Thursday, 15 December 2016

दफ़्तर

दफ़्तर- एक ऐसी जगह जहाँ हम पैसे कमाने जाते हैं। कमाई हर किसी के जीवन यापन के लिए एकमात्र सहारा जो है। सच है।

एक सच ये भी है कि हमारी ही तरह हमारे सहकर्मी भी वहाँ पैसे कमाने ही आते हैं, काम करते हैं। काम करते-करते मग़र कुछ लोग कब नोट बनाने की मशीन में तब्दील हो जाते हैं, इसका एहसास नहीं हो पाता।

दफ़्तरों का आलम अक्सर ऐसा होता है कि कभी कुछ सहकर्मियों को हम दोस्त समझ बैठते हैं, कुछ तो दोस्त ही वहाँ आकर सहकर्मी हो जाते हैं और कभी-कभी वक़्त ऐसा मंज़र दिखाता है कि जिसमें दोस्त सहकर्मी से अजनबी हो जाते हैं।

एक संस्थान में नौकरी करते वक़्त एक सीनियर ने कहा था, "हमेशा एक बात याद रखना। दफ्तरों में कोई किसी का दोस्त नहीं होता, सब महज़ एक-दूसरे के प्रतियोगी होते हैं।"

उस वक़्त उनकी बात सिर के ऊपर से चली गयी थी, तजर्बा ज़रा कम था न। आज भी ज़्यादा तो नहीं है मग़र इतना हो गया है कि वो बात अब ज़हन में हमेशा के लिए बैठ गई है।

हर बार एक झूठी उम्मीद हुआ करती थी कि कोई दफ़्तर तो ऐसा होगा जहाँ लोग ईमानदारी से काम करते होंगे, एक-दूसरे को, उनकी मुश्किलों और परेशानियों को समझते होंगे। खुद को और अपने सहकर्मी को पैसा बनाने की मशीन नहीं बल्कि इंसान समझते होंगे। मग़र अफ़सोस !

ऐसा ही होता है शायद इस जहाँ में। हम खुदगर्ज़ होते हैं। कोई मरे या जिये, हमें क्या ? हमें बस अपने पैसों से मतलब है। दफ़्तर हमारा घर नहीं, रोकड़ा कमाने का साधन है। जितना पैसा मिले, बस उतना काम करो।

यदि कोई अपने संस्थान को बेहतर बनाना चाहता है और उसके लिए थोड़े एक्स्ट्रा एफर्ट्स लगाता है तो दुनिया उसे बेवक़ूफ़ समझती है और क्यों न समझे ? ये हमारे देश की रीत है जिसका पालन हम सबको बख़ूबी करना आना चाहिए।

बात रही दोस्ती की तो हमारी ख़ुशनसीबी है कि अगर कोई दोस्त हमारा सहकर्मी बन जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो हमें गहराई से जानता है, उसके साथ किसी भी चीज़ के लिए सामंजस्य बिठाना दुर्लभ नहीं होता। एक-दूसरे की सूझ-बूझ और समझ से दफ़्तर में दिन आसानी से गुज़र जाता है। यही नफ़ा होता है एक दोस्त के सहकर्मी हो जाने का।

सहकर्मियों के साथ का रिश्ता अक्सर "हाय-हेल्लो" तक सीमित रहता है। बहुत ज़्यादा हुआ तो इंसानियत का, बस। एक-आद से अगर हमारे सोच-विचार या हमारा बैकग्राउंड मिलता हो तो उनसे कुछ छुट-पुट बातें हो जाती हैं। कभी-कभी थोड़ा बहुत पर्सनल भी सही।

शायद इतना ही सहकर्मियों का दायरा होता है। बातों और जज़बातों की अगर किसी से ज़्यादा साझेदारी होने लगती है तो ये एक मसला बन सकता है जिसका हल शायद मुमकिन नहीं। जैसे-जैसे वक़्त बीतेगा, हमें ये महसूस होना शुरू होता जाएगा कि हम किसी जंजाल में फँसते, ऊलझते जा रहे हैं।

एक बड़े से संस्थान में हम हर शख़्स को दोस्त का दर्जा नहीं दे सकते, संभव ही नहीं है। जीवन में दोस्त बहुत अज़ीज़ होते हैं। हर दूसरे-तीसरे शख़्स को 'दोस्त' कहकर इस शब्द की तौहीन करना भी मुनासिब नहीं है।

बहरहाल, इसमें कोई शक़ नहीं कि दफ़्तर हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा है, मगर हमारी ज़िन्दगी नहीं। और रही बात दोस्त की, तो फिर उसी दफ्तर में एक सच्चे दोस्त का साथ होना ही हमारी ज़िन्दगी है। हालात अच्छे हों या बुरे, उसके सदा साथ होने का यक़ीन हमें ज़िंदा रखता है ।

Sunday, 31 July 2016

संवर रहा है उत्तर प्रदेश, बता रहे हैं अखिलेश।

पिछले रविवार को मेरे घर पे अख़बार के साथ एक सप्लिमेंट आया। उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी ने उस 22 पन्नों के बुकलेट में अपनी उपलब्धियाँ गिनवाई हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

