बचपन से लेकर जवानी तक हम इसीलिए पढ़ते-लिखते हैं कि एक दिन अपनी पसंद की नौकरी मिलेगी। दिन रात की मेहनत रंग लाएगी और हम अपना और अपने माता-पिता का हर सपना पूरा करेंगे, अपनी इच्छाएं पूरी करेंगे। भाग्य से इतना कुछ करने के बाद लोग डॉक्टर, इंजीनियर, लॉयर बन ही जाते हैं। शायद कुछ लोगों के सपने पूरे हो जाते हों, पर इन्ही में से कुछ लोग होते हैं जो बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते हैं। ऐसी बहुत सी बड़ी बड़ी मल्टी नेशनल कंपनियां हैं जहाँ लोग काम कर बहुत ख़ुश हैं।
लोग सुबह सुबह घर से निकलते हैं। कन्धों पर बैग टाँगे, हाथ में बड़ा सा टैब लिए, कानों में ईयरफ़ोन या हेडफ़ोन लगाए बस चलते चले जाते हैं। अधिकतर लोग नोएडा जाते हुए दिखते हैं। ग़ाजियाबाद की बात की जाये तो नोएडा ही एक ऐसा इलाका है जहाँ अधिकतर एमएनसीज़ बसी हुई हैं। मेट्रो स्टेशनों पर लोग ऐसे खड़े होते हैं, मानो गधों का कोई गुट हो। जैसे उसे को कोई फर्क नहीं पड़ता, जिस दिशा में घुमा दो चल देता है; वैसे ही इन एमएनसीज़ वाले गधों के भी हालात हैं। बॉस ने जब, जैसा कहा, बस कर दिया।
ख़ैर, अब गधों की बात हुई है तो आमिर खान की मशहूर फिल्म "थ्री इडियट्स" का डायलाग कैसे भुलाया जा सकता है। "वायरस यहाँ इस कॉलेज में गधे मैन्युफैक्चर कर रहा है। वो देखो तुम्हारा गधा "। बस, जैसे फिल्म में इम्पीरियल कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (आईएमई) के गधे थे, वैसे ही नॉएडा में इन एमएनसीज़ के गधे है, जो कन्धों पर बोझ लादे मेट्रो स्टेशनों पर लम्बी-लम्बी कतारों में लगे रहेंगे। नौ बजे तक ऑफिस पहुँचना है, पर भीड़ इतनी होती है कि आधा घंटा उस लाइन में खड़े-खड़े ही बीत जाएगा । उसके ऊपर कुछ कंपनियां महान श्रेणी की भी हैं, जहाँ यदि लोग पांच मिनट लेट हुए तो उनके कंजूस और महत्वाकांक्षी बॉस को उस दिन के कुछ पैसे काटने का मौका मिल जायेगा। कॉस्ट कटिंग करने का एकमात्र बेहतरीन तरीका।
ऑफिस पहुँचने के बाद ज़िन्दगी का मकसद सिर्फ इतना है कि अब लोग शाम के पाँच बजे तक अपनी कुर्सी पर बैठे रहेंगे और पांच बजते ही फिर जाकर उस मूक जानवर की तरह उसी लम्बी लाइन में खड़े हो जाएं। मेट्रो आएगी और लोग किसी जंग के लिए तैयार खड़े सैनिकों की तरह अंदर घुसने की कोशिश करते हैं।फिर आख़िरकार बहुत कोशिश के बाद उन्हें अंदर जाने की जगह मिल जाती है। एक-दूसरे को धक्का देते हुए लोग चढ़ जाते हैं और किसी न किसी तरह वापिस घर पहुँच ही जाते हैं।
बस यही है गधों सी ज़िन्दगी। लोग सुबह घर से निकल कर नौ से पाँच बजे तक उस कुर्सी पर बैठ कर बस कंप्यूटर पर टिक-टिक करते रहेंगे, आज एक एमएनसी में; कल किसी और बड़ी कंपनी में थोड़ी ज़्यादा तनख्वाह और शायद किसी ऊंची पोस्ट के साथ। चौबीस घंटे भागती-सी ज़िन्दगी की कहानी ऐसी हो चुकी है कि इंसान और गधे में फर्क करना मुश्किल हो गया है। हम सब इंसान से गधे ही बन चुके हैं। मुबारक हो, पर शायद अब भी कुछ लोगों में वापिस इंसान बनने की चाह बाक़ी है। भगवान कम- से- कम उनकी इस इच्छा को तो सलामत रखे। बाक़ी तो जो है वो रहेगा ही।
