साँवली-सी एक लड़की, आँखों में बड़ा-बड़ा काजल, होठों पर लाल रंग की गाढ़ी लिपस्टिक, माँग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, बालों को समेटे, लम्बी कद-काठी लिए अचानक मेरी कुर्सी के पास आकर खड़ी होती है। देखते ही अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था कि वो एक साउथ इंडियन है और उसकी हाल ही में शादी हुई है। उस लड़की की लिखी गई कॉपी एडिट हो रही थी। हम दोनों के एडिटर साहब एक ही थे। वो दफ़्तर में नयी थी।
इधर उसकी कॉपी एडिट हो रही थी, उधर मैं उसे तराशने की कोशिश में लग गई। उसे ध्यानपूर्वक देखा तो ये एहसास हुआ कि शायद उसकी शख़्सियत बहुत ही संजीदा है। वो अपनी कॉपी एडिट होते बड़ी ही सहजता से देख रही थी। चेहरे पर मासूमियत थी, पर कहीं-न-कहीं आँखों से शरारत भी झलक रही थी। आख़िर कैसे ना झलकती, वो हमारी चुलबुली "जेस्सी" जो थी।
वो कहते हैं ना कि जैसे-जैसे किसी शख़्स के साथ वक़्त बीतता जाता है, हम उसे और क़रीब से जानने लगते हैं, उसे समझने लगते हैं। यही हुआ मेरे और जेस्सी के साथ।
उस दिन उन्हें ग़ौर से देखने के बाद एक दिन उनसे लंच में मुलाक़ात हुई। अब किसी के साथ बैठकर खाना खाओ तो दोस्ती होते देर कहाँ लगती है। बस हो गई दोस्ती और हम निभाते चले गए।
इसी तरह एक साल कैसे उस दफ़्तर में बीत गया पता ही नहीं चला (पर जब बीत रहा था, तब पता चल रहा था।) जेस्सी उम्र में मुझसे बड़ी हैं पर मैं फिर भी उन्हें मैडम या दीदी कहकर नहीं बुलाती। वो किसी बड़ी दीदी से ज़्यादा दोस्त हो गई हैं और हमेशा वही रहेंगीं। हालाँकि वो मुझे ज़रूर 'बेटा' बुलाती हैं और इसलिए मुझे ये लफ्ज़ काफ़ी अज़ीज़ है।
इसे ख़ुशक़िस्मती ही कहेंगे शायद कि बचपन से लेकर आज तक मेरी ज़िन्दगी में ऐसे लोग हमेशा आते रहे हैं जिन्होंने हर बार मेरे टूट जाने पर मेरा हौंसला बढ़ाया है। जेस्सी भी उनमें से एक हैं और हमेशा रहेंगी। भावना तो मेरी दफ़्तर वाली माँ थीं हीं, पर जेस्सी भी कोई उनसे कम नहीं रहीं। उनका डाँटना, चिल्लाना, प्यार करना, बार-बार लिखने और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना, मेरे पत्रकारिता के ख्वाब को कभी टूटने ना देना और न जाने क्या-क्या........ द लिस्ट इज़ एंडलेस, बातों ही बातों में उन्होंने मेरे लिए इतना कुछ कर दिया कि अब उनकी आदत-सी हो गई है। स्पेशल थैंक्स टू व्हाट्सएप्प जो हमें एक-दूसरे से लगभग हर दिन बात करने का मौक़ा देता है।
हर सुबह जब मैं दफ़्तर पहुँचती थी तो मेरे दिन की शुरुआत उनका मुझे गले लगाने से होती थी। मेरे अंदर आते ही वो बड़ी-सी मुस्कान के साथ बाहें फैलाए मेरा इंतज़ार करती थीं और मैं बैग रखते ही भागते हुए किसी छोटे से बच्चे की तरह उनसे लिपट जाती थी। अच्छा महसूस होता था। लगता था कि उस माहौल में भी मुझमें ज़िन्दगी बाक़ी है। गर्मी हो या सर्दी, उनका मुझे गले लगाना निश्चित था। मुझे मेरे हुनर (जितना भी है) से वाक़िफ़ कराने में उनका बहुत बड़ा हाथ है जिसके लिए मैं तमाम उम्र उनकी शुक्रगुज़ार रहूँगी ।
जेस्सी एक आज़ाद पंछी की तरह हैं, हमेशा बस चहकती रहने वालीं। दफ़्तर में भी चाहें कितनी ही उलझनें क्यों न हों, वो होती थीं तो हम सबको ज़िंदा होने का एहसास होता था। यद्यपि अगर वो कभी ख़ामोश हो जाती थीं तो हम सबका कलेजा मुँह को आ जाता था। ख़ासतौर पर मुझे तो उनकी ख़ामोशी काटने को दौड़ती थी। आज हम एक दफ़्तर में नहीं हैं मग़र अब भी उन्हें उदास देखने की कल्पना करना भी भयावह लगता है।
इधर उसकी कॉपी एडिट हो रही थी, उधर मैं उसे तराशने की कोशिश में लग गई। उसे ध्यानपूर्वक देखा तो ये एहसास हुआ कि शायद उसकी शख़्सियत बहुत ही संजीदा है। वो अपनी कॉपी एडिट होते बड़ी ही सहजता से देख रही थी। चेहरे पर मासूमियत थी, पर कहीं-न-कहीं आँखों से शरारत भी झलक रही थी। आख़िर कैसे ना झलकती, वो हमारी चुलबुली "जेस्सी" जो थी।