* समाजवादी पेंशन योजना- ग्रामीण उत्तर प्रदेश के ग़रीब परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से समाजवादी पेंशन के रूप में सरकार द्वारा उनके बैंक खाते में पाँच सौ रुपये की प्रतिमाह पेंशन।
* मुफ्त लैपटॉप- लगभग पंद्रह लाख ऐसे बालक एवं बालिकाओं को, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली है।
* 1090 विमेन हेल्पलाइन- इस पावर लाइन की शुरुआत महिलाओं को फ़ोन पर परेशान करना, अश्लील सन्देश भेजना, राह चलते उन्हें परेशान करना जैसे अपराधों को रोकने के लिए की गई है।
* किसानों का सशक्तिकरण- किसानों को न सिर्फ नहरों से सिंचाई की मुफ्त सुविधा दी जा रही है, बल्कि उन्हें मुफ्त बीज के साथ-साथ उर्वरक एवं खाद भी उपलब्ध कराई जा रही है।

इनके अलावा भी कुछ और चीज़ें लिखी गई हैं उस बुकलेट में, सब कुछ यहाँ लिखना संभव नहीं। लेकिन समझ में ये नहीं आता कि इतना कुछ कर कब दिया मंत्री जी ने। ख़ैर, कुछ मोटी-मोटी लाइनें और भी लिखी हैं।

* लखनऊ को देने रफ़्तार, हो रही मेट्रो तैयार 
* एक्सप्रेस-वेज़ से मिलेगी उत्तर प्रदेश की प्रगति को गति 
* ग्रामीण 'विकास' के वादे हुए पूरे 
* कौशल 'विकास' के पथ पर निरंतर अग्रसर उत्तर प्रदेश 
* उत्तर प्रदेश में अद्वितीय औद्योगिक 'विकास' के चार वर्ष 
* चार वर्षों की अवधि में राज्य सरकार ने ऊर्जा क्षेत्र में किया उल्लेखनीय सुधार 
* यू. पी. पर्यटन को भरपूर प्रोत्साहन 

इन्हीं मुद्दों का थोड़ा तफ्सील में वर्णन किया गया है। मज़े की बात ये है कि हमारे देश में "विकास" सबका चाहिता है। विकास का होना बहुत ज़रूरी है, फिर चाहें सरकार मोदी जी की हो या अखिलेश जी की या किसी और की भी। बुकलेट का थीम है "विकास के चार वर्ष।" जब इस पर नज़र पड़ी तो हँसी रुक ही नहीं पायी। शायद मंत्री जी को मालूम नहीं है कि विकास कभी यूपी की सड़कों के ट्रैफिक जैम में फस जाता है, तो कभी नॉएडा और वैशाली के गड्ढों में डूबता दिखाई देता है, या कभी वसुंधरा के कूड़े के ढेर में सड़ रहा होता है। उम्मीद है कि राज्य में और भी कई ऐसे इलाके होंगे जिनमें विकास अपना ये रूप दिखा रहा होगा।

जैसे-जैसे मेरी उँगलियाँ उस बुकलेट के पन्नों को पलट रहीं थीं, मेरी उलझनें भी बढ़ती जा रहीं थीं। इतने बारीक़ अक्षरों में न जाने क्या-क्या लिखा हुआ था। पढ़ने की इच्छा नहीं हुई। मगर जितना भी पढ़ा उस पे कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं है। और वैसे भी किसी भी प्रतिक्रिया से किसको क्या फ़र्क पड़ता है।

बात दरअसल ये है कि उस बुकलेट के पहले पन्ने पर ही एक दिलचस्प कविता लिखी हुई थी। शीर्षक था -"उम्मीदों का उत्तर प्रदेश।" कविता की पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं (मेरी समझ के विष्लेषण के साथ):

बदल रही है तस्वीर यहाँ की,
बदल रहा है भेष। 
फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(बात तो बिलकुल सही है। गौ-रक्षक बीफ खाने वालों को पीट-पीट कर उनका भेष बदल देते हैं इस प्रदेश में। अख़लाक़ जैसे लोग मर जाते हैं, इस बात का फ़क्र तो होना ही चाहिए। इसी प्रकार की करतूतों से इस राज्य की तस्वीर बदल रही है। देखते हैं और कितना बदलना बाक़ी है।)

फ़ासले मिनटों में सिमट रहे,
एम्बुलेंस झटपट जान बचाती है। 
विकास ही नहीं खुशियों में भी,
हो रहा निवेश। 

फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(जैसे ग़ाज़ियाबाद से नोएडा तो हम बस दस मिनटों में पहुँच जाते हैं और एम्बुलेंस उड़ कर मरीज़ के पास पहुँच जाती है, इस हद तक ये प्रदेश तरक़्क़ी कर चुका है। इसके अलावा सैफई के त्यौहार को देखकर पता चल ही जाता है कि मंत्री जी की खुशियों में सम्पूर्ण निवेश हो ही रहा है, तो फ़क्र होना ज़रूरी है भाई। वो अकेले क्यों फ़क्र करें, आपकी इच्छा है तो आप भी उनका साथ दे सकते हैं। )

 वृद्ध आत्मनिर्भरता से जी रहे,
महिलाएँ बेख़ौफ़ बाहर जाती हैं। 
फ़ैल रहा है चारों ओर,
खुशियों का सन्देश। 

फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(उम्मीद हैं मंत्री जी की पेंशन योजना वृद्धों का उद्धार कर ही रही होगी। साफ़ कर दूँ कि किसी वृद्ध से मेरी कोई चर्चा नहीं हुई है इस विषय पर। लेकिन महिलाएँ बेख़ौफ़? उत्तर प्रदेश में? बदायूं गैंगरेप तो गुजरात में नहीं हुआ था शायद। और जहाँ तक मुझे याद है स्नैपडील में काम करने वाली दीप्ति सरना भी हरियाणा से किडनैप नहीं हुई थी। पर क्या पता मीडिया वालों ने ही ग़लत खबर दिखा दी हो। वैसे भी आजकल मंत्रियों से ज़्यादा मीडिया बदनाम है। शायद मंत्री जी को इसी बात का फ़क्र है। आख़िर वो राज्य के मुख्यमंत्री हैं, ख़ुशफ़हमी तो होनी ही चाहिए न।)

