एनडीटीवी के प्राइम टाइम में आज रवीश सर ने दालों की कहानी सुनायी। मालूम हुआ कि पुरानी दिल्ली में स्थित मिठाई पुल नामक एक जगह है। यहाँ हर रविवार को एक बाज़ार लगता है, जहाँ मिठाइयाँ नहीं मिलतीं। जी हाँ, इस बाजार में दालें मिलती हैं, चावल और मसाले मिलते हैं, ख़ासतौर पर मध्यम वर्ग और ग़रीब तबके के लोगों के लिए। ऐसा बताया उन्होंने।
बहुत से ऐसे लोग दिखे जो मीलों दूर से यहाँ दालें खरीदने आये थे। दादरी, द्धारका, नोएडा, आदि जगहों से लोग यहाँ सिर्फ दालों की ही खातिर आये थे। ऐसी मार है महंगाई की, देख लीजिये। एक महिला से पूछने पर पता चला कि महंगाई के चलते वो हफ़्ते में सिर्फ एक ही बार दाल बनाती हैं। बाकी समय में गुज़ारा सब्ज़ी और रोटी से ही होता है। वो सभी लोग जो वहां सामान लेने आये थे, उन सबका एक सामान्य मत ये था कि उनके घर के पास वाली दुकानों में लगभग हर दाल का दाम सौ रुपये से भी ज़्यादा है। यही कारण है कि वे लोग इस मिठाई पुल पर दालें लेने आये थे। शायद यही उनके लिए किसी मिठाई से कम नहीं।
इस सबके बीच हैरानगी की बात ये थी कि जो दालें वहाँ बिक रही थीं, उनकी गुणवत्ता बहुत ही ख़राब थी। लोग ऐसा अनाज खाने को मजबूर हैं जो हाई सोसाइटी के लोग अक्सर चिड़िया और कबूतरों के लिए ले जाया करते हैं, ऐसा एक दाल बेचने वाले ने बताया। अब ऐसे में ये समझना मुश्किल है कि इंसान की हालत बत्तर हो रही है या पक्षियों की बेहतर। दालें जिनमें छेद हो चुके हैं, वो चालीस से साठ रूपए प्रति किलो मिलती हैं और चावल के मिटटी भरे टुकड़े पंद्रह रूपए प्रति किलो मिलते हैं इस बाजार में। लोग इसे ही ले जाते हैं, वो भी बहुत भारी मात्रा में। हर महीने इनका एक रविवार इसी बाज़ार के लिए रिज़र्व रहता है।
ये दयनीय हालत है हमारे मध्यम और ग़रीब तबके के लोगों की। मालूम ये भी हुआ कि कुछ मध्यम वर्गीय लोगों को शर्म महसूस होती है समाज के आगे ये स्वीकारने में कि वे इस बाजार से सामान खरीदते हैं। अजीब विडम्बना है, पेट देखें या स्टेटस। रिक्शेवाले से लेकर मकान बनाने वाले मजदूर तक, हर ग़रीब आदमी यहाँ पेट भरने की उम्मीद लेकर आता है और महीने भर का राशन ले जाता है। बड़ी मेहनत की कमाई होती है और उम्मीद सिर्फ दो वक़्त की रोटी पेट में जाने की होती है।
इन सभी लोगों के साथ अफ़सोस जताया जाए या इनकी हिम्मत की दाद दी जाए, मालूम नहीं। अफ़सोस इस बात का कि काश इन्हें भी इंसानों वाला खाना नसीब हो, वो जो बड़े लोग खाते हैं, और हिम्मत इस बात की कि आज भी इनमें इतना हौंसला क़ायम है कि महंगाई से लड़ रहे हैं, यहाँ इस मिठाई पुल पर आकर। बहरहाल, ये है दिल्ली के मिठाई पुल की कड़वी कहानी। आप सोचते रहिये।
जय हिन्द। जय भारत। मेरा भारत महान, करे ग़रीबों का काम-तमाम।
बहुत से ऐसे लोग दिखे जो मीलों दूर से यहाँ दालें खरीदने आये थे। दादरी, द्धारका, नोएडा, आदि जगहों से लोग यहाँ सिर्फ दालों की ही खातिर आये थे। ऐसी मार है महंगाई की, देख लीजिये। एक महिला से पूछने पर पता चला कि महंगाई के चलते वो हफ़्ते में सिर्फ एक ही बार दाल बनाती हैं। बाकी समय में गुज़ारा सब्ज़ी और रोटी से ही होता है। वो सभी लोग जो वहां सामान लेने आये थे, उन सबका एक सामान्य मत ये था कि उनके घर के पास वाली दुकानों में लगभग हर दाल का दाम सौ रुपये से भी ज़्यादा है। यही कारण है कि वे लोग इस मिठाई पुल पर दालें लेने आये थे। शायद यही उनके लिए किसी मिठाई से कम नहीं।
इस सबके बीच हैरानगी की बात ये थी कि जो दालें वहाँ बिक रही थीं, उनकी गुणवत्ता बहुत ही ख़राब थी। लोग ऐसा अनाज खाने को मजबूर हैं जो हाई सोसाइटी के लोग अक्सर चिड़िया और कबूतरों के लिए ले जाया करते हैं, ऐसा एक दाल बेचने वाले ने बताया। अब ऐसे में ये समझना मुश्किल है कि इंसान की हालत बत्तर हो रही है या पक्षियों की बेहतर। दालें जिनमें छेद हो चुके हैं, वो चालीस से साठ रूपए प्रति किलो मिलती हैं और चावल के मिटटी भरे टुकड़े पंद्रह रूपए प्रति किलो मिलते हैं इस बाजार में। लोग इसे ही ले जाते हैं, वो भी बहुत भारी मात्रा में। हर महीने इनका एक रविवार इसी बाज़ार के लिए रिज़र्व रहता है।
ये दयनीय हालत है हमारे मध्यम और ग़रीब तबके के लोगों की। मालूम ये भी हुआ कि कुछ मध्यम वर्गीय लोगों को शर्म महसूस होती है समाज के आगे ये स्वीकारने में कि वे इस बाजार से सामान खरीदते हैं। अजीब विडम्बना है, पेट देखें या स्टेटस। रिक्शेवाले से लेकर मकान बनाने वाले मजदूर तक, हर ग़रीब आदमी यहाँ पेट भरने की उम्मीद लेकर आता है और महीने भर का राशन ले जाता है। बड़ी मेहनत की कमाई होती है और उम्मीद सिर्फ दो वक़्त की रोटी पेट में जाने की होती है।
इन सभी लोगों के साथ अफ़सोस जताया जाए या इनकी हिम्मत की दाद दी जाए, मालूम नहीं। अफ़सोस इस बात का कि काश इन्हें भी इंसानों वाला खाना नसीब हो, वो जो बड़े लोग खाते हैं, और हिम्मत इस बात की कि आज भी इनमें इतना हौंसला क़ायम है कि महंगाई से लड़ रहे हैं, यहाँ इस मिठाई पुल पर आकर। बहरहाल, ये है दिल्ली के मिठाई पुल की कड़वी कहानी। आप सोचते रहिये।
जय हिन्द। जय भारत। मेरा भारत महान, करे ग़रीबों का काम-तमाम।
