Friday, 30 May 2014

आज दिन कुछ मेहरबान था

आज दिन कुछ मेहरबान था,
ख़ुशियों का जैसे मुझ पर कोई एहसान था।
इन्हें समेट लूँ मैं अपनी आग़ोश में,,
कहीं हो न जाऊं इसी पल मधहोश मैं।।

न जाने कैसा हँसी का सैलाब है,
मुझे जीवन अपना लगता कोई ख़्वाब है।
हक़ीक़त इतनी हँसीं होगी मैंने सोचा न था,,
सपनों से भी ये सवाल कभी पूंछा न था।।

पर सपनों से भी ख़ूबसूरत ये हक़ीक़त मुझको लगती है,
क्यों कहते हैं वो कि ये अक्सर हमको ठगती है।
कुछ तो है जो ख़ुदा ने सिर्फ मुझे नवाज़ा है,,
क़िस्मतों को रचने वाला वही तो एक राजा है। .

इन दोस्तों का साथ ही अब मेरी मुस्कान है,
इनकी दुआओं में बस्ती मेरी जान है।
ख़्वाहिश है बस इतनी कि ये हर पल पास रहे ,,
दिल के क़रीब और एहसासों में ख़ास रहें। .

क्या जाने ये क़िस्मत कहाँ ले जायेगी,
उम्मीद है कि ये अभी और भी खुशियाँ लाएगी।
यूँही इन उम्मीदों का सिलसिला चलता रहे,
और आशाओं भरा हर सपना इन आँखों में पलता रहे। .




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