Monday, 30 October 2017

प्यार

प्यार - एक छोटा-सा शब्द जो इंसान के जीवन की नींव है। इस शब्द के कई प्रकार हैं, ये आप लोगों के लिए कोई नयी बात नहीं होगी। सबसे पहले आता है माँ-बाप का प्यार, फिर भाई-बहन का, दोस्तों का, गुरु का, रिश्तेदारों का और जीवन में आने वाले न जाने किन-किन लोगों का। इन सबके अलावा एक और प्यार होता है जिसे हम तहज़ीब की भाषा में "इश्क़" कहते हैं। इससे भी आप सभी परिचित ही होंगे।

मगर आजकल के जिस दौर में हम 'इंसान' जी रहे हैं, उसमें इस प्यार के कुछ नए, अपग्रेडेड और इनोवेटिव रूप जुड़ गए हैं। उदाहरण के लिए सोशल मीडिया का प्यार, अपने मुंह मियाँ मिट्ठू प्यार, फॉर्मल्टी वाला प्यार, जिस्मानी प्यार, दिखावे वाला प्यार और सबसे दिलचस्प "हम तुमसे बहुत प्यार करते हैं" वाला प्यार।

ख़ुदा ने इस जहाँ में कुछ ऐसी शख़्सियतें भी बनायीं हैं जो जब भी किसी से प्यार करती हैं तो दुनिया भुला देती हैं। ये प्यार की वो श्रेणी है जिसमें प्यार का छल, कपट या स्वार्थ से किसी भी तरह का कोई भी वासता नहीं होता। उनके लिए प्यार सिर्फ प्यार होता है। दे आर सेल्फलेस सोल्स जिनके लिए प्यार का मतलब सिर्फ अपनों को ख़ुश देखना होता है। किसी को दिल से प्यार करने की इस पूरी प्रक्रिया में अगर कोई उनको "फॉर ग्रांटेड" भी ले ले तो भी उन्हें कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि वो साहसी होते हैं, कपट की घिनौनी दुनिया से बहुत ही दूर।

आज का ये दौर जहाँ अक्सर रिश्तों में प्यार सिर्फ़ अपना उल्लू सीधा करने तक सीमित रह गया है, या जहाँ इश्क़ की परिभाषा फ़्लर्टिंग में सिमट गई है -- यहाँ कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इस सबसे परे हटकर प्यार जताना जानते हैं, अपनापन साबित करना जानते हैं, ये यक़ीन दिलाना जानते हैं कि उनके लिए प्यार सिर्फ़ प्यार है न कि किसी के कंधे पर बन्दूक रख कर अपने स्वार्थों को पूरा करने का कोई ज़रिया।

"हम तुमसे बहुत प्यार करते हैं" वाले लोगों के लिए ये प्यार महज़ दूसरों का मज़ाक बनाने और अपना एंटरटेनमेंट करने का एक तरीक़ा होता है। उन्हें इस प्यार पर अट्टाहस करने की इस क़दर आदत हो जाती है कि वो भूल जाते हैं कि एक इंसान के जीवन में सच्चा महत्त्व रखने वाले इस ढाई अक्षर के शब्द की बेक़दरी करने में उन्हें सिर्फ़ ढाई मिनट लगे हैं।

किसी और के कन्धों का सहारा लेने वाले बुज़दिल होते हैं। जो साहसी होते हैं वो अपनी बात कहने का दम ख़ुद रखते हैं। अफ़सोस कि निशाना भी उन्हीं कन्धों को बनाया जाता है जिनमें बग़ावत करने का हौंसला होता है। क्योंकि जो बाग़ी होते हैं, वही सच्ची मोहब्बत करते हैं।

टेक्नोलॉजी और बिना अक्ल के की जाने वाली नकल ने भी प्यार शब्द की धज्जियां उड़ाने में क़ाफी योगदान दिया है। सोशल नेटवर्किंग, दिन-रात की चैटिंग, ऑनलाइन डेटिंग, सेक्सटिंग एंड मच मोर -- इन सब प्यार के दिखावों में लोग असली जज़्बातों को महसूस करना तो अक़्सर भूल ही जाते हैं।

