Saturday, 19 April 2014

बदलता वैशाली


एक दिन अचानक वैशाली मेट्रो स्टेशन से एग्जिट लेते वक़्त मन किया कुछ तसवीरें लेने का, ले लीं।  मेरा अनुभव कहता है कि पिछले कुछ सालों में यह शहर क़ाफी बदल गया है। मेरा फ़ोन ज्यादा हाई- फाई तो नहीं है मगर फिर भी आप कोशिश कीजियेगा यह देखने की कि कितना बदला है वैशाली।

पहली तस्वीर वैशाली से मोहन नगर आने वाले ऑटो की है। फोटो लेने से खुद को रोक पाना मुश्किल था। क्योंकि ऑटो चल रहा था इसलिए फोटो साफ़ नहीं है।  इन दो लाइनों में निम्नलिखित शब्द लिखे हैं-
                       
                                               हँस मत पगली प्यार हो जाएगा,
                                    कृपया खुले पैसे दें वरना 10 का नोट पूरा हो जाएगा।

सारी दुनिया के कवि एक तरफ , ऑटो वालों की शायरी एक तरफ।  इनका किसी से भी मुक़ाबला करना मुश्किल है। बाक़ी आप देखते रहिये।















Friday, 11 April 2014

यादें......!!!!!!!!

मात्र सात दिन हुए थे उस न्यूज़रूम से रूबरू हुए, और एक पल में ही साथ छूट गया। आज ही तो कुछ चीज़ें समझ आने लगी थीं, रास्ते अपने से लगने लगे थे।  उस "औरा" से जान-पहचान सी होने लगी थी। पर मालूम नहीं था कि  इतनी जल्दी इतना कुछ हो जायेगा। जो आइडेंटिटी कार्ड इतनी मशक्कतों के बाद कल मिला था वो आज वापिस भी हो गया।  लगा कि आया ही क्यों वो हाथ में जब वापिस ही जाना था।  ख़ैर अब जो हो गया वो ठीक ही हुआ होगा शायद।

आगे एक नयी ज़िन्दगी है।   हो सकता है कि फिर कहीं आगे आने वाली ज़िन्दगी में यादें सिर्फ यादें ना रहें ।   










Thursday, 10 April 2014

हिंदुस्तान का वोटर.......

हिंदुस्तान की राजनीति की तरह उसका वोटर भी बड़ा अजीब है। जहाँ मतदान के दिन कुछ लोग वोट डालने के लिए अति इच्छुक होते हैं, वहीँ कुछ ऐसे भी हैं  जो अपना मत नहीं देते या देना नहीं चाहते। और इसके अनेकों कारण हैं।  कुछ सुबह सोकर नहीं उठ पाते, कुछ बीमार होते हैं, किसी का एक्सिडेंट हो गया होता है, कोई पहले से अस्पताल में एडमिट होता है, कोई वोट देना नहीं चाहता क्यूंकि उसे राजनीती में दिलचस्पी नहीं है। कोई कहता है की "कौन  इतनी दूर जाये वोट डालने", किसी को जल्दी ऑफिस पहुंचना है (अगर बदक़िस्मती से छुट्टी नहीं है तो) और वापिस कब आना है मालूम  नहीं। आजकल हर कोई बहुत व्यस्त है। और  कुछ तो ऐसे भी हैं जिनके पास अपना वोटर आई डी नहीं है, किसी ने अपना आई डी बनवाया ही नहीं है।  ऐसी स्थिती मैं मतदान प्रतिशत कैसे बढ़ेगा बताइये मगर फिर भी बढ़ जाता है (भगवान जाने कैसे)।

