Saturday, 3 February 2018

शहर और मोहब्बत

हम सभी का जन्म किसी शहर, गाँव या ज़िले में हुआ है। मेरे इस लेख में शहर का ज़िक्र है क्योंकि मेरा जन्म शहर में हुआ है। अगर आप इसे पढ़ रहे हैं तो इसे उस जगह से जोड़कर पढ़िए जहाँ आपका जन्म हुआ है।

ये ज़ाहिर- सी बात है कि मैं, आप, हम सभी किसी न किसी शहर में तो जन्मे हैं, पले-बढ़े हैं। इसी पलने-बढ़ने के दौरान हम अपने शहर की गलियों से वाक़िफ़ होने लगते हैं। हर रोज़ उन्हीं सड़कों पर चलना, एक ही चौराहे से गुज़रना, बसों और ऑटो में चढ़ना, पड़ोसियों से मिलना-जुलना, उन्हें जानना - ये सब हमें अपने शहर की मिटटी से जोड़ता है। और जब हम इस मिट्टी से जुड़ने लगते हैं, यक़ीनन हमें अपने शहर से प्यार होने लगता है।

एनसीआर - नेशनल कैपिटल रीजन - एक ऐसा इलाका है जिसमें कैपिटल है हमारी राजधानी दिल्ली और इससे जुड़े हुए हैं कुछ और शहर - ग़ाज़ियाबाद, नॉएडा, फरीदाबाद और गुड़गांव। इस एनसीआर की ख़ास बात ये है कि यहाँ किसी भी अजनबी से मुलाक़ात हो तो ये पता चलता है कि वो शख़्स अपना शहर छोड़कर यहाँ नौकरी करने के लिए आया है। हालाँकि कुछ और शहर जैसे सपनों की नगरी मुंबई, बंगलुरू और चेन्नई जैसे अन्य बड़े शहरों के पास भी ये विशेषाधिकार है।

मेरा वास्ता एनसीआर से है तो बात यहाँ की। मध्य प्रदेश, बंगाल, राजस्थान, असम, जम्मू कश्मीर, हरियाणा, पंजाब और लगभग हर राज्य से कोई ना कोई हमसे यहाँ टकरा ही जाता है। यहाँ तक कि बाहर देश के लोग भी। कितने लोग अपना वो शहर छोड़कर, जहाँ उनका जन्म हुआ, जहाँ उनका अपना घर है, माता-पिता हैं, भाई-बहन हैं, किसी दूसरे शहर में जीवन-यापन के साधन खोज उसमें इतना व्यस्त हो जाते हैं कि फिर शायद ही कुछ याद रह जाता है। ज़िन्दगी तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ने लगती है और सब कुछ ठीक ही मालूम होता दिखाई देता है।

हम नए शहर के रंग-ढंग में ढलने लगते हैं, चीज़ो को नए सिरे से देखने और समझने की कोशिश करने लगते हैं। कई बार सफल तो कई बार असफल हो जाते हैं।

रिवाज तो यही है कि शहरों में लोग बसते हैं, पर कभी-कभी लोगों में शहर भी बसता है। 

पर सौ बात की एक बात ये है कि कभी-कभी जब हम इस नए शहर से ऊब जाते हैं, तब ये होता है कि हमें अपना घर, अपना शहर, अपने लोग याद आने लगते हैं। ये एहसास होने लगता है कि हमारा शहर भी हमें उतना ही चाहता है जितना हम उसे आज तक चाहते आये हैं या इस पल से पहले कभी चाहते थे। ये वो पल होता है जब हमें ये लगने लगता है कि हमारा शहर हमें बुला रहा है - अभी, इसी वक़्त।

याद इतनी गहरी होती है कि बेक़रारी बढ़ने लगती है। पर ये बेक़रारी मिट तब जाती है जब इस नए शहर में कोई 'अपने' उस शहर वाला टकरा जाए जिसे हम छोड़कर आये हैं। वही अपनापन, वही मीठी बोली, वही व्यवहार - ये सब कुछ पल का सुकून मयस्सर कर देते हैं।

रिवाज तो यही है कि शहरों में लोग बसते हैं, पर कभी-कभी लोगों में शहर भी बसता है। जिन रास्तों, सड़कों, चौराहों, गलियों, मंदिर- मस्जिदों से हम वास्ता रखते हैं, वही वास्ता कोई और भी रखे तो हम अपने शहरीपन को और बेहतर महसूस कर सकते हैं, अपने भीतर अपने शहर की यादों से सदा अथक मोहब्बत कर सकते हैं और जब जैसे चाहें उसे जी सकते हैं।