Wednesday, 6 August 2014

अब टॉफ़ी कौन खिलायेगा?

हर रोज़ की तरह मैं दफ्तर पहुंची। यद्यपि कल की उस घटना के बाद जाने का कतई मन नहीं था, पर क्या करें अब 'नौकरी वाले नौकर' हैं तो मालिक की ग़ुलामी तो करनी ही पड़ेगी। ख़ैर, उसे छोड़िये।  आप ज़रा ये दाँस्तान सुनिए।

दफ्तर में घुसते ही मैंने पाया कि मात्र चार लोग बैठे हुए हैं। मैंने अपनी सीट पर बैग रखा और तेज़ी से अपने कदम उनकी ओर बढ़ाये। कल की उस घटना को याद किया जा रहा था जिसमे एक एम्प्लॉई को बिना वजह दफ्तर छोड़ देने के लिए कह दिया गया था। बातें हो रही थीं। अटकलें लगाई जा रही थीं कि अब अगली बारी किसकी है।

सहसा वो बोला- "आज मै जाऊंगा, मेरी ही बारी है।"

हम सब चुप खड़े थे।  कोई कुछ बोलने का साहस न कर सका। थोड़ी ही देर बाद सब अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठे काम पर लग गए।

कुछ घंटे बीते। दोपहर का वक़्त था। अचानक ही वो बाहर चला गया। ऑफिस की ही एक एम्प्लॉई उससे मिलकर आई। आते ही उसने कहा- "ये इस दफ्तर में उसका आख़िरी लम्हा था, वो जा रहा है।"

कानों को जैसे यकीन ही न हुआ। ऐसा लगा मानो सर पर पहाड़ टूट पड़ा हो। उससे कोई गहरी दोस्ती नहीं थी, न कभी कोई ज़्यादा बात-चीत हुई। पर सब कहते हैं कि वह बहुत अच्छा है। दिल का साफ़, स्वभाव से विनम्र, सदा मुस्कुराने वाला। मुस्कुराते हुए तो उसे हमेशा मैंने भी देखा है, पर ये अंदाज़ा बिलकुल न था कि आज इस दफ्तर में मैं आख़िरी बार उसकी मुस्कुराहट देख रही हूँ।

जैसा मैंने कहा कि कुछ ख़ास जान पहचान तो नहीं थी, मग़र एक टॉफ़ी का रिश्ता था। सुबह-सुबह मुट्ठी भरकर टॉफ़ियाँ ले आता था। दिन की शुरुआत अक्सर ऐसे ही हुआ करती थी, उसकी लायी टॉफ़ियाँ खाकर। लंच के बाद भी कभी - कभी दे दिया करता था। और अग़र बच जाती थी तो शाम की चाय के बाद भी एक-दो टॉफ़ियाँ मिल ही जाती थीं।

क्या मालूम था कि अचानक मज़ाक में बोला हुआ एक वाक्य इस तरह सच में तब्दील हो जाएगा। बुरा लग रहा था। कुछ कहने-सुनने को नहीं था उस वक़्त। अजीब लग रहा था। हम सब उसके जाने से परेशान थे। पर अब क्या होगा? होगा यही कि अब वो यहाँ नहीं आएगा। कल से वो कुर्सी ख़ाली होगी। कुछ होगा तो वो सिर्फ उसकी याद। याद, जो अब हर पल हम सबकी आँखों में छलकी चली आएगी।



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