बचपन से हम पढ़ते और सुनते आये हैं कि माँओं में बहुत हौंसला होता है। हर मुश्किल को बड़ी ही आसानी से झेल जाती हैं हमारी माँएं, ख़ासतौर पर अपने बच्चों के लिए तो वो कुछ भी कर-गुज़रने का हौंसला रखती हैं।
पर ज़िन्दगी में हम किताबों और शिक्षकों द्वारा पढ़ाई गयी बातों से ज़्यादा अपने खुद के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखते हैं। ऐसा ही एक तजुर्बा मैं साझा करने जा रही हूँ, पढ़ियेगा :
सुबह-सुबह हम अस्पताल पहुँचे, माँ को वार्ड में ले जाकर कपड़े बदलने को कहा गया। आसमानी रंग के मरीज़ों वाले कपड़े पहन कर माँ बिस्तर पर लेट गई। मैं वहीँ उनके पास बैठकर उन्हें बातों में उलझाने लगी। हालाँकि ऑपरेशन ज़्यादा बड़ा नहीं था, पर फिर भी कहीं-न-कहीं हम दोनों घबरा रहे थे। मोबाइल में उनकी तसवीरें लेकर मैं उनका ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही थी, पर वो भी शायद सब कुछ समझ रही थीं। उनके होठों पर सजी मंद-मंद मुस्कान डर को छिपाने में सफल थी।
थोड़ी ही देर बाद डॉक्टर साहिबा आ गईं। आते ही उन्होंने माँ से पूछा- "तैयार हो?"
"हाँ डॉक्टर साहिब," माँ ने धीमे स्वर में कहा।
तभी एक नर्स एक ट्रे में न जाने कितने प्रकार के इंजेक्शन्स और कई अन्य सामान ले आई। इतना सब देखकर मेरी आँखें फटी रह गईं। मेरा पहला अनुभव था। पहले कभी इस तरह की स्थिति से सामना नहीं हुआ था। अब घर की बड़ी बेटी होने के नाते सब कुछ मुझे सम्भालना था। यद्यपि ज़िम्मेदारी मुझपर थी, लेकिन पापा से ज़्यादा नहीं। वो भी हमारे साथ ही मौजूद थे और मुझसे भी ज़्यादा भाग-दौड़ कर रहे थे।
नर्स ने पहले माँ के बाएं हाथ में इंजेक्शन लगाया, फिर कमर में। मुझसे देखा तो नहीं जा रहा था पर मैंने निश्चय किया था कि आज अपना इम्तिहान मुझे खुद ही लेना है, बिना डरे सभी इंजेक्शन्स का सामना करना है। कुछ ही पलों में मुझे महसूस होने लगा कि मैं धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही थी। जब तीसरा इंजेक्शन लग रहा था, मेरे पैर काँपने लगे और मैं साइड में रखे स्टूल पर बैठ गई। सर बहुत तेज़ चकरा रहा था पर इरादा यही था कि माथे पर कोई शिकन ना दिखे।
बाहर से एक बूढ़ी महिला व्हीलचेयर लेकर आयीं जिस पर बैठकर माँ को ऑपरेशन थिएटर जाना था। मेरा शरीर पूरी तरह से काँप रहा था पर मैं किसी तरह माँ को चेयर तक ले गई और उन्हें बिठाते ही अपने होश खो बैठी।
हल्की-हल्की आवाज़ से पापा को पुकारने लगी पर मन में एक ही ख़्याल चल रहा था कि माँ के आगे कमज़ोर नहीं पड़ना है। अफ़सोस, मैं हार गई। माँ की व्हीलचेयर मुझसे दूर जाती जा रही थी पर मुझे सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था। जो थोड़ा-बहुत याद है वो ये कि माँ बार-बार पलट-पलट कर मुझे देख रही थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरी ऐसी हालत देखकर उन्हें बहुत बुरा लग रहा होगा लेकिन वो जल्दी ही मेरी आँखों से ओझल हो गईं।
मैं अभी तक पापा का हाथ थामे खड़ी थी। अचानक एक और नर्स कुर्सी लेकर आई। मुझे बिठाया गया, पानी पिलाया गया। हल्ला होने लगा कि इसको एडमिट कर दो पर मैं जानती थी कि मुझे एडमिट होने की कोई ज़रूरत नहीं। ये सच है कि सर बहुत तेज़ घूम रहा था और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा था, लेकिन मुझे कमज़ोर नहीं पड़ना था बस।
चेहरा पसीना-पसीना हो गया था। मैं कुछ देर कुर्सी पर बैठी, गहरी सांस ली और ठीक महसूस करने लगी।
अब मुझे इंतज़ार था बस माँ के लौट आने का। वार्ड में अकेले ख़ामोश बैठी मैं माँ का इंतज़ार कर रही थी। क़रीब दो घंटे बाद उन्हें वहाँ शिफ्ट किया गया। एनेस्थीसिया का असर अभी भी था। वो चुपचाप लेटी हुई थीं किसी मासूम बच्चे की तरह। मैं बस उनके पास बैठकर उन्हें देखती जा रही थी, सुकून और शान्ति महसूस हो रही थी। उनके चेहरे पर वो हौंसला पढ़ने की कोशिश कर रही थी जिसकी मदद से वो इतने सालों से हमें पालती-पोसती आई थीं, हर परेशानी से जूझती आई थीं, और उस दिन ऑपरेशन थिएटर से वार्ड के उस बिस्तर तक आई थीं ।
सब कुछ साफ़-साफ़ लिखा था उस चेहरे पर- वो हौंसला, वो संघर्ष, वो जज़्बा, वो हिम्मत और ये ज़िन्दगी।
पर ज़िन्दगी में हम किताबों और शिक्षकों द्वारा पढ़ाई गयी बातों से ज़्यादा अपने खुद के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखते हैं। ऐसा ही एक तजुर्बा मैं साझा करने जा रही हूँ, पढ़ियेगा :
सुबह-सुबह हम अस्पताल पहुँचे, माँ को वार्ड में ले जाकर कपड़े बदलने को कहा गया। आसमानी रंग के मरीज़ों वाले कपड़े पहन कर माँ बिस्तर पर लेट गई। मैं वहीँ उनके पास बैठकर उन्हें बातों में उलझाने लगी। हालाँकि ऑपरेशन ज़्यादा बड़ा नहीं था, पर फिर भी कहीं-न-कहीं हम दोनों घबरा रहे थे। मोबाइल में उनकी तसवीरें लेकर मैं उनका ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही थी, पर वो भी शायद सब कुछ समझ रही थीं। उनके होठों पर सजी मंद-मंद मुस्कान डर को छिपाने में सफल थी।
थोड़ी ही देर बाद डॉक्टर साहिबा आ गईं। आते ही उन्होंने माँ से पूछा- "तैयार हो?"
