Thursday, 10 April 2014

हिंदुस्तान का वोटर.......

हिंदुस्तान की राजनीति की तरह उसका वोटर भी बड़ा अजीब है। जहाँ मतदान के दिन कुछ लोग वोट डालने के लिए अति इच्छुक होते हैं, वहीँ कुछ ऐसे भी हैं  जो अपना मत नहीं देते या देना नहीं चाहते। और इसके अनेकों कारण हैं।  कुछ सुबह सोकर नहीं उठ पाते, कुछ बीमार होते हैं, किसी का एक्सिडेंट हो गया होता है, कोई पहले से अस्पताल में एडमिट होता है, कोई वोट देना नहीं चाहता क्यूंकि उसे राजनीती में दिलचस्पी नहीं है। कोई कहता है की "कौन  इतनी दूर जाये वोट डालने", किसी को जल्दी ऑफिस पहुंचना है (अगर बदक़िस्मती से छुट्टी नहीं है तो) और वापिस कब आना है मालूम  नहीं। आजकल हर कोई बहुत व्यस्त है। और  कुछ तो ऐसे भी हैं जिनके पास अपना वोटर आई डी नहीं है, किसी ने अपना आई डी बनवाया ही नहीं है।  ऐसी स्थिती मैं मतदान प्रतिशत कैसे बढ़ेगा बताइये मगर फिर भी बढ़ जाता है (भगवान जाने कैसे)।

ख़ैर, इन्ही वोटरों में कुछ ऐसे भी हैं जो बड़ी बेसब्री से इस दिन का इंतज़ार करते हैं।  सुबह - सुबह  इनका सबसे पहला काम मतदान का ही होता है।  कदम बढ़ाये पोलिंग बूथ की ओर जाते हैं और पहुँचने के बाद पता चलता है कि वोटिंग लिस्ट में नाम ही नहीं है। अलग-अलग वार्ड के पर्चे बिखरे पड़े रहते हैं और वोटर पोलिंग बूथ पे पहुँच कर सीधा वोट करने की बजाये उन पर्चों में अपना नाम ढूंढ रहा होता है।  बड़ी मशक्कत के बाद यदि उस लिस्ट में अपना नाम मिल जाये तो वोटर अपना वोट देकर ख़ुशी-ख़ुशी घर वापिस चला जाता है, और अगर वो मतदान नहीं कर पाता तो सिस्टम को कोसता हुआ लौट आता है। 

चुनाव की खातिर ऑफिस, कॉलेज और स्कूल भी बंद रहते हैं।  कायदे से सभी को इस छुट्टी का फायदा उठाकर वोट डालने जाना चाहिए मगर ऐसा होता है क्या? सड़कें खाली नज़र आती हैं, ट्रैफिक नहीं होता। लगता है मानो हर रोज़ एक ही रास्ते से दफ्तर या कॉलेज जाने वाले आज स्पेशली वोट डालने के लिए छुट्टी किये बैठे हैं।  हमारा यूथ जो सबसे ज़्यादा जागरूक है (ऐसा माना जाता है), बदलाव के लिए अग्रसर है।

(खाली सड़कें)


              (लिस्ट में नाम ढूंढते वोटर) 



(खुद ही अपने नाम की पर्ची काटते वोटर) 
















जानेंगे 16 मई को, क्या किया है हिंदुस्तान के वोटर ने।  बाक़ी आप तो समझदार हैं ही।  

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