भाईचारा हवा में घुल रहा,
सौ हाथ मदद को बढ़ते हैं। 
मिल रहे दिल और अमन का,
हो रहा प्रवेश।  

फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(ये भूलना मुश्किल है कि मुज़फ्फरनगर और बरेली के दंगों ने भाईचारे की कितनी अच्छी मिसाल क़ायम की है। बावरी मस्जिद और राम मंदिर से जो अमन स्थापित हुआ है पिछले कुछ सालों में, वो तो फ़क्र करने लायक ही है। अख़लाक़ के परिवार के सिर्फ सात सदस्यों के ख़िलाफ़ एफआईआर करवा उसके घरवालों की ज़िन्दगी भी संवार दी है मंत्री जी ने। क्या अब उन्हें इस बात का फ़क्र है कि इस बार कुछ ब्राह्मण वोट भी इखट्टे हो जाएंगे?)

पर्यटन दिन-ब-दिन बढ़ रहा,
अब स्मार्ट सिटीज़ की तैयारी है। 
बदलाव की इस लहर को,
देख रहा है देश। 

फक्र है, और क्यों न हो,
संवर रहा है उत्तर प्रदेश। 

(मंत्री जी शायद शुक्रगुज़ार हों मुग़लों के जिनके नाम पर उनके राज्य में इतने पर्यटन स्थल बने हुए हैं। मग़र ये यक़ीन करना बहुत मुश्किल है कि इस जन्म में हम उत्तर प्रदेश में स्मार्ट सिटी देख पाएंगे। बहरहाल, मुझे फिलहाल ये नहीं पता कि किस बदलाव की लहर को देखने की बात हो रही है- स्मार्ट सिटी के खोखले वादे या रेलवे स्टेशनों और नुक्कड़ों पर मौजूद 'स्मार्ट' कचरा। कभी मौक़ा मिले तो पूछा जाए।)

पता नहीं क्यों मुझे उस शख़्स पर तरस आ रहा है जिसने ये कविता लिखी होगी। जो बातें मेरे ज़ेहन में हैं क्या वो उनसे वंचित होगा? हर वो नागरिक जिसने वो बुकलेट पढ़ा होगा क्या वो मेरी यहाँ लिखी बातों से इत्तेफ़ाक रखेगा ?

चुनाव नज़दीक हैं। वोट माँगने की तैयारी अभी से ही करनी पड़ेगी। इस दिशा में ये बुकलेट शायद मंत्री जी का पहला क़दम है। आगे आने वाली नीतियों का इंतज़ार रहेगा। धन्यवाद। 

संवर रहा है उत्तर प्रदेश,
बता रहे हैं अखिलेश। 

Thursday, 28 July 2016

वो कहाँ चलीं गईं ?

बात दो साल पुरानी है। मैं तब गुड़गाँव में स्थित एक विशाल और बेहद शानदार बिल्डिंग "टाइम्स इंटरनेट" में इंटरव्यू देने गयी थी।

पहुँचते ही एचआर से मुलाक़ात हुई। उन्होंने मुझे इंतज़ार करने को कहा और मेरे लिए टेस्ट पेपर लेने चली गईं। मैं चुपचाप अपने सामने बैठे बाक़ी के इंटरव्यू देने आये लोगों को देखने लगी। वे सभी काफ़ी अनुभवी मालूम होते थे। शायद मैं ही सबसे छोटी थी वहाँ।

अभी ये सब सोचकर डर महसूस होना शुरू ही हुआ था कि अचानक एक महिला पर नज़र पड़ी। बहुत ही खुशमिज़ाज़ मालूम होती थीं वो। मेरा ध्यान बार-बार उनकी ओर जा रहा था।

मैंने उन्हें तराशना शुरू किया ही था कि एचआर टेस्ट पेपर लेकर आ गयी। हमारे हाथों में  उन्हें थमा दिया गया और नीचे जाकर हमें एक कमरे में बैठने को कहा गया। हम केवल चार या छह लोग होंगे लेकिन वो कमरा बहुत बड़ा था।

हम सबने पेपर लिखना शुरू किया। कमरे में घोर सन्नाटा था। वो महिला लेकिन उस सन्नाटे की खामोशी को तोड़ रही थीं। कुछ ढूँढ रहीं थीं अपने बैग में, शायद पेन।

सारी मशक़्क़त करने के बाद उन्होंने पूछ ही लिया, "एनीवन हैज़ गॉट एन एक्स्ट्रा पेन?"

सबकी नज़रें उन पर थीं। मैंने तुरंत अपनी सीट से उठकर उनके पास जाकर उन्हें पेन दे दिया। बड़े दिल से उन्होंने मेरा धन्यवाद किया। मैं वापिस अपनी सीट पर बैठकर टेस्ट करने लगी।

कुछ घंटे बीत गए थे। लोग कमरा छोड़कर जाने लगे थे। आख़िर में वहाँ तीन ही लोग बचे थे- मैं, वो महिला और एक पुरुष और।

मैं तेज़ी से अपना टेस्ट ख़त्म करने की कोशिश कर रही थी। थोड़ी देर बाद मेरा टेस्ट ख़त्म हुआ और  मैं अपना सामान उठकर जाने लगी। सहसा याद आया कि मेरा पेन उस महिला के पास है।