दिल से इश्क़ करने वाले समझते हैं कि सामने वाले के प्यार में कितनी शिद्दत है, पर उस सामने वाले के जज़्बातों में समानता का क्या स्तर है, ये आभासी दुनिया कभी नहीं बता सकती।

प्यार को मज़ाक समझने वाले, उसे बेज़ार करने वाले काफ़ी हद तक सफल लोग हैं। उनकी उपलब्धि और ख़ुशनसीबी है कि उनकी वजह से ही दिखावे वाला प्यार आजकल हैशटैग के साथ धड़ल्ले से ट्रेंड कर रहा है।

इस प्यार को अब ट्रोल कराने की ज़रूरत है और इसकोट्रोल सिर्फ़ वही करा सकते हैं जो हक़ीक़त में भी मोहब्बत को बिना किसी विशेष टैग के सिर्फ मोहब्बत ही समझते हैं और उसे साफ़ नीयत से जताना, निभाना और अपना बनाना जानते हैं।

दौर चाहें जो भी हो, ये याद रखा जाना चाहिए कि जब किसी साफ़ मन शख़्सियत के प्यार को बिना वजह ग़लत वजह के लिए 'इस्तेमाल' किया जाता है तो उसके प्यार को नफ़रत बनने में केवल एक लम्हा लगता है। और जब कोई बेइंतेहा मोहब्बत करने वाला नफ़रत करता है तो उसका असर दिलों में शरीर को धीरे-धीरे मार देने वाले ज़हर से भी बत्तर होता है।


Monday, 3 July 2017

बीफ़, भड़ास, ईद और जुनैद

अभी बीस साल का भी नहीं हुआ था वो जिसे बीस लोगों ने मिलकर मार दिया और मीडिया की ख़बरों के मुताबिक़ लगभग दो सौ लोग उसके साथ हुए इस दर्दनाक हादसे को देख नहीं पाए। वही लोग जो असावती रेलवे स्टेशन पर खड़े हुए थे या जो उसी ट्रेन में सवार थे जिसमें पंद्रह साल के जुनैद को पीट-पीट कर उसके प्राण निकाल लिए गए।

खून से लथपथ उसकी लाश उसके बड़े भाई के पैरों पर पड़ी थी जिसके आगे कई लोग झुंड लगाए खड़े थे मगर कितने साहसी थे सब -- पत्थर से मज़बूत और कठोर दिल वाले -- कि ये दृश्य देखकर किसी का भी दिल नहीं पसीजा।  

जुनैद ने दिल्ली सरकार में काम करने वाले पचास साल के एक बुज़ुर्ग को शायद ट्रैन में सीट देने से मना कर दिया था। बेचारा ईद की शॉपिंग करते-करते थक गया होगा इसलिए ट्रेन में सीट मिलने पर बैठा होगा। ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा होगा कि घर जाकर अपनी अम्मी को वो सारी चीज़ें दिखाएगा जो उसने खरीदी थीं। मगर उसे क्या पता था कि ये उसके जीवन की आख़िरी शॉपिंग है। 

हमारे देश में लोकल ट्रेनों का हाल बहुत अच्छा नहीं है। हर दिन भीड़ ख़ुद को किसी सीमेंट के बोरे-सा ट्रेनों में धकेलती है। ऐसे में कोई कैसे सीट मिलने की उम्मीद भी कर सकता है? 