"हाँ डॉक्टर साहिब," माँ ने धीमे स्वर में कहा।
तभी एक नर्स एक ट्रे में न जाने कितने प्रकार के इंजेक्शन्स और कई अन्य सामान ले आई। इतना सब देखकर मेरी आँखें फटी रह गईं। मेरा पहला अनुभव था। पहले कभी इस तरह की स्थिति से सामना नहीं हुआ था। अब घर की बड़ी बेटी होने के नाते सब कुछ मुझे सम्भालना था। यद्यपि ज़िम्मेदारी मुझपर थी, लेकिन पापा से ज़्यादा नहीं। वो भी हमारे साथ ही मौजूद थे और मुझसे भी ज़्यादा भाग-दौड़ कर रहे थे।
नर्स ने पहले माँ के बाएं हाथ में इंजेक्शन लगाया, फिर कमर में। मुझसे देखा तो नहीं जा रहा था पर मैंने निश्चय किया था कि आज अपना इम्तिहान मुझे खुद ही लेना है, बिना डरे सभी इंजेक्शन्स का सामना करना है। कुछ ही पलों में मुझे महसूस होने लगा कि मैं धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही थी। जब तीसरा इंजेक्शन लग रहा था, मेरे पैर काँपने लगे और मैं साइड में रखे स्टूल पर बैठ गई। सर बहुत तेज़ चकरा रहा था पर इरादा यही था कि माथे पर कोई शिकन ना दिखे।
बाहर से एक बूढ़ी महिला व्हीलचेयर लेकर आयीं जिस पर बैठकर माँ को ऑपरेशन थिएटर जाना था। मेरा शरीर पूरी तरह से काँप रहा था पर मैं किसी तरह माँ को चेयर तक ले गई और उन्हें बिठाते ही अपने होश खो बैठी।
हल्की-हल्की आवाज़ से पापा को पुकारने लगी पर मन में एक ही ख़्याल चल रहा था कि माँ के आगे कमज़ोर नहीं पड़ना है। अफ़सोस, मैं हार गई। माँ की व्हीलचेयर मुझसे दूर जाती जा रही थी पर मुझे सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था। जो थोड़ा-बहुत याद है वो ये कि माँ बार-बार पलट-पलट कर मुझे देख रही थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरी ऐसी हालत देखकर उन्हें बहुत बुरा लग रहा होगा लेकिन वो जल्दी ही मेरी आँखों से ओझल हो गईं।
मैं अभी तक पापा का हाथ थामे खड़ी थी। अचानक एक और नर्स कुर्सी लेकर आई। मुझे बिठाया गया, पानी पिलाया गया। हल्ला होने लगा कि इसको एडमिट कर दो पर मैं जानती थी कि मुझे एडमिट होने की कोई ज़रूरत नहीं। ये सच है कि सर बहुत तेज़ घूम रहा था और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा था, लेकिन मुझे कमज़ोर नहीं पड़ना था बस।
चेहरा पसीना-पसीना हो गया था। मैं कुछ देर कुर्सी पर बैठी, गहरी सांस ली और ठीक महसूस करने लगी।
अब मुझे इंतज़ार था बस माँ के लौट आने का। वार्ड में अकेले ख़ामोश बैठी मैं माँ का इंतज़ार कर रही थी। क़रीब दो घंटे बाद उन्हें वहाँ शिफ्ट किया गया। एनेस्थीसिया का असर अभी भी था। वो चुपचाप लेटी हुई थीं किसी मासूम बच्चे की तरह। मैं बस उनके पास बैठकर उन्हें देखती जा रही थी, सुकून और शान्ति महसूस हो रही थी। उनके चेहरे पर वो हौंसला पढ़ने की कोशिश कर रही थी जिसकी मदद से वो इतने सालों से हमें पालती-पोसती आई थीं, हर परेशानी से जूझती आई थीं, और उस दिन ऑपरेशन थिएटर से वार्ड के उस बिस्तर तक आई थीं ।
सब कुछ साफ़-साफ़ लिखा था उस चेहरे पर- वो हौंसला, वो संघर्ष, वो जज़्बा, वो हिम्मत और ये ज़िन्दगी।

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