दिसम्बर माह का बेहद ठंडा दिन था। सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था। पोस्ट ग्रेजुएशन के कोर्स का तीसरा एग्जाम पेपर लिखने जाना था। पढ़ा तो काफ़ी था मग़र फिर भी जाने की इच्छा नहीं हो रही थी।
उस दिन अकेले ही कॉलेज जाना था। इकलौता पेपर था जो अकेले लिखना था अपने दोस्त के बिना। उसका एग्जाम दो दिन पहले ही हो गया था क्योंकि उसने एक विषय मुझसे अलग जो ले लिया था।
अब किसी तरह घर से निकलना तो था ही, सो निकल गए, बस भी पकड़ ली। दिमाग में कई विचार दौड़ रहे थे। पेपर लिखने की जगह कोई कविता लिख देने का मन था कि चित शांत हो जाए।
शाहदरा की और ले जाने वाले फ्लाईओवर पर काफ़ी जाम लगा हुआ था। बस की खिड़की से बाहर झाँक कर देखने की कोशिश की तो मालूम हुआ कि फ्लाईओवर से एक शख़्स नीचे गिर गया है। लोगों ने उसे महज़ देखने की ख़ातिर अपनी गाड़ियों को बीच सड़क पर ही खड़ा कर दिया था जिस वजह से यातायात जाम हो गया था।
अच्छा ही किया था उन लोगों ने वरना कभी पता नहीं चलता कि हुआ क्या था। हमारे देश में ऐसा अगर ना हो तो हम सब भारतीय नागरिक कैसे कहलायेंगे?
दिल में हलचल मची हुई थी। कुछ पल बीते, बस चली और आख़िरकार वक़्त पर कॉलेज पहुँचा गया। एग्जाम हॉल में कदम पड़े, सीट तलाशी और तशरीफ़ टिकाई।
भागते-भागते मैं एग्जाम हॉल तक पहुँची। साँस फ़ूल गई थी और कलेजा मुँह को आ चुका था।
मेरे आगे वाली सीट पर एक लड़की बैठी हुई थी। उससे दोस्ती करने का मन हुआ। कुछ देर उसकी बॉडी-लैंग्वेज को निहारने के बाद महसूस हुआ कि शायद उसे दोस्त बनाया जा सकता है।
'हाय!' मैंने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा।
'हाय!' एक प्यारी-सी हँसी के साथ जवाब आया।
'क्या आप अगले तीन घंटों के लिए मेरी दोस्त बनना पसंद करेंगी?' मैंने रिस्क लेते हुए पूछा।
'हाहाहा! हाँ ज़रूर।' उधर से जवाब आया।
'मुझे न ज़्यादा कुछ आता नहीं है, प्लीज़ हेल्प मी।' मैंने डरते हुए कहा।
'यार नोवेल्स तुम बता देना, थ्योरेटिकल मुझे आता है।' उसने कहा।
'हमारे कोर्स में नोवेल्स भी थे?' मेरी तो जैसे आँखें ही बाहर आ गई थीं ।
'यार तुम कमाल हो।' वो हँसते हुए बोली।
मुझ पर शायद नर्वसनेस कुछ ज़्यादा हावी हो गई थी ।
माहौल शांत करने के लिए मैंने उसका नाम पूछा।
"जी आपका नाम?"
कुछ बोलने की बजाय उसने मुझे अपना आई डी कार्ड दिखाया।
"तौ.. तू.. तौबा, नहीं....... तूबा"- मेरे मुँह से निकला।
"वाह! क्या लाजवाब नाम है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
"जी शुक्रिया। " उसने कहा।
"तूबा का क्या मतलब होता है?" मैंने फिर पूछा।
"जन्नत का सबसे बड़ा पेड़।" बाहें फैलाकर विस्तार देते हुए उसने बताया। काफ़ी ख़ुश मालूम होती थी।
अचानक इनविजिलेटर ने आंसर शीट हमारी डेस्क्स पर रख दी थीं। हमने अपनी डिटेल्स भरना शुरू किया। दो मिनट बाद प्रश्न पत्र भी हमारे डेस्कस पर मौजूद था।
नज़रें उस पेपर की ओर जैसे घूमना ही नहीं चाहती थीं। फ़िर भी किसी तरह हिम्मत कर सभी प्रश्नों को देखा, लगा कि कुछ तो आता ही है। सुकून महसूस हुआ। अच्छा लगा।
लिखना शुरू किया तो शुरुआत के दो घण्टे कब बीत गए पता ही नहीं चला। सहसा तूबा ने मेरे डेस्क पर एक टॉफ़ी रख दी। छिल्के को देख कर लगा शायद ये कोई नारियल फ्लेवर वाली टॉफ़ी है।
मन में सवाल ये आया कि आखिर उसने मुझे ये टॉफ़ी दी क्यों? उसे प्रश्न का उत्तर हल करने में थोड़ी सी मदद कर दी थी, क्या इसलिए?