शायद अंकल जी को नहीं पता होगा कि जुनैद कितना थका है या नहीं थका है। वो शायद अपनी नौकरी  से इतना थक और चिढ़ कर आये थे कि कई सालों का गुस्सा उस मासूम पर निकाल दिया। अपने साथ कुछ और लोगों को भी मौक़ा दिया कि वे भी अपनी भड़ास निकाल सकें। बाक़ी रहा-बचा काम बीफ़ ने कर दिया। ये कहा गया कि उसके बैग में बीफ़ है, वह मुसलमान है। बस इतना कहना ही काफ़ी था लोगों के दिमाग़ में हैशटैग ट्रेंड करने वाली बीफ़ से जुड़ी ख़बरों को हवा देने के लिए और फिर तो उस तूफ़ान ने एक जान ले ही ली। 

मारने वालों की भीड़ में शामिल एक बेहद समझदार शख़्स ने कहा, "मुझे नहीं मालूम क्या हुआ था। मैं शराब के नशे में था। सबने कहा मारो तो मैंने मारना शुरू कर दिया।"

मालूम होता है कि कुछ हिन्दुओं के लिए बीफ़ हऊआ-सा हो गया है। जहाँ नाम सुना नहीं, चिल्लाने लगते हैं -- कभी डर से तो कभी ग़ुस्से से। सामने वाले के पास बीफ़ है या नहीं, कोई इसकी जाँच नहीं करता। जब पीटने का काम वे कर सकते हैं तो जाँचने का क्यों नहीं? वैसे भी कौन-सी माँ (गौ माता) का प्यार नफ़रत सिखाता है?

डेली ओ में नामी पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक लेख में जुनैद के अब्बा जल्लालुद्दीन के साथ हुई बात का ज़िक्र किया है। बात क्या, उन्होंने असल में उनका इंटरव्यू ही किया है। 

जल्लालुद्दीन ने राजदीप को बताया, "इतना ग़ुस्सा सीट को लेकर नहीं होता सर। वो मेरे बेटे को एंटी-नेशनल कह रहे थे, उसकी टोपी और कपड़े को लेकर गाली दे रहे थे।"

उन्होंने सवाल किया, "वो हमसे इतनी नफ़रत क्यों करते हैं सर कि हमें महज़ धर्म के नाम पर जान से मार देते हैं?"

"मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना," इस पंक्ति से शायद सभी वाक़िफ़ होंगे, फिर भी इतनी नफ़रत किसलिए? माना कि हर धर्म में कुछ कट्टरवादी लोग होते हैं मगर कौन-सा धर्म ऐसा होगा  जो इंसानियत भुलाना सिखा दे? अगर इस इतने बड़े जहाँ में कहीं भी ऐसा कोई धर्म है तो मुझे उसे जानना है, पढ़ना है, समझना है। यक़ीनन अगर उन सभी मारने वालों में से एक के जिग़र में भी इंसानियत होती तो जुनैद आज ज़िन्दा होता। 

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार जुनैद इमाम बनने की इच्छा रखता था। वो मदरसे में पढ़ता था और दो महीनों के लिए जब भी घर आता था तो बड़ी शिद्दत से क़ुरआन की आयतें पढ़कर सबको सुनाता था। "शायद वो अल्लाह का बंदा था। क्या पता इसीलिए अल्लाह ने ईद के मुबारक़ मौक़े पर ही उसे अपने पास बुला लिया।" क्या ये वाक्य उसकी अम्मी को ताउम्र दिलासा दे सकेगा?

पीएस - अख़लाक़ से लेकर जुनैद तक हालात सिर्फ़ बद्तर हुए हैं। देश में भले ही सरकारें बदल जाएँ, कुछ हालात शायद कभी नहीं बदलेंगे। लेकिन आवाम को ये समझ लेना चाहिए कि महज़ झुंड बनाकर किसी को पीट देने से या उसकी जान ले लेने से अच्छाई की दिशा में कुछ भी हासिल नहीं होगा।

Thursday, 23 March 2017

यूपी में प्यार करना मना है....