लोग सुबह सुबह घर से निकलते हैं। कन्धों पर बैग टाँगे, हाथ में बड़ा सा टैब लिए, कानों में ईयरफ़ोन या हेडफ़ोन लगाए बस चलते चले जाते हैं। अधिकतर लोग नोएडा जाते हुए दिखते हैं। ग़ाजियाबाद की बात की जाये तो नोएडा ही एक ऐसा इलाका है जहाँ अधिकतर एमएनसीज़ बसी हुई हैं। मेट्रो स्टेशनों पर लोग ऐसे खड़े होते हैं, मानो गधों का कोई गुट हो। जैसे उसे को कोई फर्क नहीं पड़ता, जिस दिशा में घुमा दो चल देता है; वैसे ही इन एमएनसीज़ वाले गधों के भी हालात हैं। बॉस ने जब, जैसा कहा, बस कर दिया।
ख़ैर, अब गधों की बात हुई है तो आमिर खान की मशहूर फिल्म "थ्री इडियट्स" का डायलाग कैसे भुलाया जा सकता है। "वायरस यहाँ इस कॉलेज में गधे मैन्युफैक्चर कर रहा है। वो देखो तुम्हारा गधा "। बस, जैसे फिल्म में इम्पीरियल कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (आईएमई) के गधे थे, वैसे ही नॉएडा में इन एमएनसीज़ के गधे है, जो कन्धों पर बोझ लादे मेट्रो स्टेशनों पर लम्बी-लम्बी कतारों में लगे रहेंगे। नौ बजे तक ऑफिस पहुँचना है, पर भीड़ इतनी होती है कि आधा घंटा उस लाइन में खड़े-खड़े ही बीत जाएगा । उसके ऊपर कुछ कंपनियां महान श्रेणी की भी हैं, जहाँ यदि लोग पांच मिनट लेट हुए तो उनके कंजूस और महत्वाकांक्षी बॉस को उस दिन के कुछ पैसे काटने का मौका मिल जायेगा। कॉस्ट कटिंग करने का एकमात्र बेहतरीन तरीका।
ऑफिस पहुँचने के बाद ज़िन्दगी का मकसद सिर्फ इतना है कि अब लोग शाम के पाँच बजे तक अपनी कुर्सी पर बैठे रहेंगे और पांच बजते ही फिर जाकर उस मूक जानवर की तरह उसी लम्बी लाइन में खड़े हो जाएं। मेट्रो आएगी और लोग किसी जंग के लिए तैयार खड़े सैनिकों की तरह अंदर घुसने की कोशिश करते हैं।फिर आख़िरकार बहुत कोशिश के बाद उन्हें अंदर जाने की जगह मिल जाती है। एक-दूसरे को धक्का देते हुए लोग चढ़ जाते हैं और किसी न किसी तरह वापिस घर पहुँच ही जाते हैं।
बस यही है गधों सी ज़िन्दगी। लोग सुबह घर से निकल कर नौ से पाँच बजे तक उस कुर्सी पर बैठ कर बस कंप्यूटर पर टिक-टिक करते रहेंगे, आज एक एमएनसी में; कल किसी और बड़ी कंपनी में थोड़ी ज़्यादा तनख्वाह और शायद किसी ऊंची पोस्ट के साथ। चौबीस घंटे भागती-सी ज़िन्दगी की कहानी ऐसी हो चुकी है कि इंसान और गधे में फर्क करना मुश्किल हो गया है। हम सब इंसान से गधे ही बन चुके हैं। मुबारक हो, पर शायद अब भी कुछ लोगों में वापिस इंसान बनने की चाह बाक़ी है। भगवान कम- से- कम उनकी इस इच्छा को तो सलामत रखे। बाक़ी तो जो है वो रहेगा ही।
Bahut abdhiya chitrankan kiya hai aapne.... Aisa hi ho gya hai...
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