Thursday, 23 March 2017

यूपी में प्यार करना मना है....

आज की ताज़ा ख़बर सुनी तुमने?
क्या है? तुम ही बता दो। 
यूपी में प्यार करना मना है। 
क्या? ये कैसी ख़बर है? तुम पागल हो गए हो क्या?
अरे पगली! प्रदेश के नए मुख्यमंत्री ने आदेश दिए हैं, एंटी-रोमियो स्क्वाड बनाया है। सब तुम्हारी सुरक्षा के लिए.......  
तुम्हारे साथ होना उस स्क्वाड के होने से ज़्यादा महफ़ूज़ है। 
हाँ, दोस्तों के साथ तो हम अकसर महफ़ूज़ होते हैं। 
तो अब नॉएडा और ग़ाज़ियाबाद के मॉलों में प्रेमी एक-दूजे का हाथ थामकर चलते नज़र नही आयेंगे? मोहब्बत का इज़हार सिर्फ कनॉट प्लेस की सड़कों पर या गुडगाँव के मॉलों में ही कर पायेंगे?
इश्क़ अकसर जाति के कारण पिछड़ जाता है...... 
क्या मतलब है तुम्हारा?
जब कोई पिछड़ी जाति का लड़का किसी ऊँची जाति की लड़की से मोहब्बत कर बैठे तो अपने दिल की बात कह कहाँ पाता है? 
शायद रस्मों और रिवाज़ों को मोहब्बत से ऊपर रखना ही हिंदुत्व है। मग़र मोहब्बत तो हर जाति के लोग ही करते हैं न......  
क्या तुमने कभी किसी से इश्क़ किया है?
काश किया होता; क्योंकि अब तो यूपी में प्यार करना मना है।  

फ़ोटो  क्रेडिट : पिनटेरेस्ट 



Sunday, 12 March 2017

होलिकोत्सव: यूपी पर चढ़ा मोदी का भगवा रंग

देशभर और मीडिया जगत में पाँच राज्यों (मणिपुर, गोवा, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश) में हुए चुनाव के नतीजों को जानने की उत्सुकता बरक़रार थी, मग़र सबसे ज़्यादा नज़रें यूपी की ओर गड़ी हुईं थीं। आख़िरकार 11 मार्च को इंतज़ार ख़त्म हुआ और चुनाव के सबसे दिलचस्प नतीजे उत्तर प्रदेश में ही देखने को मिले। एक राज्य जिसका अपना अलग ही महत्त्व है, इस चुनाव में तीन-चौथाई से भी ज़्यादा बहुमत (बीजेपी- 325 सीटें) हासिल कर भगवा रंग में रंग चुका है।

अफ़सोस कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी के इस भगवा रंग के आगे अखिलेश की साइकिल की चमक और मायावती के हाथी का नीला रंग फ़ीका पड़ गया है। और शायद नतीजे की एक रात पहले ही उत्तर प्रदेश में हुई बारिश में कांग्रेस के झंडे के भी सब रंग धुल गए।

लखनऊ, बनारस, मथुरा, आगरा, कानपुर और इलाहाबाद जैसे महत्त्वपूर्ण शहरों का प्रतिनिधित्व करता उत्तर प्रदेश इस चुनाव में बीजेपी के लिए बेहद ज़रूरी था जिसके लिए मोदी-मोदी करता मीडिया भी पार्टी के लिए विशेष रूप से सहायक साबित हुआ।

जिस तरह 2014 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक बयार में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी शुमार थे, उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में एक-के-बाद-एक रैलियाँ आयोजित कर जनता के सामने लाकर चुनाव जीतने की भरपूर कोशिश की गई जो पूर्णतया सफल हुई।

इसके अतिरिक्त चाय पे चर्चा, मन की बात, स्मार्ट सिटीज़, एंटी-रोमियो स्क्वाड और बहुत-सी फलाना-ढिमका रणनीतियों ने यूपी वासियों को बीजेपी की ओर लुभाया।

बीजेपी की जीत का बारीक़ी से विशलेषण किया जाए तो शाहरुख़ ख़ान की फिल्म "ॐ शांति ॐ" का ये डायलॉग इस पर बिलकुल सटीक बैठता है- "इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हें पाने की कोशिश की है, कि हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है।"

पंद्रह साल में कितनी बार चुनाव आये होंगे मग़र हर बार हार का सामना करना आसान नहीं रहा होगा। दलितों की मुखिया (मायवती) और यादवों के अगुवा (मुलायम सिंह यादव) के आगे भाजपा के हिंदुत्व वाले तर्क़ और जुमले मानो लोगों के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगने देते होंगे। 

बीजेपी की जीत के स्तर को देखकर महसूस होता है कि 15 साल पार्टी द्वारा बड़ी ही शिद्दत से मुद्दों पर पकड़ बनायी गई है और फिर चुनावी रैलियों में उनका ज़िक्र किया गया है। 

प्रदेश की रैलियों में अयोध्या का राम मंदिर इस बार चर्चा में कम रहा। इसके साथ ही मुस्लिम वोट बैंक का विशेष ध्यान रखा गया जो शायद बीजेपी के रवैये में एक बड़ा बदलाव रहा । फोकस को हिंदुओं से हटाकर ट्रिपल तलाक़ (जिसे हटाने की बात की गयी) की मदद से थोड़ा मुस्लिम महिलाओं की ओर शिफ्ट किया गया। इसके अलावा काले धन को ख़त्म करने के लिए नोटबंदी (एक ऐसा फैसला जिसे  बुक गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज कराया जा सकता है) जनता के सिर चढ़कर बोली। हालाँकि विरोधी दलों ने इसे सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर मिडिल क्लास, गरीबों और किसानों को वोट बैंक बनाने की भरपूर कोशिश की, मग़र अफ़सोस!

