अभी बीस साल का भी नहीं हुआ था वो जिसे बीस लोगों ने मिलकर मार दिया और मीडिया की ख़बरों के मुताबिक़ लगभग दो सौ लोग उसके साथ हुए इस दर्दनाक हादसे को देख नहीं पाए। वही लोग जो असावती रेलवे स्टेशन पर खड़े हुए थे या जो उसी ट्रेन में सवार थे जिसमें पंद्रह साल के जुनैद को पीट-पीट कर उसके प्राण निकाल लिए गए।
खून से लथपथ उसकी लाश उसके बड़े भाई के पैरों पर पड़ी थी जिसके आगे कई लोग झुंड लगाए खड़े थे मगर कितने साहसी थे सब -- पत्थर से मज़बूत और कठोर दिल वाले -- कि ये दृश्य देखकर किसी का भी दिल नहीं पसीजा।
जुनैद ने दिल्ली सरकार में काम करने वाले पचास साल के एक बुज़ुर्ग को शायद ट्रैन में सीट देने से मना कर दिया था। बेचारा ईद की शॉपिंग करते-करते थक गया होगा इसलिए ट्रेन में सीट मिलने पर बैठा होगा। ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा होगा कि घर जाकर अपनी अम्मी को वो सारी चीज़ें दिखाएगा जो उसने खरीदी थीं। मगर उसे क्या पता था कि ये उसके जीवन की आख़िरी शॉपिंग है।
हमारे देश में लोकल ट्रेनों का हाल बहुत अच्छा नहीं है। हर दिन भीड़ ख़ुद को किसी सीमेंट के बोरे-सा ट्रेनों में धकेलती है। ऐसे में कोई कैसे सीट मिलने की उम्मीद भी कर सकता है?
शायद अंकल जी को नहीं पता होगा कि जुनैद कितना थका है या नहीं थका है। वो शायद अपनी नौकरी से इतना थक और चिढ़ कर आये थे कि कई सालों का गुस्सा उस मासूम पर निकाल दिया। अपने साथ कुछ और लोगों को भी मौक़ा दिया कि वे भी अपनी भड़ास निकाल सकें। बाक़ी रहा-बचा काम बीफ़ ने कर दिया। ये कहा गया कि उसके बैग में बीफ़ है, वह मुसलमान है। बस इतना कहना ही काफ़ी था लोगों के दिमाग़ में हैशटैग ट्रेंड करने वाली बीफ़ से जुड़ी ख़बरों को हवा देने के लिए और फिर तो उस तूफ़ान ने एक जान ले ही ली।
मारने वालों की भीड़ में शामिल एक बेहद समझदार शख़्स ने कहा, "मुझे नहीं मालूम क्या हुआ था। मैं शराब के नशे में था। सबने कहा मारो तो मैंने मारना शुरू कर दिया।"
मालूम होता है कि कुछ हिन्दुओं के लिए बीफ़ हऊआ-सा हो गया है। जहाँ नाम सुना नहीं, चिल्लाने लगते हैं -- कभी डर से तो कभी ग़ुस्से से। सामने वाले के पास बीफ़ है या नहीं, कोई इसकी जाँच नहीं करता। जब पीटने का काम वे कर सकते हैं तो जाँचने का क्यों नहीं? वैसे भी कौन-सी माँ (गौ माता) का प्यार नफ़रत सिखाता है?
डेली ओ में नामी पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक लेख में जुनैद के अब्बा जल्लालुद्दीन के साथ हुई बात का ज़िक्र किया है। बात क्या, उन्होंने असल में उनका इंटरव्यू ही किया है।
जल्लालुद्दीन ने राजदीप को बताया, "इतना ग़ुस्सा सीट को लेकर नहीं होता सर। वो मेरे बेटे को एंटी-नेशनल कह रहे थे, उसकी टोपी और कपड़े को लेकर गाली दे रहे थे।"
उन्होंने सवाल किया, "वो हमसे इतनी नफ़रत क्यों करते हैं सर कि हमें महज़ धर्म के नाम पर जान से मार देते हैं?"
"मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना," इस पंक्ति से शायद सभी वाक़िफ़ होंगे, फिर भी इतनी नफ़रत किसलिए? माना कि हर धर्म में कुछ कट्टरवादी लोग होते हैं मगर कौन-सा धर्म ऐसा होगा जो इंसानियत भुलाना सिखा दे? अगर इस इतने बड़े जहाँ में कहीं भी ऐसा कोई धर्म है तो मुझे उसे जानना है, पढ़ना है, समझना है। यक़ीनन अगर उन सभी मारने वालों में से एक के जिग़र में भी इंसानियत होती तो जुनैद आज ज़िन्दा होता।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार जुनैद इमाम बनने की इच्छा रखता था। वो मदरसे में पढ़ता था और दो महीनों के लिए जब भी घर आता था तो बड़ी शिद्दत से क़ुरआन की आयतें पढ़कर सबको सुनाता था। "शायद वो अल्लाह का बंदा था। क्या पता इसीलिए अल्लाह ने ईद के मुबारक़ मौक़े पर ही उसे अपने पास बुला लिया।" क्या ये वाक्य उसकी अम्मी को ताउम्र दिलासा दे सकेगा?
पीएस - अख़लाक़ से लेकर जुनैद तक हालात सिर्फ़ बद्तर हुए हैं। देश में भले ही सरकारें बदल जाएँ, कुछ हालात शायद कभी नहीं बदलेंगे। लेकिन आवाम को ये समझ लेना चाहिए कि महज़ झुंड बनाकर किसी को पीट देने से या उसकी जान ले लेने से अच्छाई की दिशा में कुछ भी हासिल नहीं होगा।