मैं वहीँ खड़ी होकर इंतज़ार करने लगी और उनकी ओर देखने लगी। हाँलाकि एक पेन दान देने में कोई हर्ज नहीं था, लेकिन अगर मैं वहाँ खड़ी ना रहती तो हम शायद इतने अच्छे दोस्त नहीं बन पाते, जितने कि आज बन गए हैं।

आज वो ख़ासतौर पर मुझसे मिलने आयीं थीं। टाइम्स इन्टरनेट में हुई मुलाक़ात के बाद आज हम दूसरी बार मिल रहे थे। इस बीच फेसबुक और व्हाट्सएप्प ने हमें जोड़े रखने में काफ़ी मदद की।

दो सालों में बहुत कुछ बदल गया था। जिन श्वेता से मैं तब मिली थी वो तो किसी हँसते-खेलते छोटे से बच्चे की तरह थीं। तब हम अजनबी थे लेकिन जितने प्यार से उन्होंने मुझे तब गले लगाया था, वो आज मौजूद नहीं था।

उस दिन किसी बात पर वो कहना चाह रहीं थीं, "माय हस्बैंड इज़...... "

"हस्बैंड?" इसे पहले कि उनका  वाक्य  पूरा होता मैंने बड़े अचंभे से पूछा था।

"हाँ। " ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा था।

"आप मैरिड हो ?" और भी आश्चर्य के साथ मैंने पूछा था।

"हाँ।" ज़ोर से हँसते हुए उन्होंने कहा था।

"आप तो शादीशुदा लगती ही नहीं हो।" मैंने फिर अचम्भे में कहा था।

"वाओ! दैट्स सच आ लवली कॉम्प्लिमेंट। आई विल टेल दिस टू मय हस्बैंड।" उन्होंने हँसते हुए कहा और मुझे गाला लगा लिया था।

एक पल को मुझे ऐसा लगा था जैसे वो अजनबी हैं ही नहीं।

आज मग़र एक-दूसरे को जानते हुए भी मैं उन्हें अजनबी-सा महसूस कर रही थी। वो जब से आईं थीं, कुछ-कुछ बोलती जा रहीं थीं। मेरे ज़ेहन में ख़याल कुछ ऐसा था कि जब वो आएँगी तो हम घंटों बातें करेंगे, खूब मस्ती करेंगे ,सेल्फियाँ खिंचवा-खिंचवा के फेसबुक पर अप्लोड करेंगे।

अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं हुआ। वो जब लगातार बोलती जा रही थीं, बीच में किसी का फ़ोन आया। वो फ़ोन पर बात करने लगीं और मैं उनकी आँखों में, उनकी बातों में, उनकी वो पुरानी अजनबी शख़्सियत तलाशने की कोशिश करने लगी जो उस दिन एक पल में मेरी दोस्त बन गई थी। कोफ़्त इस बात का हुआ कि वो मुझे नहीं मिली।

"आपको कुछ हो गया है।" उनके फ़ोन रखते ही मैंने उनसे कहा।

"हेहे! काम की टेंशन है यार।" एक फ़र्ज़ी सी हंसी दिखा दी उन्होंने मुझे अपने होठों पर।

"आपकी आँखों से मैं पकड़ पा रही हूँ कि कुछ तो तक़लीफ़ है।" मैंने ज़ोर देते हुए कहा।

"पकड़ा तो तुमने बिल्कुल सही है।" फिर से उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, आँखों में आये सैलाब को उँगलियों से रोकते हुए।

कुछ तो था जो शायद वो मुझे दोस्त के नाते बता सकतीं थीं पर बंदिश तो हर रिश्ते में होती ही है। शायद हमारे रिश्ते की भी कोई हद ज़रूर होगी। उसी को निभाते हुए वो फिर मुस्कुराईं और जाने के लिए कहने लगीं। मैंने भी रुकने को नहीं कहा।

हज़ारों सवाल और ख़याल मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में दौड़ रहे थे उस पल। लेकिन होठों को जैसे शब्द ही नहीं मिल रहे थे। मैं चुप थी। मन ही मन दुआ कर रही थी कि उनकी तक़लीफ़ की जो भी वजह है वो बस ख़त्म हो जाए।

जाते वक़्त उन्होंने फिर मुझे गले लगाया मगर आज वो बात थी ही नहीं जो दो साल पहले थी। न जाने क्या हो गया है उनको? पहले से काफ़ी बदल गईं हैं।

वैसे तो वक़्त बदल गया है।  मैं ख़ुद भी बहुत बदल गई हूँ, तो फिर उनके बदले मिजाज़ से इतनी हैरत क्यों?

ज़िन्दगी ऐसी ही होती है शायद। हर दिन अच्छा नहीं होता और हर दूसरा दिन बुरा नहीं होता। हो सकता है उस वक़्त कोई वजह हो जो उन्हें परेशान कर रही हो पर मुझे इस बात की ख़ुशी होनी चाहिए कि उन्होंने बेहद मसरूफ होने के बावजूद मुझसे मिलने के लिए वक़्त निकाला और मैं खुश हूँ भी, बहुत खुश।

मगर वो जिनसे मिलने की मुझे उम्मीद थी वो कहाँ चली गईं ? क्या वो वापिस आएँगी? इस सवाल का जवाब कौन देगा ?