ख़ैर, इन्ही वोटरों में कुछ ऐसे भी हैं जो बड़ी बेसब्री से इस दिन का इंतज़ार करते हैं।  सुबह - सुबह  इनका सबसे पहला काम मतदान का ही होता है।  कदम बढ़ाये पोलिंग बूथ की ओर जाते हैं और पहुँचने के बाद पता चलता है कि वोटिंग लिस्ट में नाम ही नहीं है। अलग-अलग वार्ड के पर्चे बिखरे पड़े रहते हैं और वोटर पोलिंग बूथ पे पहुँच कर सीधा वोट करने की बजाये उन पर्चों में अपना नाम ढूंढ रहा होता है।  बड़ी मशक्कत के बाद यदि उस लिस्ट में अपना नाम मिल जाये तो वोटर अपना वोट देकर ख़ुशी-ख़ुशी घर वापिस चला जाता है, और अगर वो मतदान नहीं कर पाता तो सिस्टम को कोसता हुआ लौट आता है। 

चुनाव की खातिर ऑफिस, कॉलेज और स्कूल भी बंद रहते हैं।  कायदे से सभी को इस छुट्टी का फायदा उठाकर वोट डालने जाना चाहिए मगर ऐसा होता है क्या? सड़कें खाली नज़र आती हैं, ट्रैफिक नहीं होता। लगता है मानो हर रोज़ एक ही रास्ते से दफ्तर या कॉलेज जाने वाले आज स्पेशली वोट डालने के लिए छुट्टी किये बैठे हैं।  हमारा यूथ जो सबसे ज़्यादा जागरूक है (ऐसा माना जाता है), बदलाव के लिए अग्रसर है।

(खाली सड़कें)


              (लिस्ट में नाम ढूंढते वोटर) 



(खुद ही अपने नाम की पर्ची काटते वोटर) 
















जानेंगे 16 मई को, क्या किया है हिंदुस्तान के वोटर ने।  बाक़ी आप तो समझदार हैं ही।  

Sunday, 6 April 2014

बौखलायीं मोहतरमा

टीवी में दिखने वाली टीवी की दुनिया को क़रीब से देखा, एक चैनल के न्यूज़रूम  का दीदार किया। कमरे में पहला कदम रखते ही नज़र दौड़ी सामने डेस्क पर रखे 100 कंप्यूटर सिस्टम्स की ओर, जिन पर काम करते लोग इतने व्यस्थ थे कि अपने साथ खड़े - बैठे लोगों की ओर देखने तक की फुरसत नहीं। एक मोहतरमा से बात हुई तो वो  पगलाई सी झल्लाकर कुछ बोलीं। जो भी उन्होंने कहा वो यहाँ लिखना तो असम्भव है, मगर कोई बात नहीं।  ठीक है मैडम हम आपकी फृस्त्रशन समझते हैं। चैंनलों  में यही होता है। जो होता है, वो दिखता  नहीं, लेकिन जो दिखता है वो कहीं ना कहीं घटता ज़रूर है।

एक सज्जन से कुछ दिन पहले मुलाक़ात हुई थी।  उम्र में काफी बड़े हैं। पहली मीटिंग में ही नंबर एक्सचेंज हो गए।  लगभग हर रोज़ बात भी होने लगी।  एक दिन बातों बातों में वो अचानक बोले - "बीइंग अ सीनियर आई कांट बी राईट ऑल द टाइम।  आई हैव सीनियर्स हू वर नेवर रेडी टू कॉन्फेस देयर फुलिशनेस।" आप सही थे सर।  सीनियर हैं तो क्या ग़लती नहीं कर सकते?  हैं तो आखिर इंसान ही।

ख़ैर अब मोहतरमा से क्या शिकायत  करना।  उनके भी अपने अनुभव हैं।  पर एक बात अब तक समझ नहीं आयी कि बौखलाने की वजह क्या वो एक सवाल था या वो उनके अपने अनुभव ही हैं जो उन्हें अब तक कलपने पर मजबूर कर रहे हैं ? इसका जवाब पता नहीं किसके पास है लेकिन ईशवर से यही प्रार्थना है कि वो उनकी फृस्ट्रटेड आत्मा को शान्ति दे।