Sunday, 14 September 2014

ज़रा गौर कीजियेगा।

चुनाव जीतने के लिए नेता आजकल तरह - तरह की रणनीतियाँ अपनाते हुए नज़र आते हैं। सबके अपने अलग - अलग तरीके हैं। कोई हिंदुत्व को बढ़ावा देना चाहता है, कोई सेक्युलर है, कोई बिजली - पानी की समस्या को दूर करना अपनी ज़िम्मेदारी बताता है, तो कोई ग़रीबी दूर करना चाहता है। हर कोई किसी एक मुद्दे को पकड़े वायदे करते नज़र आता है।

आज जो देश के प्रधानमंत्री हैं, उन्होंने भी दिन - रात अपनी पार्टी के लिए खूब प्रचार किया। आज जो नतीजा दिखाई दे रहा है, वो साफ़ ज़ाहिर करता है कि बीजेपी ने जीत हासिल करने के लिए कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी। टीवी, रेडियो, अखबारों के द्वारा बहुत कुछ दिखाया, बताया और सुनाया गया, पर कुछ था जो रह गया। इस नतीजे के पीछे शायद एक हिस्सा और भी है। मेरे फ़ोन के कैमरे से ली गयी ये तस्वीर बहत कुछ कहती है। ज़रा गौर कीजियेगा।


ये एक लोकल ट्रेन के महिला डिब्बे की तस्वीर है। लिखे गए शब्द कुछ इस प्रकार हैं।
"वैसे तो सारे नेता भ्रष्ट हैं चाहे मोदी ही क्यों न हो।  लेकिन जब सबको देख चुके तो एक बार मोदी को भी देखो। कम से कम हिंदुत्व तो बढ़ेगा। हिन्दुओं का संगठन भी बनेगा। हिन्दू धर्म का तूफ़ान तो आएगा।"

 दो - तीन जगह कुछ और बातें भी लिखी थीं, जल्दी में उनकी तस्वीर तो न मिल सकी पर जो लिखा था वो मैंने नोट कर लिया। एक जगह इस प्रकार लिखा था।
 "मोदी को वोट दो।
हिंदुत्व को वोट दो।
हिन्दू धर्म को वोट दो।
विकास को वोट दो।
हिन्दू जागो। "

दूसरी तरफ वाली खिड़की के पास निम्नलिखित वाक्य लिखा हुआ था।
"समस्त हिन्दू एकजुट हो जाओ और हिंदुसतान को वोट दो।"

कौन होगा वो शख़्स जिसने उस महिला डिब्बे को हिंदुत्व का डिब्बा बना दिया। जो भाषा लिखी गयी है, उससे तो यही प्रतीत होता है कि ये सारी बातें चुनाव होने से पहले ही लिखी गयी होंगी। ऊपर तस्वीर में गौर करने वाली एक बात और है कि किसी ने उस हिंदुत्व पर लिखे भाषण को मानो बहुत गुस्से में काट दिया है। सोचने वाली बात है कि आखिर ये क्रॉस का निशान किसने लगाया होगा?

पीएस - उस ट्रेन में जो भी लिखा था, वो परमानेंट मार्कर से लिखा था या नहीं, मुझे ज्ञात नहीं । अगर कोई तलाशी लेने जाए और ये सब कुछ वहाँ न मिले तो माफ़ कीजियेगा।

Wednesday, 3 September 2014

वो वापस आई थी.. मग़र????

कॉलेज ख़त्म होने के बाद पहली ही नौकरी ऐसी मिल गयी कि साथ पढ़ने वाले लोग ही दफ़्तर के कलीग भी बन गए। इस इत्तफ़ाक से लगभग सभी खुश थे। हमारे बीच दूरियाँ मिटने लगीं थीं, सब एक दूसरे से और अधिक घुलने-मिलने लगे थे।

सब कुछ ठीक था उस दिन तक जब अचानक हमने देखा कि धीरे - धीरे कुछ एम्प्लोईज़ को बिना वजह दफ़्तर छोड़ने को कहा जा रहा था। एक - एक कर सब जाने लगे थे और हलके - हलके हम सब पर इसका नकारात्मक असर पड़ने लगा। फिर भी, हम काम तो कर रहे थे पर उसे करने में सुकून हासिल नहीं हो रहा था।

एकाएक एक दिन मेरी टीम लीडर का स्वास्थ्य बिगड़ गया।  उसने एक मेसैज से इत्तिला किया कि वह उसी शाम की गाड़ी से घर जा रही है । वापस कब आएगी, इसका अंदाजा नहीं था।

अगले दिन हम सब दफ़्तर पहुंचे तो मेरी टीम के बाक़ी लोग भी उस जगह से जान छुड़ाने के बारे में सलाह-मशवरा कर रहे थे, न चाहते हुए भी मैं जिसका हिस्सा थी। शाम होने को आई और मुझसे मेरा फैसला पूंछा गया। मैंने कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं समझा। बस बैग उठाया और घर की ओर चल दी।

उसी रात उसका फ़ोन आया।  उसने मुझसे वादा किया कि वह ज़रूर वापस आएगी, मेरी ख़ातिर। दफ़्तर की इस नयी ज़िन्दगी में वो कब मेरी अच्छी दोस्त बन गयी पता ही नहीं चला। ख़ैर, बात बस ये थी कि उसके अल्फ़ाज़ों ने मेरे मन में उम्मीद की एक नयी किरण रोशन कर दी थी।

उसके बाद से मेरा हर दिन बस उसके इंतज़ार में कटता रहा। दफ़्तर पहुँच कर मैं हर रोज़ उस कुर्सी को देखा करती, जिस पर बैठ वह हर काम ज़िम्मेदारी से निभाती थी। हँसी और तनाव के लम्हे आँखों में अश्कों का सैलाब ले आते थे। हर दिन मै उससे बात किया करती थी। अचानक ही वो एक दिन किसी वजह से ख़ामोश हो गयी। उसकी चुप्पी को मैं समझ न सकी। बस अंदाजा लगाने लगी की शायद अब वो नहीं आएगी।

कुछ दिन बाद फिर उसका फ़ोन आया। उसने कहा कि वो दिल्ली आ रही है। मै ख़ुशी से झूम उठी। इससे पहले कि मैं कुछ कहती, उसने अपना वाक्य पूरा किया "अपना सामान लेने"। मैं चुप रह गयी।  कुछ कहने की न तो हिम्मत ही हुई, न इच्छा।

"ठीक है"- मैंने दबे स्वर में कहा।

"वक़्त मिले तो एक आख़री बार मिल लेना" - उसने कहा।

"मैं कोशिश करुँगी"- कहते ही मैंने फ़ोन रख दिया।

अगले ही दिन वो दिल्ली आ गयी। मैं उससे मिलने भी गयी। मुलाक़ात बस दस मिनट की थी।

"काश फ़िर किसी कंपनी में तुम मेरी कलीग बनो"- मैंने इच्छा जताई।

"अपना ध्यान रखना। अच्छे से रहना"- यह कहकर वो स्टेशन की ओर चल दी।

उसके चले जाने के बाद जब पहला फ़ोन आया था तब ये उम्मीद जगी थी कि हम शायद फिर से एक साथ काम कर पाएंगे।  वही पागलपन, वही जुनून फिर उस दफ़्तर में दिखेगा। मगर सच्चाई तो कुछ और ही थी। सच ये था कि वो वापस आई तो थी, पर वापस ही चले जाने के लिए।