आज की ताज़ा ख़बर सुनी तुमने?
क्या है? तुम ही बता दो। 
यूपी में प्यार करना मना है। 
क्या? ये कैसी ख़बर है? तुम पागल हो गए हो क्या?
अरे पगली! प्रदेश के नए मुख्यमंत्री ने आदेश दिए हैं, एंटी-रोमियो स्क्वाड बनाया है। सब तुम्हारी सुरक्षा के लिए.......  
तुम्हारे साथ होना उस स्क्वाड के होने से ज़्यादा महफ़ूज़ है। 
हाँ, दोस्तों के साथ तो हम अकसर महफ़ूज़ होते हैं। 
तो अब नॉएडा और ग़ाज़ियाबाद के मॉलों में प्रेमी एक-दूजे का हाथ थामकर चलते नज़र नही आयेंगे? मोहब्बत का इज़हार सिर्फ कनॉट प्लेस की सड़कों पर या गुडगाँव के मॉलों में ही कर पायेंगे?
इश्क़ अकसर जाति के कारण पिछड़ जाता है...... 
क्या मतलब है तुम्हारा?
जब कोई पिछड़ी जाति का लड़का किसी ऊँची जाति की लड़की से मोहब्बत कर बैठे तो अपने दिल की बात कह कहाँ पाता है? 
शायद रस्मों और रिवाज़ों को मोहब्बत से ऊपर रखना ही हिंदुत्व है। मग़र मोहब्बत तो हर जाति के लोग ही करते हैं न......  
क्या तुमने कभी किसी से इश्क़ किया है?
काश किया होता; क्योंकि अब तो यूपी में प्यार करना मना है।  

फ़ोटो  क्रेडिट : पिनटेरेस्ट 



Sunday, 12 March 2017

होलिकोत्सव: यूपी पर चढ़ा मोदी का भगवा रंग

देशभर और मीडिया जगत में पाँच राज्यों (मणिपुर, गोवा, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश) में हुए चुनाव के नतीजों को जानने की उत्सुकता बरक़रार थी, मग़र सबसे ज़्यादा नज़रें यूपी की ओर गड़ी हुईं थीं। आख़िरकार 11 मार्च को इंतज़ार ख़त्म हुआ और चुनाव के सबसे दिलचस्प नतीजे उत्तर प्रदेश में ही देखने को मिले। एक राज्य जिसका अपना अलग ही महत्त्व है, इस चुनाव में तीन-चौथाई से भी ज़्यादा बहुमत (बीजेपी- 325 सीटें) हासिल कर भगवा रंग में रंग चुका है।

अफ़सोस कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी के इस भगवा रंग के आगे अखिलेश की साइकिल की चमक और मायावती के हाथी का नीला रंग फ़ीका पड़ गया है। और शायद नतीजे की एक रात पहले ही उत्तर प्रदेश में हुई बारिश में कांग्रेस के झंडे के भी सब रंग धुल गए।

लखनऊ, बनारस, मथुरा, आगरा, कानपुर और इलाहाबाद जैसे महत्त्वपूर्ण शहरों का प्रतिनिधित्व करता उत्तर प्रदेश इस चुनाव में बीजेपी के लिए बेहद ज़रूरी था जिसके लिए मोदी-मोदी करता मीडिया भी पार्टी के लिए विशेष रूप से सहायक साबित हुआ।

जिस तरह 2014 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक बयार में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी शुमार थे, उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में एक-के-बाद-एक रैलियाँ आयोजित कर जनता के सामने लाकर चुनाव जीतने की भरपूर कोशिश की गई जो पूर्णतया सफल हुई।

इसके अतिरिक्त चाय पे चर्चा, मन की बात, स्मार्ट सिटीज़, एंटी-रोमियो स्क्वाड और बहुत-सी फलाना-ढिमका रणनीतियों ने यूपी वासियों को बीजेपी की ओर लुभाया।

बीजेपी की जीत का बारीक़ी से विशलेषण किया जाए तो शाहरुख़ ख़ान की फिल्म "ॐ शांति ॐ" का ये डायलॉग इस पर बिलकुल सटीक बैठता है- "इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हें पाने की कोशिश की है, कि हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है।"

पंद्रह साल में कितनी बार चुनाव आये होंगे मग़र हर बार हार का सामना करना आसान नहीं रहा होगा। दलितों की मुखिया (मायवती) और यादवों के अगुवा (मुलायम सिंह यादव) के आगे भाजपा के हिंदुत्व वाले तर्क़ और जुमले मानो लोगों के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगने देते होंगे। 