Saturday, 11 June 2016

"दीदी, दस रुपये दे दो।"

हर शाम की तरह दफ़्तर से निकल नॉएडा सेक्टर -16 मेट्रो स्टेशन जा रही थी। सीढ़ियां चढ़ते समय अचानक एक आवाज़ कानों में पड़ी, "दीदी, दस रुपये दे दो, आपको दुआ लगेगी।"

बिना रुके मैंने नज़र घुमाई तो देखा कि एक छोटी-सी बच्ची फटी फ्रॉक पहने, बिखरे बाल लिए, धूल में लिपटी हुई सीढ़ियों के एक कोने पर बैठी हुई थी।

उस शाम कुछ हुआ तो था जिससे दिल टूट-सा गया था। दुआओं की ज़रुरत थी। पर क्योंकि क़दम आगे बढ़ गए थे तो पलट कर जाने की इच्छा नहीं हुई। दो घड़ी बाद याद आया कि पर्स में 10 रुपये थे ही नहीं, 100 थे।

प्लेटफार्म पर पहुँच गई थी लेकिन वो वाक्य शायद ज़हन में उतर गया था। बार-बार सोच रही थी कि 10 रुपये कहाँ से देती जब थे ही नहीं। पैसे खुले करवा लेने का भी कोई विकल्प उस पल नज़र नहीं आ रहा था। अब 100 रुपये देकर उससे 90 वापिस तो नहीं लेती। तकलीफ़ मग़र बहुत थी। मन कर रहा था अभी दौड़कर जाऊँ और उसे 100 रुपये ही दे दूँ। घर पहुँचना भी तो लेकिन ज़रूरी था।

उससे पूँछने का मन था, "10 रुपये दूँगी तो दुआ लगेगी, 20 दूँगी तो क्या होगा? और अगर 100 दूंगी तो?"

क्या जवाब देती वो? क्या वो कहती, "दीदी, तुम्हारे बिगड़े काम बन जाएँगे।"

क्या उसे पैसे देकर मेरे दिल को सुकूँ मिल जाता? जो मैं चाहती हूँ वो हो जाता? आख़िर क्या होता?

जवाब यकीनन उसके पास भी नहीं होता। सवाल अब भी मगर मौजूद है। 

Sunday, 22 May 2016

जेस्सी जैसी कोई नहीं।

साँवली-सी एक लड़की, आँखों में बड़ा-बड़ा काजल, होठों पर लाल रंग की गाढ़ी लिपस्टिक, माँग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, बालों को समेटे, लम्बी कद-काठी लिए अचानक मेरी कुर्सी के पास आकर खड़ी होती है। देखते ही अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था कि वो एक साउथ इंडियन है और उसकी हाल ही में शादी हुई है। उस लड़की की लिखी गई कॉपी एडिट हो रही थी। हम दोनों के एडिटर साहब एक ही थे। वो दफ़्तर में नयी थी।

इधर उसकी कॉपी एडिट हो रही थी, उधर मैं उसे तराशने की कोशिश में लग गई। उसे ध्यानपूर्वक देखा तो ये एहसास हुआ कि शायद उसकी शख़्सियत बहुत ही संजीदा है। वो अपनी कॉपी एडिट होते बड़ी ही सहजता से देख रही थी। चेहरे पर मासूमियत थी, पर कहीं-न-कहीं आँखों से शरारत भी झलक रही थी। आख़िर कैसे ना झलकती, वो हमारी चुलबुली "जेस्सी" जो थी।

वो कहते हैं ना कि जैसे-जैसे किसी शख़्स के साथ वक़्त बीतता जाता है, हम उसे और क़रीब से जानने लगते हैं, उसे समझने लगते हैं। यही हुआ मेरे और जेस्सी के साथ।

उस दिन उन्हें ग़ौर से देखने के बाद एक दिन उनसे लंच में मुलाक़ात हुई। अब किसी के साथ बैठकर खाना खाओ तो दोस्ती होते देर कहाँ लगती है। बस हो गई दोस्ती और हम निभाते चले गए।

इसी तरह एक साल कैसे उस दफ़्तर में बीत गया पता ही नहीं चला (पर जब बीत रहा था, तब पता चल रहा था।) जेस्सी उम्र में मुझसे बड़ी हैं पर मैं फिर भी उन्हें मैडम या दीदी कहकर नहीं बुलाती। वो किसी बड़ी दीदी से ज़्यादा दोस्त हो गई हैं और हमेशा वही रहेंगीं। हालाँकि वो मुझे ज़रूर 'बेटा' बुलाती हैं और इसलिए मुझे ये लफ्ज़ काफ़ी अज़ीज़ है।

इसे ख़ुशक़िस्मती ही कहेंगे शायद कि बचपन से लेकर आज तक मेरी ज़िन्दगी में ऐसे लोग हमेशा आते रहे हैं जिन्होंने हर बार मेरे टूट जाने पर मेरा हौंसला बढ़ाया है। जेस्सी भी उनमें से एक हैं और हमेशा रहेंगी। भावना तो मेरी दफ़्तर वाली माँ थीं हीं, पर जेस्सी भी कोई उनसे कम नहीं रहीं। उनका डाँटना, चिल्लाना, प्यार करना, बार-बार लिखने और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना, मेरे पत्रकारिता के ख्वाब को कभी टूटने ना देना और न जाने क्या-क्या........ द लिस्ट इज़ एंडलेस, बातों ही बातों में उन्होंने मेरे लिए इतना कुछ कर दिया कि अब उनकी आदत-सी हो गई है। स्पेशल थैंक्स टू व्हाट्सएप्प जो हमें एक-दूसरे से लगभग हर दिन बात करने का मौक़ा देता है।