जब लगा की मामला उलझ रहा है तो सोचा की चलो पेपर में ध्यान लगाते हैं। एक टॉफ़ी ही तो है, खा लेंगे।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिर लिखना शुरू किया और आख़िरी एक घंटा पूरा होने के महज़ दो मिनट पहले मैं अपना पेपर लिख चुकी थी।
उठकर जाने लगी तो लगा कि उस टॉफी के लिए एक शुक्रिया तो कह देना चाहिए। मगर वो अपना पेपर लिखने में पूरी तरह व्यस्त थी। मुझे जाने की जल्दी थी। मैं बिना कुछ कहे चली गई। सोचा कि अभी तो और भी इम्तेहान बाक़ी हैं। फिर मुलाक़ात होगी।
और वैसे भी उससे मुझे कहना ही क्या था? सिर्फ इतना कि "इट वाज़ नाइस मीटिंग यू तूबा। थैंक्स फॉर द टॉफ़ी।"
उस दिन अकेले ही कॉलेज जाना था। इकलौता पेपर था जो अकेले लिखना था अपने दोस्त के बिना। उसका एग्जाम दो दिन पहले ही हो गया था क्योंकि उसने एक विषय मुझसे अलग जो ले लिया था।
अब किसी तरह घर से निकलना तो था ही, सो निकल गए, बस भी पकड़ ली। दिमाग में कई विचार दौड़ रहे थे। पेपर लिखने की जगह कोई कविता लिख देने का मन था कि चित शांत हो जाए।
शाहदरा की और ले जाने वाले फ्लाईओवर पर काफ़ी जाम लगा हुआ था। बस की खिड़की से बाहर झाँक कर देखने की कोशिश की तो मालूम हुआ कि फ्लाईओवर से एक शख़्स नीचे गिर गया है। लोगों ने उसे महज़ देखने की ख़ातिर अपनी गाड़ियों को बीच सड़क पर ही खड़ा कर दिया था जिस वजह से यातायात जाम हो गया था।
अच्छा ही किया था उन लोगों ने वरना कभी पता नहीं चलता कि हुआ क्या था। हमारे देश में ऐसा अगर ना हो तो हम सब भारतीय नागरिक कैसे कहलायेंगे?
दिल में हलचल मची हुई थी। कुछ पल बीते, बस चली और आख़िरकार वक़्त पर कॉलेज पहुँचा गया। एग्जाम हॉल में कदम पड़े, सीट तलाशी और तशरीफ़ टिकाई।
भागते-भागते मैं एग्जाम हॉल तक पहुँची। साँस फ़ूल गई थी और कलेजा मुँह को आ चुका था।
मेरे आगे वाली सीट पर एक लड़की बैठी हुई थी। उससे दोस्ती करने का मन हुआ। कुछ देर उसकी बॉडी-लैंग्वेज को निहारने के बाद महसूस हुआ कि शायद उसे दोस्त बनाया जा सकता है।
'हाय!' मैंने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा।
'हाय!' एक प्यारी-सी हँसी के साथ जवाब आया।
'क्या आप अगले तीन घंटों के लिए मेरी दोस्त बनना पसंद करेंगी?' मैंने रिस्क लेते हुए पूछा।
'हाहाहा! हाँ ज़रूर।' उधर से जवाब आया।
'मुझे न ज़्यादा कुछ आता नहीं है, प्लीज़ हेल्प मी।' मैंने डरते हुए कहा।
'यार नोवेल्स तुम बता देना, थ्योरेटिकल मुझे आता है।' उसने कहा।
'हमारे कोर्स में नोवेल्स भी थे?' मेरी तो जैसे आँखें ही बाहर आ गई थीं ।
'यार तुम कमाल हो।' वो हँसते हुए बोली।
मुझ पर शायद नर्वसनेस कुछ ज़्यादा हावी हो गई थी ।
माहौल शांत करने के लिए मैंने उसका नाम पूछा।
"जी आपका नाम?"
कुछ बोलने की बजाय उसने मुझे अपना आई डी कार्ड दिखाया।
"तौ.. तू.. तौबा, नहीं....... तूबा"- मेरे मुँह से निकला।
"वाह! क्या लाजवाब नाम है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
"जी शुक्रिया। " उसने कहा।
"तूबा का क्या मतलब होता है?" मैंने फिर पूछा।
"जन्नत का सबसे बड़ा पेड़।" बाहें फैलाकर विस्तार देते हुए उसने बताया। काफ़ी ख़ुश मालूम होती थी।
अचानक इनविजिलेटर ने आंसर शीट हमारी डेस्क्स पर रख दी थीं। हमने अपनी डिटेल्स भरना शुरू किया। दो मिनट बाद प्रश्न पत्र भी हमारे डेस्कस पर मौजूद था।
नज़रें उस पेपर की ओर जैसे घूमना ही नहीं चाहती थीं। फ़िर भी किसी तरह हिम्मत कर सभी प्रश्नों को देखा, लगा कि कुछ तो आता ही है। सुकून महसूस हुआ। अच्छा लगा।
लिखना शुरू किया तो शुरुआत के दो घण्टे कब बीत गए पता ही नहीं चला। सहसा तूबा ने मेरे डेस्क पर एक टॉफ़ी रख दी। छिल्के को देख कर लगा शायद ये कोई नारियल फ्लेवर वाली टॉफ़ी है।
मन में सवाल ये आया कि आखिर उसने मुझे ये टॉफ़ी दी क्यों? उसे प्रश्न का उत्तर हल करने में थोड़ी सी मदद कर दी थी, क्या इसलिए?
जब लगा की मामला उलझ रहा है तो सोचा की चलो पेपर में ध्यान लगाते हैं। एक टॉफ़ी ही तो है, खा लेंगे।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिर लिखना शुरू किया और आख़िरी एक घंटा पूरा होने के महज़ दो मिनट पहले मैं अपना पेपर लिख चुकी थी।
उठकर जाने लगी तो लगा कि उस टॉफी के लिए एक शुक्रिया तो कह देना चाहिए। मगर वो अपना पेपर लिखने में पूरी तरह व्यस्त थी। मुझे जाने की जल्दी थी। मैं बिना कुछ कहे चली गई। सोचा कि अभी तो और भी इम्तेहान बाक़ी हैं। फिर मुलाक़ात होगी।
और वैसे भी उससे मुझे कहना ही क्या था? सिर्फ इतना कि "इट वाज़ नाइस मीटिंग यू तूबा। थैंक्स फॉर द टॉफ़ी।"