Saturday, 23 May 2015

नमस्कार! मैं रवीश कुमार.......... (एक ख़्वाब के जज़्बात)

कोई अपने नाम के आगे नमस्कार लगाता है क्या ? पिछले १६ साल से वो यही करते आ रहे हैं। मुझे ज़्यादा ज्ञात नहीं, मगर लगभग इतने साल तो हो ही गए हैं। पत्रकारिता का रूप बदल देने वाले रवीश, बेबाक़ और बेख़ौफ़ होकर तथ्यों को नागरिकों तक पहुँचाने वाले एक क़ाबिल पत्रकार।

कल प्रगति मैदान में हो रहे इवेंट में जब अचानक उन्हें देखा, ख़ुशी का ठिकाना न रहा। सालों से उनसे मिलने की तमन्ना अचानक एक झटके में पूरी हो गयी। जब तक वो सिर्फ टीवी पर नज़र आते थे तो ख़्वाहिश हुआ करती थी कि एक दिन इनसे मिलना है और 'ये - ये' कहना है। 'वो - वो' पूछना है। मग़र जब वो सामने थे तो मानो बोलती ही बंद हो गयी। बीच रास्ते में खड़ी मैं बस उन्हें देखती रह गई। नज़रें हट ही नहीं रही थीं। वो अपना काम कर रहे थे और मैं बस उन्हें देखती ही जा रही थी, मेरे रोल मॉडल। कहना था कि सर, पत्रकारिता के लिये कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुएँ बता दीजिये, कहा भी था, लेकिन उनके पास समय नहीं था जवाब देने का।

कोई अंदाजा नहीं मुझे कि उन्होंने मेरी बात सुनी भी या नहीं। मैं उस भीड़ में कुछ - कुछ बोलती चली जा रही थी। कौन सुन रहा था या जिनके लिए कह रही थी उन्होंने सुना या नहीं, कुछ नहीं मलूम। बस इतना पता था कि जो भी मन में है वो कहना है। शूट चल रहा था और हमारे अध्यापक ने सिखाया था कि कैसा व्यवहार किया जाता है शूटिंग के दौरान। थोड़ा सभ्य बनना था। कैमरा में दिखना उद्देश्य नहीं था, बस कुछ बातें उनसे साझा करनी थीं। वो जहाँ - जहाँ चलते रहे, मैं उनके पीछे पीछे चलती रही। महसूस हो रहा था कि कैसे हम अपने ख़्वाबों का पीछा करते हैं। एक अजीब- सा एहसास।

पीछा करने के लिए मग़र हिम्मत चाहिए। जहाँ रवीश आ जाते हैं, वहाँ इतनी भीड़ हो जाती है कि ख़ुद को उस भीड़ से अलग दिखाना मुश्किल मालूम होता है। अगर वो तीन लोग हौंसला ना देते तो वो सेल्फ़ी नहीं खिंचती, वो दो शब्द जिनकी अदला-बदली हुई, वो नहीं होती। मेरे और उनके बीच बस एक चीज़ थी - "भीड़"। चाहिए था तो बस हौंसला। सबने कहा "यू नेवर नो कि वो दोबारा तुम्हें कब मिलेंगे। गो, मीट हिम, शो सम गट्स। "

आसान नहीं था लेकिन जब कुछ करने की ठान लो तो भगवान भी साथ दे ही देते हैं और रविश जी ने भी दे ही दिया। एक फोटो मिल गई। शुक्रिया उन सभी का जिनकी वजह से हौंसला मिला। ये भी महसूस हुआ कि जब आपका ख़्वाब सामने हों तो साहस खुद ही जुटाना पड़ता है। कोई कब तक साथ देगा, और क्यों देगा? इसलिए अपनी पहचान खुद बनाने का एक जज़्बा-सा जगा, जद्दोजेहद अब जारी है। लेकिन वो सभी लोग जिनकी वजह से अब तक इतनी सारी चीज़ें हासिल हो गई है उनका शुक्रगुज़ार होना लाज़मी है। मैं चाहें सफलता के शिखर तक पहुँचू या नहीं, लेकिन अब तक जहाँ भी हूँ अपनी ज़िन्दगी में आये हर शख़्स की शुक्रगुज़ार थी, हूँ और रहूँगी। उन सबकी दुआएँ न होती, साथ न होता तो शायद हम भी नहीं होते।

एक खूबसूरत लम्हा................ 



आप पढ़ रहे थे एक ख़्वाब के जज़्बात। नमस्कार।