हर सुबह जब मैं दफ़्तर पहुँचती थी तो मेरे दिन की शुरुआत उनका मुझे गले लगाने से होती थी। मेरे अंदर आते ही वो बड़ी-सी मुस्कान के साथ बाहें फैलाए मेरा इंतज़ार करती थीं और मैं बैग रखते ही भागते हुए किसी छोटे से बच्चे की तरह उनसे लिपट जाती थी। अच्छा महसूस होता था। लगता था कि उस माहौल में भी मुझमें ज़िन्दगी बाक़ी है। गर्मी हो या सर्दी, उनका मुझे गले लगाना निश्चित था। मुझे मेरे हुनर (जितना भी है) से वाक़िफ़ कराने में उनका बहुत बड़ा हाथ है जिसके लिए मैं तमाम उम्र उनकी शुक्रगुज़ार रहूँगी ।

जेस्सी एक आज़ाद पंछी की तरह हैं, हमेशा बस चहकती रहने वालीं। दफ़्तर में भी चाहें कितनी ही उलझनें क्यों न हों, वो होती थीं तो हम सबको ज़िंदा होने का एहसास होता था। यद्यपि अगर वो कभी ख़ामोश हो जाती थीं तो हम सबका कलेजा मुँह को आ जाता था। ख़ासतौर पर मुझे तो उनकी ख़ामोशी काटने को दौड़ती थी। आज हम एक दफ़्तर में नहीं हैं मग़र अब भी उन्हें उदास देखने की कल्पना करना भी भयावह लगता है।

वैसे तो पंछी अक्सर आकाश में उड़ते हुए अच्छे लगते हैं, मगर मैंने इस पंछी को ज़मीन पर ही अपने ख़्वाबों के पर फैलाते देखा है। पर आप चाहें कितने ही मशहूर या सफल क्यों न हो जाएँ, पाँव ज़मीन पर रहना ज़रूरी है। जेस्सी एक ऐसा पंछी है जिनके पाँव के साथ पर भी ज़मीन पर ही हैं। 

बस उम्मीद इतनी है कि बहुत जल्द वो अपने परों को ज़मीं पर ही फैलाए अपने ख़्वाबों की उड़ान भारती नज़र आएँ क्यूँकि वो इसके लायक है और वो ऐसा ज़रूर कर दिखाएंगी। आफ़्टर आल, जेस्सी जैसी कोई नहीं।

निजी तौर पर मुझे जेस्सी से इसलिए भी ख़ास लगाव है क्यूंकि उन्हें मेरी ये फ़र्ज़ी दुनिया बहुत पसंद है। मेरा लिखा शायद ही कोई लेख हो जो उन्होंने ना पढ़ा हो। फिर चाहें वो अंग्रेजी में हो या हिंदी में ही। उम्मीद है कि इसे पढ़कर भी उन्हें ख़ुशी महसूस होगी।

जेस्सी के साथ दफ़्तर में बीता एक लम्हा। 

Friday, 29 April 2016

विश्वास!

'रिश्ते'- सुनने में यह शब्द छोटा लगता है पर इसका भार बहुत होता है। जिस पल हम माँ की कोख छोड़कर इस दुनिया का दीदार करते हैं, हज़ारों रिश्ते हमसे जुड़ जाते हैं। पिता, भाई, बहन, दोस्त, चाचा, मामी, ताई, मौसी और न जाने कौन- कौन। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमें इन रिश्तों की अहमियत समझाई जाती है। हम उन रिश्तों को जीने-निभाने लगते हैं क्यूँकि हमें वही सिखाया जाता है।

कुछ वक़्त बाद ये होता है कि हम होश सँभालने लगते हैं और समझ बढ़ने लगती है। हम रिश्तों को अपनी नज़र से भांपना शुरू कर देते हैं। कदम घर के बाहर पड़ते हैं तो हज़ारों अजनबी राह में टकरा जाया करते हैं। कुछ तो आकर जाने के लिए होते हैं तो वहीँ कुछ से जीवन भर का रिश्ता जुड़ जाता है।

इन्हीं अजनबियों में एक शख़्स से मुलाक़ात हुई जिनका नाम है 'विश्वास'। हम एक दफ़्तर में काम किया करते थे। हमारी पहली मुलाक़ात के बारे में मुझे सब कुछ याद नहीं, मग़र इतना ज़रूर याद है कि उन्होनें पत्रकारिता को लेकर मुझमें बहुत हौंसला जगाया था। मेरा आत्मविश्वास जो हर दिन बस घटता जा रहा था, उसे वापिस लाने में उन्होंने मेरी मदद की। दफ्तर में जब आये थे, तो उन्हें मेरी ही टीम में रखा गया था। ज़रा सी भी परेशानी होती थी उन्हें तो "एकांकी ये बताना, ज़रा आओ तो, सुनो; अच्छा एकांकी ये बताना ये कैसे होगा; एकांकी, देखना ज़रा ये न्यूज़ अपलोड नहीं हो रही है, देखो क्या प्रॉब्लम है; अच्छा एकांकी तुमने वो ट्रांसक्रिप्शन कर दिया, वो कर दो यार ज़रा।" हर वक़्त बस एक ही सहारा था उनका, एकांकी। और एकांकी को भी उनका साथ देना ही था। वजह स्पष्ट थी।

लोग अक्सर कहा करते हैं कि मैं बहुत बड़ी-बड़ी बेवजह की बातें किया करती हूँ, बिग ब्रदर को भी कभी-कभी ऐसा लगता है पर कहीं-न-कहीं उन्हें ये यकीं है कि उनकी छोटी बहना ज़रूर क़ामयाब होगी। कभी अगर ऐसा कोई दिन आएगा तो मुझे ये भरोसा है कि मेरे लिए दुआ करने वालों में एक नाम उनका भी ज़रूर शुमार होगा। बिना "विश्वास" के कोई जीवन में आगे कैसे बढ़ सकता है।