बीजेपी की जीत के स्तर को देखकर महसूस होता है कि 15 साल पार्टी द्वारा बड़ी ही शिद्दत से मुद्दों पर पकड़ बनायी गई है और फिर चुनावी रैलियों में उनका ज़िक्र किया गया है। 

प्रदेश की रैलियों में अयोध्या का राम मंदिर इस बार चर्चा में कम रहा। इसके साथ ही मुस्लिम वोट बैंक का विशेष ध्यान रखा गया जो शायद बीजेपी के रवैये में एक बड़ा बदलाव रहा । फोकस को हिंदुओं से हटाकर ट्रिपल तलाक़ (जिसे हटाने की बात की गयी) की मदद से थोड़ा मुस्लिम महिलाओं की ओर शिफ्ट किया गया। इसके अलावा काले धन को ख़त्म करने के लिए नोटबंदी (एक ऐसा फैसला जिसे  बुक गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज कराया जा सकता है) जनता के सिर चढ़कर बोली। हालाँकि विरोधी दलों ने इसे सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर मिडिल क्लास, गरीबों और किसानों को वोट बैंक बनाने की भरपूर कोशिश की, मग़र अफ़सोस!

क्या कारण रहा होगा कि भारतीय जनता पार्टी ने इस स्तर पर जीत प्राप्त की ?

समाजवादी पार्टी में बाप (मुलायम सिंह यादव) - बेटे (अखिलेश यादव) के बीच की दरार, नोटबंदी के बाद बसपा के खाते में जमा 104 करोड़ रुपये (जिसकी बहन जी द्वारा दी गई कोई सफाई जनता के गले नहीं उतरी), कांग्रेस - सपा का बेजान गठजोड़, यूपी के लड़कों की जनता को कतई ना प्रभावित कर पाने वाली प्रेस वार्ताएं, या पंद्रह साल से बार-बार उसी साइकिल और हाथी की सवारी से बोरियत?

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि दरअसल ये बीजेपी की जीत नहीं बल्कि सपा, बसपा और कांग्रेस की हार है। नतीजों का केंद्र-बिंदु एक दल की जीत से ज़्यादा बाक़ी तीनों दलों की मात है। यूपी के लड़कों के ऊल-जुलूल बयानों ने मोदी की जीत में उत्प्रेरक का काम किया। मग़र दुःख की बात है कि गुजरात के गधों ने उप के हाथी को पस्त और साइकिल को पंक्चर कर दिया है।  

नतीजों को पचा न पाने पर मायावती का ये कहना है कि पोलिंग के लिए इस्तेमाल की गई ईवीएम मशीनें ख़राब थीं। वो गारंटी दे रहीं हैं कि अगर दोबारा चुनाव कराये जाएँ तो इस सत्ता का तख़्तापलट हो जाएगा।

यहाँ तक कि डेली ओ  के एक लेख के अनुसार बीजेपी के ही एक लोकप्रिय एमपी श्री सुब्रमण्‍यन स्वामी का भी ये आरोप है कि मतदान के लिए इस्तेमाल हुई ईवीएम मशीनों में हेरफ़ेर था। लेख में इस बात का भी ज़िक्र है कि कैसे ईवीएम मशीनों में इस्तेमाल किये जाने वाले सॉफ्टवेयर को डिलीट कर या मतों को अपने हिसाब से एडजस्ट कर नतीजों को प्रभावित किया जा सकता है।

कम -से कम ये सुनकर ही बहनजी को कुछ तो तसल्ली हुई होगी। नतीजों के बाद उनका ये भी कहना है कि अमेरिका जैसे विकसित देश में भी ईवीएम मशीनों में ख़राबी पाए जाने के बाद चुनावों के लिए बैलट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है।

शायद मायावती भूल गयी हैं कि कितने लोगों ने तो मोदी जी को 'डिजिटल इंडिया' बनने की उम्मीद में वोट दिए होंगे। मोदी जी का मॉडर्निज़्म मायावती नाकार कैसे सकतीं हैं?

