दफ़्तर- एक ऐसी जगह जहाँ हम पैसे कमाने जाते हैं। कमाई हर किसी के जीवन यापन के लिए एकमात्र सहारा जो है। सच है।
एक सच ये भी है कि हमारी ही तरह हमारे सहकर्मी भी वहाँ पैसे कमाने ही आते हैं, काम करते हैं। काम करते-करते मग़र कुछ लोग कब नोट बनाने की मशीन में तब्दील हो जाते हैं, इसका एहसास नहीं हो पाता।
दफ़्तरों का आलम अक्सर ऐसा होता है कि कभी कुछ सहकर्मियों को हम दोस्त समझ बैठते हैं, कुछ तो दोस्त ही वहाँ आकर सहकर्मी हो जाते हैं और कभी-कभी वक़्त ऐसा मंज़र दिखाता है कि जिसमें दोस्त सहकर्मी से अजनबी हो जाते हैं।
एक संस्थान में नौकरी करते वक़्त एक सीनियर ने कहा था, "हमेशा एक बात याद रखना। दफ्तरों में कोई किसी का दोस्त नहीं होता, सब महज़ एक-दूसरे के प्रतियोगी होते हैं।"
उस वक़्त उनकी बात सिर के ऊपर से चली गयी थी, तजर्बा ज़रा कम था न। आज भी ज़्यादा तो नहीं है मग़र इतना हो गया है कि वो बात अब ज़हन में हमेशा के लिए बैठ गई है।
हर बार एक झूठी उम्मीद हुआ करती थी कि कोई दफ़्तर तो ऐसा होगा जहाँ लोग ईमानदारी से काम करते होंगे, एक-दूसरे को, उनकी मुश्किलों और परेशानियों को समझते होंगे। खुद को और अपने सहकर्मी को पैसा बनाने की मशीन नहीं बल्कि इंसान समझते होंगे। मग़र अफ़सोस !
ऐसा ही होता है शायद इस जहाँ में। हम खुदगर्ज़ होते हैं। कोई मरे या जिये, हमें क्या ? हमें बस अपने पैसों से मतलब है। दफ़्तर हमारा घर नहीं, रोकड़ा कमाने का साधन है। जितना पैसा मिले, बस उतना काम करो।
यदि कोई अपने संस्थान को बेहतर बनाना चाहता है और उसके लिए थोड़े एक्स्ट्रा एफर्ट्स लगाता है तो दुनिया उसे बेवक़ूफ़ समझती है और क्यों न समझे ? ये हमारे देश की रीत है जिसका पालन हम सबको बख़ूबी करना आना चाहिए।
बात रही दोस्ती की तो हमारी ख़ुशनसीबी है कि अगर कोई दोस्त हमारा सहकर्मी बन जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो हमें गहराई से जानता है, उसके साथ किसी भी चीज़ के लिए सामंजस्य बिठाना दुर्लभ नहीं होता। एक-दूसरे की सूझ-बूझ और समझ से दफ़्तर में दिन आसानी से गुज़र जाता है। यही नफ़ा होता है एक दोस्त के सहकर्मी हो जाने का।
सहकर्मियों के साथ का रिश्ता अक्सर "हाय-हेल्लो" तक सीमित रहता है। बहुत ज़्यादा हुआ तो इंसानियत का, बस। एक-आद से अगर हमारे सोच-विचार या हमारा बैकग्राउंड मिलता हो तो उनसे कुछ छुट-पुट बातें हो जाती हैं। कभी-कभी थोड़ा बहुत पर्सनल भी सही।
शायद इतना ही सहकर्मियों का दायरा होता है। बातों और जज़बातों की अगर किसी से ज़्यादा साझेदारी होने लगती है तो ये एक मसला बन सकता है जिसका हल शायद मुमकिन नहीं। जैसे-जैसे वक़्त बीतेगा, हमें ये महसूस होना शुरू होता जाएगा कि हम किसी जंजाल में फँसते, ऊलझते जा रहे हैं।
एक बड़े से संस्थान में हम हर शख़्स को दोस्त का दर्जा नहीं दे सकते, संभव ही नहीं है। जीवन में दोस्त बहुत अज़ीज़ होते हैं। हर दूसरे-तीसरे शख़्स को 'दोस्त' कहकर इस शब्द की तौहीन करना भी मुनासिब नहीं है।
बहरहाल, इसमें कोई शक़ नहीं कि दफ़्तर हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा है, मगर हमारी ज़िन्दगी नहीं। और रही बात दोस्त की, तो फिर उसी दफ्तर में एक सच्चे दोस्त का साथ होना ही हमारी ज़िन्दगी है। हालात अच्छे हों या बुरे, उसके सदा साथ होने का यक़ीन हमें ज़िंदा रखता है ।