विश्वास के बारे में ख़ास बात ये है कि वो अपने नाम की गुणवत्ता को हमेशा क़ायम रखते हैं। वो कभी किसी का विश्वास नहीं तोड़ते। ख़ैर, मेरा तो अब तक नहीं तोडा, बाकियों से भी ऐसा ही सुनने को मिलेगा, ऐसी मुझे उम्मीद है। वैसे जो शख़्स दूसरों में जीने और अपने ख़्वाबों को पूरा करने की उम्मीद जगाये, उन्हें हौंसला दे, वो कभी किसी के साथ बुरा भी कर सकता है, ये ख्याल दिल को रास नहीं आता। यहाँ तक कि उस शख़्स के साथ भी कभी कुछ ग़लत नहीं हो सकता।

विश्वास का आत्मविश्वास ज़िंदा रहना ज़रूरी है। अल्लाह की उन पर रहमत ज़रूर होगी।

बिग ब्रदर के साथ मेरी पहली सेल्फी।

Monday, 28 March 2016

माँ- शब्द ही काफ़ी है

बचपन से हम पढ़ते और सुनते आये हैं कि माँओं में बहुत हौंसला होता है। हर मुश्किल को बड़ी ही आसानी से झेल जाती हैं हमारी माँएं, ख़ासतौर पर अपने बच्चों के लिए तो वो कुछ भी कर-गुज़रने का हौंसला रखती हैं।

पर ज़िन्दगी में हम किताबों और शिक्षकों द्वारा पढ़ाई गयी बातों से ज़्यादा अपने खुद के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखते हैं। ऐसा ही एक तजुर्बा मैं साझा करने जा रही हूँ, पढ़ियेगा :

सुबह-सुबह हम अस्पताल पहुँचे, माँ को वार्ड में ले जाकर कपड़े बदलने को कहा गया। आसमानी रंग के मरीज़ों वाले कपड़े पहन कर माँ बिस्तर पर लेट गई। मैं वहीँ उनके पास बैठकर उन्हें बातों में उलझाने लगी। हालाँकि ऑपरेशन ज़्यादा बड़ा नहीं था, पर फिर भी कहीं-न-कहीं हम दोनों घबरा रहे थे। मोबाइल में उनकी तसवीरें लेकर मैं उनका ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही थी, पर वो भी शायद सब कुछ समझ रही थीं। उनके होठों पर सजी मंद-मंद मुस्कान डर को छिपाने में सफल थी।

थोड़ी ही देर बाद डॉक्टर साहिबा आ गईं। आते ही उन्होंने माँ से पूछा- "तैयार हो?"

"हाँ डॉक्टर साहिब," माँ ने धीमे स्वर में कहा।

तभी एक नर्स एक ट्रे में न जाने कितने प्रकार के इंजेक्शन्स और कई अन्य सामान ले आई। इतना सब देखकर मेरी आँखें फटी रह गईं। मेरा पहला अनुभव था। पहले कभी इस तरह की स्थिति से सामना नहीं हुआ था। अब घर की बड़ी बेटी होने के नाते सब कुछ मुझे सम्भालना था। यद्यपि ज़िम्मेदारी मुझपर थी, लेकिन पापा से ज़्यादा नहीं। वो भी हमारे साथ ही मौजूद थे और मुझसे भी ज़्यादा भाग-दौड़ कर रहे थे।

नर्स ने पहले माँ के बाएं हाथ में इंजेक्शन लगाया, फिर कमर में। मुझसे देखा तो नहीं जा रहा था पर मैंने निश्चय किया था कि आज अपना इम्तिहान मुझे खुद ही लेना है, बिना डरे सभी इंजेक्शन्स का सामना करना है। कुछ ही पलों में मुझे महसूस होने लगा कि मैं धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही थी। जब तीसरा इंजेक्शन लग रहा था, मेरे पैर काँपने लगे और मैं साइड में रखे स्टूल पर बैठ गई। सर बहुत तेज़ चकरा रहा था पर इरादा यही था कि माथे पर कोई शिकन ना दिखे।

बाहर से एक बूढ़ी महिला व्हीलचेयर लेकर आयीं जिस पर बैठकर माँ को ऑपरेशन थिएटर जाना था। मेरा शरीर पूरी तरह से काँप रहा था पर मैं किसी तरह माँ को चेयर तक ले गई और उन्हें बिठाते ही अपने होश खो बैठी।

हल्की-हल्की आवाज़ से पापा को पुकारने लगी पर मन में एक ही ख़्याल चल रहा था कि माँ के आगे कमज़ोर नहीं पड़ना है। अफ़सोस, मैं हार गई। माँ की व्हीलचेयर मुझसे दूर जाती जा रही थी पर मुझे सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था। जो थोड़ा-बहुत याद है वो ये कि माँ बार-बार पलट-पलट कर मुझे देख रही थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरी ऐसी हालत देखकर उन्हें बहुत बुरा लग रहा होगा लेकिन वो जल्दी ही मेरी आँखों से ओझल हो गईं।

मैं अभी तक पापा का हाथ थामे खड़ी थी। अचानक एक और नर्स कुर्सी लेकर आई। मुझे बिठाया गया, पानी पिलाया गया। हल्ला होने लगा कि इसको एडमिट कर दो पर मैं जानती थी कि मुझे एडमिट होने की कोई ज़रूरत नहीं। ये सच है कि सर बहुत तेज़ घूम रहा था और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा था, लेकिन मुझे कमज़ोर नहीं पड़ना था बस।

चेहरा पसीना-पसीना हो गया था। मैं कुछ देर कुर्सी पर बैठी, गहरी सांस ली और ठीक महसूस करने लगी।