ख़ैर, अब तो सब कुछ हो चुका- मतदान भी और हार-जीत का फ़ैसला भी।

होली का उत्सव है। गिले - शिक़वे भूलकर पांच सौ और दो हज़ार के नए रंगीन नोटों के साथ होली मनाइये। फिर ऐसी होली क्या पता कब नसीब हो।

बाक़ी उम्मीद है कि 2019 तक यूपी का भगवा रंग फ़ीका नहीं होगा। वरना ये पब्लिक है, जो अगर 2017 में नहीं जान पायी, तो 2019 तक तो ज़रूर जान लेगी।

हैप्पी होली विध हिस्टॉरिक विक्ट्री टू मोदी जी !

फोटो क्रेडिट: हफ्फिंगटन पोस्ट

कंट्रीब्यूटेड टू : "समयधारा पोर्टल"

Monday, 6 March 2017

बहाना

अक्सर सुना है कि नए साल की शुरुआत में उन लोगों से मुलाक़ात कर लेनी चाहिए जो हमें अज़ीज़ हैं। इसी ख़याल का एक वर्णन।

"कल मिलते हैं।"
"नहीं।"

"क्यों?"
"मुझे नहीं मिलना तुमसे।"

"मग़र क्यों?"
"बस, ऐसे ही।"

"जब से साल चढ़ा है, तुमने मिलने की ज़िद्द लगाई हुई है।"
"ज़िद्द लगायी हुई 'थी' । आधा साल गुज़र गया है।"

"मैं तो अब भी पिछले साल की आख़िरी मुलाक़ात की याद में मशगूल हूँ।"
तो अब मिलने का क्या फायदा?

"क्यों?"
"मिलकर भी तो हमें जुदा ही रहना है।

मगर यही जुदाई तो तुमसे बार-बार मिलने का बहाना है।"
कब तक बहाने बनाओगे?

"जब तक बनते रहेंगे।"
"बहाने या हालात?"

हालात बहाना बन जाते थे कि मिलने की चाहत होते हुए भी दोनों ना मिलें।  

Sunday, 5 February 2017

तूबा... !!

दिसम्बर माह का बेहद ठंडा दिन था। सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था। पोस्ट ग्रेजुएशन के कोर्स का तीसरा एग्जाम पेपर लिखने जाना था। पढ़ा तो काफ़ी था मग़र फिर भी जाने की इच्छा नहीं हो रही थी।

उस दिन अकेले ही कॉलेज जाना था। इकलौता पेपर था जो अकेले लिखना था अपने दोस्त के बिना। उसका एग्जाम दो दिन पहले ही हो गया था क्योंकि उसने एक विषय मुझसे अलग जो ले लिया था।

अब किसी तरह घर से निकलना तो था ही, सो निकल गए, बस भी पकड़ ली। दिमाग में कई विचार दौड़ रहे थे। पेपर लिखने की जगह कोई कविता लिख देने का मन था कि चित शांत हो जाए।

शाहदरा की और ले जाने वाले फ्लाईओवर पर काफ़ी जाम लगा हुआ था। बस की खिड़की से बाहर झाँक कर देखने की कोशिश की तो मालूम हुआ कि फ्लाईओवर से एक शख़्स नीचे गिर गया है। लोगों ने उसे महज़ देखने की ख़ातिर अपनी गाड़ियों को बीच सड़क पर ही खड़ा कर दिया था जिस वजह से यातायात जाम हो गया था।

अच्छा ही किया था उन लोगों ने वरना कभी पता नहीं चलता कि हुआ क्या था। हमारे देश में ऐसा अगर ना हो तो हम सब भारतीय नागरिक कैसे कहलायेंगे?