एक सच ये भी है कि हमारी ही तरह हमारे सहकर्मी भी वहाँ पैसे कमाने ही आते हैं, काम करते हैं। काम करते-करते मग़र कुछ लोग कब नोट बनाने की मशीन में तब्दील हो जाते हैं, इसका एहसास नहीं हो पाता।
दफ़्तरों का आलम अक्सर ऐसा होता है कि कभी कुछ सहकर्मियों को हम दोस्त समझ बैठते हैं, कुछ तो दोस्त ही वहाँ आकर सहकर्मी हो जाते हैं और कभी-कभी वक़्त ऐसा मंज़र दिखाता है कि जिसमें दोस्त सहकर्मी से अजनबी हो जाते हैं।
एक संस्थान में नौकरी करते वक़्त एक सीनियर ने कहा था, "हमेशा एक बात याद रखना। दफ्तरों में कोई किसी का दोस्त नहीं होता, सब महज़ एक-दूसरे के प्रतियोगी होते हैं।"
उस वक़्त उनकी बात सिर के ऊपर से चली गयी थी, तजर्बा ज़रा कम था न। आज भी ज़्यादा तो नहीं है मग़र इतना हो गया है कि वो बात अब ज़हन में हमेशा के लिए बैठ गई है।
हर बार एक झूठी उम्मीद हुआ करती थी कि कोई दफ़्तर तो ऐसा होगा जहाँ लोग ईमानदारी से काम करते होंगे, एक-दूसरे को, उनकी मुश्किलों और परेशानियों को समझते होंगे। खुद को और अपने सहकर्मी को पैसा बनाने की मशीन नहीं बल्कि इंसान समझते होंगे। मग़र अफ़सोस !
ऐसा ही होता है शायद इस जहाँ में। हम खुदगर्ज़ होते हैं। कोई मरे या जिये, हमें क्या ? हमें बस अपने पैसों से मतलब है। दफ़्तर हमारा घर नहीं, रोकड़ा कमाने का साधन है। जितना पैसा मिले, बस उतना काम करो।
यदि कोई अपने संस्थान को बेहतर बनाना चाहता है और उसके लिए थोड़े एक्स्ट्रा एफर्ट्स लगाता है तो दुनिया उसे बेवक़ूफ़ समझती है और क्यों न समझे ? ये हमारे देश की रीत है जिसका पालन हम सबको बख़ूबी करना आना चाहिए।
बात रही दोस्ती की तो हमारी ख़ुशनसीबी है कि अगर कोई दोस्त हमारा सहकर्मी बन जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो हमें गहराई से जानता है, उसके साथ किसी भी चीज़ के लिए सामंजस्य बिठाना दुर्लभ नहीं होता। एक-दूसरे की सूझ-बूझ और समझ से दफ़्तर में दिन आसानी से गुज़र जाता है। यही नफ़ा होता है एक दोस्त के सहकर्मी हो जाने का।
सहकर्मियों के साथ का रिश्ता अक्सर "हाय-हेल्लो" तक सीमित रहता है। बहुत ज़्यादा हुआ तो इंसानियत का, बस। एक-आद से अगर हमारे सोच-विचार या हमारा बैकग्राउंड मिलता हो तो उनसे कुछ छुट-पुट बातें हो जाती हैं। कभी-कभी थोड़ा बहुत पर्सनल भी सही।
शायद इतना ही सहकर्मियों का दायरा होता है। बातों और जज़बातों की अगर किसी से ज़्यादा साझेदारी होने लगती है तो ये एक मसला बन सकता है जिसका हल शायद मुमकिन नहीं। जैसे-जैसे वक़्त बीतेगा, हमें ये महसूस होना शुरू होता जाएगा कि हम किसी जंजाल में फँसते, ऊलझते जा रहे हैं।
एक बड़े से संस्थान में हम हर शख़्स को दोस्त का दर्जा नहीं दे सकते, संभव ही नहीं है। जीवन में दोस्त बहुत अज़ीज़ होते हैं। हर दूसरे-तीसरे शख़्स को 'दोस्त' कहकर इस शब्द की तौहीन करना भी मुनासिब नहीं है।
बहरहाल, इसमें कोई शक़ नहीं कि दफ़्तर हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा है, मगर हमारी ज़िन्दगी नहीं। और रही बात दोस्त की, तो फिर उसी दफ्तर में एक सच्चे दोस्त का साथ होना ही हमारी ज़िन्दगी है। हालात अच्छे हों या बुरे, उसके सदा साथ होने का यक़ीन हमें ज़िंदा रखता है ।




