"सुनो।"
"जी बोलिये।"
"मैं जा रही हूँ।"
"कहाँ?"
"तुम्हें छोड़कर।"
"अरे! पर कहाँ?"
"इससे तुम्हें क्या?"
"शादी कर रही हो क्या ?"
"इससे भी तुम्हें क्या ?"
"अरे! दोस्तों को तो बता ही सकते हैं।"
"तुम मेरे दोस्त नहीं हो।"
"अब बता भी दो। मैं कौन-सा कुछ बिगाड़ दूंगा?"
"अब इससे ज़्यादा क्या बिगाड़ोगे ?"
"बताओ भी।"
"बताना महज़ इतना है कि अब हम कभी नहीं मिलेंगे।"
"मग़र क्यों ?"
"क्योंकि ये दुनिया बहुत बड़ी है और हम दोनों के पास वक़्त बहुत कम है।"
"पर क्या हम दोस्त नहीं रह सकते ?"
उसने उसके आख़िरी सवाल का जवाब नहीं दिया। जवाब शायद उसे मालूम था।
आज भी कई सवाल उसके दिमाग की नसों में रेंगते रहते हैं, क़िस्मत शायद जिनके जवाब तलाश रही है।