वो कहते हैं ना कि जैसे-जैसे किसी शख़्स के साथ वक़्त बीतता जाता है, हम उसे और क़रीब से जानने लगते हैं, उसे समझने लगते हैं। यही हुआ मेरे और जेस्सी के साथ।
उस दिन उन्हें ग़ौर से देखने के बाद एक दिन उनसे लंच में मुलाक़ात हुई। अब किसी के साथ बैठकर खाना खाओ तो दोस्ती होते देर कहाँ लगती है। बस हो गई दोस्ती और हम निभाते चले गए।
इसी तरह एक साल कैसे उस दफ़्तर में बीत गया पता ही नहीं चला (पर जब बीत रहा था, तब पता चल रहा था।) जेस्सी उम्र में मुझसे बड़ी हैं पर मैं फिर भी उन्हें मैडम या दीदी कहकर नहीं बुलाती। वो किसी बड़ी दीदी से ज़्यादा दोस्त हो गई हैं और हमेशा वही रहेंगीं। हालाँकि वो मुझे ज़रूर 'बेटा' बुलाती हैं और इसलिए मुझे ये लफ्ज़ काफ़ी अज़ीज़ है।
इसे ख़ुशक़िस्मती ही कहेंगे शायद कि बचपन से लेकर आज तक मेरी ज़िन्दगी में ऐसे लोग हमेशा आते रहे हैं जिन्होंने हर बार मेरे टूट जाने पर मेरा हौंसला बढ़ाया है। जेस्सी भी उनमें से एक हैं और हमेशा रहेंगी। भावना तो मेरी दफ़्तर वाली माँ थीं हीं, पर जेस्सी भी कोई उनसे कम नहीं रहीं। उनका डाँटना, चिल्लाना, प्यार करना, बार-बार लिखने और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना, मेरे पत्रकारिता के ख्वाब को कभी टूटने ना देना और न जाने क्या-क्या........ द लिस्ट इज़ एंडलेस, बातों ही बातों में उन्होंने मेरे लिए इतना कुछ कर दिया कि अब उनकी आदत-सी हो गई है। स्पेशल थैंक्स टू व्हाट्सएप्प जो हमें एक-दूसरे से लगभग हर दिन बात करने का मौक़ा देता है।
हर सुबह जब मैं दफ़्तर पहुँचती थी तो मेरे दिन की शुरुआत उनका मुझे गले लगाने से होती थी। मेरे अंदर आते ही वो बड़ी-सी मुस्कान के साथ बाहें फैलाए मेरा इंतज़ार करती थीं और मैं बैग रखते ही भागते हुए किसी छोटे से बच्चे की तरह उनसे लिपट जाती थी। अच्छा महसूस होता था। लगता था कि उस माहौल में भी मुझमें ज़िन्दगी बाक़ी है। गर्मी हो या सर्दी, उनका मुझे गले लगाना निश्चित था। मुझे मेरे हुनर (जितना भी है) से वाक़िफ़ कराने में उनका बहुत बड़ा हाथ है जिसके लिए मैं तमाम उम्र उनकी शुक्रगुज़ार रहूँगी ।
जेस्सी एक आज़ाद पंछी की तरह हैं, हमेशा बस चहकती रहने वालीं। दफ़्तर में भी चाहें कितनी ही उलझनें क्यों न हों, वो होती थीं तो हम सबको ज़िंदा होने का एहसास होता था। यद्यपि अगर वो कभी ख़ामोश हो जाती थीं तो हम सबका कलेजा मुँह को आ जाता था। ख़ासतौर पर मुझे तो उनकी ख़ामोशी काटने को दौड़ती थी। आज हम एक दफ़्तर में नहीं हैं मग़र अब भी उन्हें उदास देखने की कल्पना करना भी भयावह लगता है।
वैसे तो पंछी अक्सर आकाश में उड़ते हुए अच्छे लगते हैं, मगर मैंने इस पंछी को ज़मीन पर ही अपने ख़्वाबों के पर फैलाते देखा है। पर आप चाहें कितने ही मशहूर या सफल क्यों न हो जाएँ, पाँव ज़मीन पर रहना ज़रूरी है। जेस्सी एक ऐसा पंछी है जिनके पाँव के साथ पर भी ज़मीन पर ही हैं।
बस उम्मीद इतनी है कि बहुत जल्द वो अपने परों को ज़मीं पर ही फैलाए अपने ख़्वाबों की उड़ान भारती नज़र आएँ क्यूँकि वो इसके लायक है और वो ऐसा ज़रूर कर दिखाएंगी। आफ़्टर आल, जेस्सी जैसी कोई नहीं।
निजी तौर पर मुझे जेस्सी से इसलिए भी ख़ास लगाव है क्यूंकि उन्हें मेरी ये फ़र्ज़ी दुनिया बहुत पसंद है। मेरा लिखा शायद ही कोई लेख हो जो उन्होंने ना पढ़ा हो। फिर चाहें वो अंग्रेजी में हो या हिंदी में ही। उम्मीद है कि इसे पढ़कर भी उन्हें ख़ुशी महसूस होगी।
निजी तौर पर मुझे जेस्सी से इसलिए भी ख़ास लगाव है क्यूंकि उन्हें मेरी ये फ़र्ज़ी दुनिया बहुत पसंद है। मेरा लिखा शायद ही कोई लेख हो जो उन्होंने ना पढ़ा हो। फिर चाहें वो अंग्रेजी में हो या हिंदी में ही। उम्मीद है कि इसे पढ़कर भी उन्हें ख़ुशी महसूस होगी।
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| जेस्सी के साथ दफ़्तर में बीता एक लम्हा। |

very nice!!
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