज़िन्दगी का एकमात्र मकसद है ।

No comments:

Post a Comment