Tuesday, 29 May 2018

स्टोरी

"यार तुम पत्रकार भारतीय रेल की बुरी हालत पर कोई स्टोरी क्यों नहीं करते?"
"माफ़ कीजियेगा मोहतरमा, ये मेरी बीट नहीं है।"

"अरे इतने बड़े पत्रकार हो, किसी बीट वाले को ढूंढ़ो। मुझे पता है तुम अगर स्टोरी कर नहीं सकते तो कम से कम करवा तो ज़रूर सकते हो।"
"तुम बड़ा जानती हो मुझे।"

"और नहीं तो क्या।"
"वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि आपके आयडल मशहूर पत्रकार रविश कुमार जी ने अपने प्राइम टाइम में इंडियन रेलवेज़ पर एक पूरी सिरीज़ की है।"

"मुझे पता है। पर अफ़सोस मैंने उसका एक भी एपिसोड नहीं देख पाया।"
"ओह! क्यों?"

"कुछ महीनों से टीवी ख़राब है और ज़िंदगी में मसरूफ़ियत इतनी है कि बेचारे को ठीक करवाने का समय ही नहीं मिलता। अब यूट्यूब पर देखूंगी। "
"हम्म! बात तो सही कह रही हो तुम। हर कोई बड़ा बिज़ी है आजकल।"

"हां, तुम्हें कब मेरी कोई बात लगती है।"
"तुम कभी कुछ ग़लत कहती ही नहीं।"

"हां, तो मानो मेरी बात। करवा दो एक और स्टोरी।"
"पर कहानी है क्या?"

ये जो दूर तक ले जाने वाली रेलगाड़ियां हर रोज़ लेट होती हैं, इनके कारण सभी लोकल ट्रेनें भी देरी से चलती हैं और दिल्ली के दफ़्तरों में जाने वाले डेली कम्मयूटर्स बहुत परेशान होते हैं। 

"ये जो दूर तक ले जाने वाली रेलगाड़ियां हर रोज़ लेट होती हैं, इनके कारण सभी लोकल ट्रेनें भी देरी से चलती हैं और दिल्ली के दफ़्तरों में जाने वाले डेली कम्मयूटर्स बहुत परेशान होते हैं।"
"ये तो होगा ही। ज़ाहिर-सी बात है। पर लगता है तुम सबसे ज़्यादा परेशान होती हो।"

"मैं भला क्यों परेशान होंगी? मैं तो मेट्रो में चलती हूं ना।"
"हां, तुम्हारे माथे पर शिकन तो सिर्फ़ उस एक लम्हे में आती है जब तुम हर सुबह उस लोकल ट्रेन से उतरकर अपने पांव मेरे दफ़्तर ले जाने वाले मोड़ की ओर बढ़ाती हो और मुझसे मिले बिना ही चली जाती हो।"