Monday, 28 September 2015

मिठाई पुल की कड़वी कहानी

एनडीटीवी के प्राइम टाइम में आज रवीश सर ने दालों की कहानी सुनायी। मालूम हुआ कि पुरानी दिल्ली में स्थित मिठाई पुल नामक एक जगह है। यहाँ हर रविवार को एक बाज़ार लगता है, जहाँ मिठाइयाँ नहीं मिलतीं। जी हाँ, इस बाजार में दालें मिलती हैं, चावल और मसाले मिलते हैं, ख़ासतौर पर मध्यम वर्ग और ग़रीब तबके के लोगों के लिए। ऐसा बताया उन्होंने।

बहुत से ऐसे लोग दिखे जो मीलों दूर से यहाँ दालें खरीदने आये थे। दादरी, द्धारका, नोएडा, आदि जगहों से लोग यहाँ सिर्फ दालों की ही खातिर आये थे। ऐसी मार है महंगाई की, देख लीजिये। एक महिला से पूछने पर पता चला कि महंगाई के चलते वो हफ़्ते में सिर्फ एक ही बार दाल बनाती हैं। बाकी समय में गुज़ारा सब्ज़ी और रोटी से ही होता है। वो सभी लोग जो वहां सामान लेने आये थे, उन सबका एक सामान्य मत ये था कि उनके घर के पास वाली दुकानों में लगभग हर दाल का दाम सौ रुपये से भी ज़्यादा है। यही कारण है कि वे लोग इस मिठाई पुल पर दालें लेने आये थे। शायद यही उनके लिए किसी मिठाई से कम नहीं।

इस सबके बीच हैरानगी की बात ये थी कि जो दालें वहाँ बिक रही थीं, उनकी गुणवत्ता बहुत ही ख़राब थी। लोग ऐसा अनाज खाने को मजबूर हैं जो हाई सोसाइटी के लोग अक्सर चिड़िया और कबूतरों के लिए ले जाया करते हैं, ऐसा एक दाल बेचने वाले ने बताया। अब ऐसे में ये समझना मुश्किल है कि इंसान की हालत बत्तर हो रही है या पक्षियों की बेहतर। दालें जिनमें छेद हो चुके हैं, वो चालीस से साठ रूपए प्रति किलो मिलती हैं और चावल के मिटटी भरे टुकड़े पंद्रह रूपए प्रति किलो मिलते हैं इस बाजार में। लोग इसे ही ले जाते हैं, वो भी बहुत भारी मात्रा में। हर महीने इनका एक रविवार इसी बाज़ार के लिए रिज़र्व रहता है।

ये दयनीय हालत है हमारे मध्यम और ग़रीब तबके के लोगों की। मालूम ये भी हुआ कि कुछ मध्यम वर्गीय लोगों को शर्म महसूस होती है समाज के आगे ये स्वीकारने में कि वे इस बाजार से सामान खरीदते हैं। अजीब विडम्बना है, पेट देखें या स्टेटस। रिक्शेवाले से लेकर मकान बनाने वाले मजदूर तक, हर ग़रीब आदमी यहाँ पेट भरने की उम्मीद लेकर आता है और महीने भर का राशन ले जाता है। बड़ी मेहनत की कमाई होती है और उम्मीद सिर्फ दो वक़्त की रोटी पेट में जाने की होती है।

इन सभी लोगों के साथ अफ़सोस जताया जाए या इनकी हिम्मत की दाद दी जाए, मालूम नहीं। अफ़सोस इस बात का कि काश इन्हें भी इंसानों वाला खाना नसीब हो, वो जो बड़े लोग खाते हैं, और हिम्मत इस बात की कि आज भी इनमें इतना हौंसला क़ायम है कि महंगाई से लड़ रहे हैं, यहाँ इस मिठाई पुल पर आकर। बहरहाल, ये है दिल्ली के मिठाई पुल की कड़वी कहानी। आप सोचते रहिये।

जय हिन्द। जय भारत। मेरा भारत महान, करे ग़रीबों का काम-तमाम। 

Wednesday, 23 September 2015

अ-रूप.............

ये लिखते हुए हाथ काँप रहे हैं, आँखें नाम हैं लेकिन शायद यही सब ज़िन्दगी के कुछ पहलू हैं जो इसकी नाख़ुश हक़ीक़तों के साथ समझौता कर जीने का साहस देंगे। मेरे बड़े मुझे बहुत कुछ समझाते हैं, कुछ समझ आता है, कुछ नहीं। जो आ जाता है वो ठीक है, जो नहीं आता, वो समझाने के लिए ज़िन्दगी अपने खेल खेल देती है। जैसा कि आज हुआ।

हर दिन की तरह मैं घर से दफ्तर जाने के लिए निकली थी और अचानक पता चला कि मेरे एक कलीग अब इस दुनिया में नहीं हैं। व्हाट्सप्प पर एक मेसेज आया और मैं हक्की-बक्की रह गई। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि एक शख़्स जो कल तक आपके सामने अच्छा-खासा मौजूद था, वो अब इस दुनिया में नहीं है। अरूप दादा अब इस दुनिया में नहीं हैं, वो अब कभी दफ़्तर नहीं आएंगे।