दिल में हलचल मची हुई थी। कुछ पल बीते, बस चली और आख़िरकार वक़्त पर कॉलेज पहुँचा गया। एग्जाम हॉल में कदम पड़े, सीट तलाशी और तशरीफ़ टिकाई।

भागते-भागते मैं एग्जाम हॉल तक पहुँची। साँस फ़ूल गई थी और कलेजा मुँह को आ चुका था।

मेरे आगे वाली सीट पर एक लड़की बैठी हुई थी। उससे दोस्ती करने का मन हुआ। कुछ देर उसकी बॉडी-लैंग्वेज को निहारने के बाद महसूस हुआ कि शायद उसे दोस्त बनाया जा सकता है।

'हाय!' मैंने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा।

'हाय!' एक प्यारी-सी हँसी के साथ जवाब आया।

'क्या आप अगले तीन घंटों के लिए मेरी दोस्त बनना पसंद करेंगी?'  मैंने रिस्क लेते हुए पूछा।

'हाहाहा! हाँ ज़रूर।' उधर से जवाब आया।

'मुझे न ज़्यादा कुछ आता नहीं है, प्लीज़ हेल्प मी।' मैंने डरते हुए कहा।

'यार नोवेल्स तुम बता देना, थ्योरेटिकल मुझे आता है।' उसने कहा।

'हमारे कोर्स में नोवेल्स भी थे?' मेरी तो जैसे आँखें ही बाहर आ गई थीं ।

'यार तुम कमाल हो।' वो हँसते हुए बोली।

मुझ पर शायद नर्वसनेस कुछ ज़्यादा हावी हो गई थी ।

माहौल शांत करने के लिए मैंने उसका नाम पूछा।

"जी आपका नाम?"

कुछ बोलने की बजाय उसने मुझे अपना आई डी कार्ड दिखाया।

"तौ.. तू.. तौबा, नहीं....... तूबा"- मेरे मुँह से निकला।

"वाह! क्या लाजवाब नाम है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

"जी शुक्रिया। " उसने कहा।

"तूबा का क्या मतलब होता है?" मैंने फिर पूछा।

"जन्नत का सबसे बड़ा पेड़।" बाहें फैलाकर विस्तार देते हुए उसने बताया। काफ़ी ख़ुश मालूम होती थी।

अचानक इनविजिलेटर ने आंसर शीट हमारी डेस्क्स पर रख दी थीं। हमने अपनी डिटेल्स भरना शुरू किया। दो मिनट बाद प्रश्न पत्र भी हमारे डेस्कस पर मौजूद था।

नज़रें उस पेपर की ओर जैसे घूमना ही नहीं चाहती थीं। फ़िर भी किसी तरह हिम्मत कर सभी प्रश्नों को देखा, लगा कि कुछ तो आता ही है। सुकून महसूस हुआ। अच्छा लगा।

लिखना शुरू किया तो शुरुआत के दो घण्टे कब बीत गए पता ही नहीं चला। सहसा तूबा ने मेरे डेस्क पर एक टॉफ़ी रख दी। छिल्के को देख कर लगा शायद ये कोई नारियल फ्लेवर वाली टॉफ़ी है।

मन में सवाल ये आया कि आखिर उसने मुझे ये टॉफ़ी दी क्यों? उसे प्रश्न का उत्तर हल करने में थोड़ी सी मदद कर दी थी, क्या इसलिए?

जब लगा की मामला उलझ रहा है तो सोचा की चलो पेपर में ध्यान लगाते हैं। एक टॉफ़ी ही तो है, खा लेंगे।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिर लिखना शुरू किया और आख़िरी एक घंटा पूरा होने के महज़ दो मिनट पहले मैं अपना पेपर लिख चुकी थी।

उठकर जाने लगी तो लगा कि उस टॉफी के लिए एक शुक्रिया तो कह देना चाहिए। मगर वो अपना पेपर लिखने में पूरी तरह व्यस्त थी। मुझे जाने की जल्दी थी। मैं बिना कुछ कहे चली गई। सोचा कि अभी तो और भी इम्तेहान बाक़ी हैं। फिर मुलाक़ात होगी।

और वैसे भी उससे मुझे कहना ही क्या था? सिर्फ इतना कि "इट वाज़ नाइस मीटिंग यू तूबा। थैंक्स फॉर द टॉफ़ी।"