Saturday, 11 June 2016

"दीदी, दस रुपये दे दो।"

हर शाम की तरह दफ़्तर से निकल नॉएडा सेक्टर -16 मेट्रो स्टेशन जा रही थी। सीढ़ियां चढ़ते समय अचानक एक आवाज़ कानों में पड़ी, "दीदी, दस रुपये दे दो, आपको दुआ लगेगी।"

बिना रुके मैंने नज़र घुमाई तो देखा कि एक छोटी-सी बच्ची फटी फ्रॉक पहने, बिखरे बाल लिए, धूल में लिपटी हुई सीढ़ियों के एक कोने पर बैठी हुई थी।

उस शाम कुछ हुआ तो था जिससे दिल टूट-सा गया था। दुआओं की ज़रुरत थी। पर क्योंकि क़दम आगे बढ़ गए थे तो पलट कर जाने की इच्छा नहीं हुई। दो घड़ी बाद याद आया कि पर्स में 10 रुपये थे ही नहीं, 100 थे।

प्लेटफार्म पर पहुँच गई थी लेकिन वो वाक्य शायद ज़हन में उतर गया था। बार-बार सोच रही थी कि 10 रुपये कहाँ से देती जब थे ही नहीं। पैसे खुले करवा लेने का भी कोई विकल्प उस पल नज़र नहीं आ रहा था। अब 100 रुपये देकर उससे 90 वापिस तो नहीं लेती। तकलीफ़ मग़र बहुत थी। मन कर रहा था अभी दौड़कर जाऊँ और उसे 100 रुपये ही दे दूँ। घर पहुँचना भी तो लेकिन ज़रूरी था।

उससे पूँछने का मन था, "10 रुपये दूँगी तो दुआ लगेगी, 20 दूँगी तो क्या होगा? और अगर 100 दूंगी तो?"

क्या जवाब देती वो? क्या वो कहती, "दीदी, तुम्हारे बिगड़े काम बन जाएँगे।"

क्या उसे पैसे देकर मेरे दिल को सुकूँ मिल जाता? जो मैं चाहती हूँ वो हो जाता? आख़िर क्या होता?

जवाब यकीनन उसके पास भी नहीं होता। सवाल अब भी मगर मौजूद है।