ख़बर मिलते ही पहला ख्याल दिमाग में ये आया कि उन्होंने कहा था कि एक दिन मैं साहिबाबाद आऊंगा तो तेरे घर ज़रूर आऊंगा। एक बार आये भी थे मगर तब मेरे घर नहीं आये। मैंने कहा उनको आई नो आप क्यों नहीं आये, मेरे घर में एसी नहीं है ना। थोड़े दिन रुक जाओ, मैं एसी लगवा लूँ फिर आपको खींचकर अपने घर लेकर जाऊंगी। बहुत गर्मी लगती है ना आपको। होठों पर एक हल्की-सी मुस्कान के साथ ऑटो में बैठे आँखों से आंसू गिरते चले जा रहे थे। यकीन ही नहीं हो रहा था कि ऐसा कुछ हो गया है। पर सच से कितनी देर तक भागा जा सकता है। सच वही था कि कल रात एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई थी। पोस्टमॉर्टम के लिए उनकी बॉडी दिल्ली के एम्स अस्पताल ले जाई गई थी। 

हम सब अस्पताल के बाहर खड़े इंतज़ार कर रहे थे। दफ्तर में छुट्टी की घोषणा हो गई थी। कोई काम नहीं कर रहा था। तीन घंटे बीत गए थे वहां खड़े-खड़े मगर मैं उन्हें देख नहीं पायी। एक आखरी बार देखना चाहती थी पर शायद मुझमें साहस ही नहीं था इसलिए चुपचाप चली आई बस। अपने दफ्तर में सबसे छोटी हूँ, कुछ की लाडली भी, जिनमें से दादा भी एक थे। कभी उनको किसी बात के लिए शुक्रिया अदा करो तो कहते थे 'छोटी है न, ज़्यादा मत बोला कर। ध्यान रख। कोई परेशानी हो तो बताया कर।' कई बार मुझे आवाज़ लगाते थे और न सुन पाने पर कहते थे-'एकाँकी, ध्यान कहाँ है तेरा? चार बार आवाज़ लगाया मैंने।' मैं कहती थी- 'सॉरी दादा।' 

'सॉरी सॉरी क्या? क्या, हुआ क्या है तुझे?'- पूछा करते थे। कुछ होता ही नहीं था तो बताती क्या। 

दादा के साथ बीता एक पल 


दादा की सबसे अच्छी बात लगा करती थी कि वो बिना कुछ उम्मीद किये हर किसी की मदद किया करते थे। हर बार, हर वक़्त। और उससे भी अच्छी बात ये थी कि उनसे कभी भी मदद मांगने में हिचकिचाना नहीं पड़ता था। मालूम होता था कि जो कहा है, वो करें देंगे। कोई विशिष्ट रूप नहीं था उनका, जब जैसी ज़रुरत होती थी, वो उसमे ढल जाते थे। बस इतने वक़्त में इतना ही समझी थी मैं उनको। अक्सर उनसे पूछा करती थी - 'अगर मैं आपके लिए एक ब्लॉग लिखूँ तो आप पढोगे?' जवाब होता था - 'नहीं।' सच ही तो कहा था दादा आपने। 

पता नहीं कौन पढ़ेगा, पर आप तो नहीं ही पढ़ोगे। है न? 







Wednesday, 9 September 2015

मुबारक़ हो, आप मर्द हैं

जी हाँ, आप, जो कल ऑटो में तनकर बैठे हुए थे, आप ही से कहना चाह रही हूँ मैं। नोएडा सुरक्षित क्षेत्र नहीं है, ये शायद आपको तब मालूम होता जब आपकी अपनी कोई बहन या बेटी होती जिसे हर दिन नौकरी करने यहाँ आना पड़ता।

माना कि आप उस ऑटो वाले को उतने ही पैसे दे रहे थे जितने मैं भी देने की हैसियत रखती हूँ, मग़र शायद आप ये समझ सकते थे कि किसी भी इलाके में जैसे-जैसे अँधेरा बढ़ता है, एक महिला असुरक्षित महसूस करने लगती है। ख़ैर, आप क्यों इतना कष्ट करेंगे, आप महिला थोड़ी ना हैं। वैसे आजकल तो ज़माना ऐसा है कि महिला भी महिला की दुशमन हो चली है। पर अब क्या ही कहें। छोड़िये।

बड़ी आसानी से आपने कह दिया कि मैं आगे नहीं बैठूंगा। मैं ही बेवक़ूफ़ थी जो समझ रही थी कि शायद आप में 'कर्टसी' नाम की कोई चीज़ होगी। आफ्टर आल, आप तो मर्द हैं जो औरत को कुछ नहीं समझते या कुछ समझते भी हैं तो बस पाँव की जूती या हो सकता है उससे भी बत्तर कुछ और। आप ही जानें।

पर हार तो मैंने भी नहीं मानी। तेहा में उस ऑटो को छोड़कर आगे बढ़ गई। क़िस्मत अच्छी थी या बुरी मालूम नहीं, पर दस मिनट बाद वही ऑटो खाली होकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ, और आप अब भी वहीँ बैठे हुए थे। सहसा ऑटो वाले ने पूछा-" मैडम, मोहन नगर?"

मैंने कहा- "हाँ भैया।"

मैं ऑटो में चढ़ी और सीना तानकर आपके ही बगल में बैठ गई। गुस्सा और हँसी  दोनों मेरे चेहरे पर साफ़ झलक रहे थे। आपकी भी शक्ल देखने लायक थी। दिल कर रहा था आपका एक फोटो ले लूँ और सोशल मीडिया पर वायरल कर दूँ। पर क्या फायदा, आप जैसी शख्सियत को पॉपुलर करने का?

मुझे बस इतना ही कहना है- "न जाने किस बात पर गुमान करने वाले, मुबारक़ हो, आप मर्द हैं।"