अब मुझे इंतज़ार था बस माँ के लौट आने का। वार्ड में अकेले ख़ामोश बैठी मैं माँ का इंतज़ार कर रही थी।  क़रीब दो घंटे बाद उन्हें वहाँ शिफ्ट किया गया। एनेस्थीसिया का असर अभी भी था। वो चुपचाप लेटी हुई थीं किसी मासूम बच्चे की तरह। मैं बस उनके पास बैठकर उन्हें देखती जा रही थी, सुकून और शान्ति महसूस हो रही थी। उनके चेहरे पर वो हौंसला पढ़ने की कोशिश कर रही थी जिसकी मदद से वो इतने सालों से हमें पालती-पोसती आई थीं, हर परेशानी से जूझती आई थीं, और उस दिन ऑपरेशन थिएटर से वार्ड के उस बिस्तर तक आई थीं ।

सब कुछ साफ़-साफ़ लिखा था उस चेहरे पर- वो हौंसला, वो संघर्ष, वो जज़्बा, वो हिम्मत और ये ज़िन्दगी। 



Sunday, 13 March 2016

बदलता वक़्त, बदलते लोग

एक साल बीत चुका था। उस दिन फिर वैसी ही सुबह थी। ठंडी-ठंडी हवा का एहसास और नॉएडा की सड़कों पर तेज़ रफ़्तार से चलती एक गाड़ी जिसमें हम सब सवार थे (मैं और मेरे कुछ सहकर्मी)।

शायद एक अरसे बाद सूरज को सुबह-सवेरे किरणें बिखेरते हुए देखा था। अच्छा महसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था मानो गाड़ी में बैठे-बैठे पूरा नॉएडा घूम लिया हो। रास्ते में बड़े-बड़े बिल्डरों के बड़े-बड़े हाउसिंग प्रॉजेक्ट के ज़रिये नॉएडा की बदलती सूरत देखने को मिल रही थी। हो सकता है इसी वजह से एक 'ग्रेटर' नॉएडा की आवश्यकता आन पड़ी है। एक सेक्टर तो ऐसा था, देखकर लगा मानो यहाँ बिल्डिंगों की बाढ़-सी आ गई हो। और चलते-चलते पिछली बार की तरह हम इस बार भी ग्रेटर नॉएडा में स्थित स्टेलर जिमख़ाना पहुंच गए। वहाँ की हरी घास, बड़ी-सी बिल्डिंग, झील, फ़ूल, पौधे और बड़ा-सा मैदान उस जिमख़ाने की खूबसूरती को साफ़-साफ़ बयाँ कर रहा था।

मैदान क्रिकेट खेलने के लिए बिल्कुल तैयार था, हम सब भी पूरी तरह कमर कसकर मैदान में उतर गए। एकाएक ही बारिश ने मौसम का रुख़ बदल दिया, मग़र हम भी कहाँ हार मानने वाले थे। सब लोगों पर बैट और बल्ले का ऐसा जूनून सवार था कि आख़िरकार बारिश को हार माननी ही पड़ी।

बारिश बंद हुई और खेल शुरू हुआ। मुझे किसी टीम का 'एक्स्ट्रा प्लेयर' रखा गया था। अधिकतर महिलाओं के साथ यही हुआ था। ख़ैर, मुद्दा ये नहीं है। मन में उत्साह था तो सही पर कहीं-न-कहीं डगमगा-सा रहा था। सभी टीम के खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। मैंने भी फ़ील्ड पर और अपनी पारी खेलते वक़्त कुछ ख़ास प्रदर्शन तो नहीं किया मग़र कोशिश ज़रूर अच्छी की। अफ़सोस कि उस कोशिश के बावजूद मेरी टीम हार गयी।

इसके बाद ही क्रिकेट से ध्यान हटकर बाक़ी की एक्टिविटीज़ पर चला गया। वॉल क्लाइम्बिंग, आर्चरी, शूटिंग, ज़िप लाइन, इत्यादि। पिछली बार भी वो सारी चीज़ें की थीं। हौंसला बढ़ाने वाले तब भी थे, अब भी थे। इस बार सारे स्टंट्स कर लिए, फिर मौका क्या पता कब मिले?

जैसे-जैसे दिन बीत रहा था, कुछ लोगों की कमी महसूस होती जा रही थी। वो लोग जो उस साल इस खेल में शुमार थे, इस बार मगर संस्थान में ही नहीं थे। अच्छा नहीं लग रहा था। वो लोग होते तो शायद और मज़ा आता, और ख़ुशी होती, और अच्छा लगता। जो लोग मगर मौजूद थे उनकी वजह से भी दिन खूबसूरत बना, अच्छा लगा। वो भी इस दिल के करीब हैं। मैं अगर किसी क़ाबिल हूँ, तो उसमें उन सबका श्रेय है।

जगह वही थी, जज़बात वही थे, बस लोग बदल गए थे। वो अंग्रेजी में कहते हैं न "चेंज इज़ कांस्टेंट," वैसा ही कुछ था। कुछ अच्छा था, कुछ बुरा ; कुछ सही था, कुछ ग़लत भी। बस तजुर्बा था, कुछ सीखने का, आगे बढ़ने का।

पिछली बार भी क्रिकेट खेलना नहीं आता था मुझको, इस बार भी कुछ ख़ास नहीं किया। उम्मीद है एक दिन मैं सीख जाऊंगी और किसी दिन ऐसी ही किसी टीम की जीत का कारण बनूँगी। (सीरियसली मत लीजियेगा)।


माहौल दर्शाती एक सेल्फ़ी।