क्या कारण रहा होगा कि भारतीय जनता पार्टी ने इस स्तर पर जीत प्राप्त की ?

समाजवादी पार्टी में बाप (मुलायम सिंह यादव) - बेटे (अखिलेश यादव) के बीच की दरार, नोटबंदी के बाद बसपा के खाते में जमा 104 करोड़ रुपये (जिसकी बहन जी द्वारा दी गई कोई सफाई जनता के गले नहीं उतरी), कांग्रेस - सपा का बेजान गठजोड़, यूपी के लड़कों की जनता को कतई ना प्रभावित कर पाने वाली प्रेस वार्ताएं, या पंद्रह साल से बार-बार उसी साइकिल और हाथी की सवारी से बोरियत?

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि दरअसल ये बीजेपी की जीत नहीं बल्कि सपा, बसपा और कांग्रेस की हार है। नतीजों का केंद्र-बिंदु एक दल की जीत से ज़्यादा बाक़ी तीनों दलों की मात है। यूपी के लड़कों के ऊल-जुलूल बयानों ने मोदी की जीत में उत्प्रेरक का काम किया। मग़र दुःख की बात है कि गुजरात के गधों ने उप के हाथी को पस्त और साइकिल को पंक्चर कर दिया है।  

नतीजों को पचा न पाने पर मायावती का ये कहना है कि पोलिंग के लिए इस्तेमाल की गई ईवीएम मशीनें ख़राब थीं। वो गारंटी दे रहीं हैं कि अगर दोबारा चुनाव कराये जाएँ तो इस सत्ता का तख़्तापलट हो जाएगा।

यहाँ तक कि डेली ओ  के एक लेख के अनुसार बीजेपी के ही एक लोकप्रिय एमपी श्री सुब्रमण्‍यन स्वामी का भी ये आरोप है कि मतदान के लिए इस्तेमाल हुई ईवीएम मशीनों में हेरफ़ेर था। लेख में इस बात का भी ज़िक्र है कि कैसे ईवीएम मशीनों में इस्तेमाल किये जाने वाले सॉफ्टवेयर को डिलीट कर या मतों को अपने हिसाब से एडजस्ट कर नतीजों को प्रभावित किया जा सकता है।

कम -से कम ये सुनकर ही बहनजी को कुछ तो तसल्ली हुई होगी। नतीजों के बाद उनका ये भी कहना है कि अमेरिका जैसे विकसित देश में भी ईवीएम मशीनों में ख़राबी पाए जाने के बाद चुनावों के लिए बैलट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है।

शायद मायावती भूल गयी हैं कि कितने लोगों ने तो मोदी जी को 'डिजिटल इंडिया' बनने की उम्मीद में वोट दिए होंगे। मोदी जी का मॉडर्निज़्म मायावती नाकार कैसे सकतीं हैं?

ख़ैर, अब तो सब कुछ हो चुका- मतदान भी और हार-जीत का फ़ैसला भी।

होली का उत्सव है। गिले - शिक़वे भूलकर पांच सौ और दो हज़ार के नए रंगीन नोटों के साथ होली मनाइये। फिर ऐसी होली क्या पता कब नसीब हो।

बाक़ी उम्मीद है कि 2019 तक यूपी का भगवा रंग फ़ीका नहीं होगा। वरना ये पब्लिक है, जो अगर 2017 में नहीं जान पायी, तो 2019 तक तो ज़रूर जान लेगी।

हैप्पी होली विध हिस्टॉरिक विक्ट्री टू मोदी जी !

फोटो क्रेडिट: हफ्फिंगटन पोस्ट

कंट्रीब्यूटेड टू : "समयधारा पोर्टल"

Monday, 6 March 2017

बहाना

अक्सर सुना है कि नए साल की शुरुआत में उन लोगों से मुलाक़ात कर लेनी चाहिए जो हमें अज़ीज़ हैं। इसी ख़याल का एक वर्णन।

"कल मिलते हैं।"
"नहीं।"

"क्यों?"
"मुझे नहीं मिलना तुमसे।"

"मग़र क्यों?"
"बस, ऐसे ही।"

"जब से साल चढ़ा है, तुमने मिलने की ज़िद्द लगाई हुई है।"
"ज़िद्द लगायी हुई 'थी' । आधा साल गुज़र गया है।"

"मैं तो अब भी पिछले साल की आख़िरी मुलाक़ात की याद में मशगूल हूँ।"
तो अब मिलने का क्या फायदा?

"क्यों?"
"मिलकर भी तो हमें जुदा ही रहना है।

मगर यही जुदाई तो तुमसे बार-बार मिलने का बहाना है।"
कब तक बहाने बनाओगे?

"जब तक बनते रहेंगे।"
"बहाने या हालात?"

हालात बहाना बन जाते थे कि मिलने की चाहत होते हुए भी दोनों ना मिलें।