मात्र सात दिन हुए थे उस न्यूज़रूम से रूबरू हुए, और एक पल में ही साथ छूट गया। आज ही तो कुछ चीज़ें समझ आने लगी थीं, रास्ते अपने से लगने लगे थे। उस "औरा" से जान-पहचान सी होने लगी थी। पर मालूम नहीं था कि इतनी जल्दी इतना कुछ हो जायेगा। जो आइडेंटिटी कार्ड इतनी मशक्कतों के बाद कल मिला था वो आज वापिस भी हो गया। लगा कि आया ही क्यों वो हाथ में जब वापिस ही जाना था। ख़ैर अब जो हो गया वो ठीक ही हुआ होगा शायद।
आगे एक नयी ज़िन्दगी है। हो सकता है कि फिर कहीं आगे आने वाली ज़िन्दगी में यादें सिर्फ यादें ना रहें ।
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