Thursday, 28 July 2016

वो कहाँ चलीं गईं ?

बात दो साल पुरानी है। मैं तब गुड़गाँव में स्थित एक विशाल और बेहद शानदार बिल्डिंग "टाइम्स इंटरनेट" में इंटरव्यू देने गयी थी।

पहुँचते ही एचआर से मुलाक़ात हुई। उन्होंने मुझे इंतज़ार करने को कहा और मेरे लिए टेस्ट पेपर लेने चली गईं। मैं चुपचाप अपने सामने बैठे बाक़ी के इंटरव्यू देने आये लोगों को देखने लगी। वे सभी काफ़ी अनुभवी मालूम होते थे। शायद मैं ही सबसे छोटी थी वहाँ।

अभी ये सब सोचकर डर महसूस होना शुरू ही हुआ था कि अचानक एक महिला पर नज़र पड़ी। बहुत ही खुशमिज़ाज़ मालूम होती थीं वो। मेरा ध्यान बार-बार उनकी ओर जा रहा था।

मैंने उन्हें तराशना शुरू किया ही था कि एचआर टेस्ट पेपर लेकर आ गयी। हमारे हाथों में  उन्हें थमा दिया गया और नीचे जाकर हमें एक कमरे में बैठने को कहा गया। हम केवल चार या छह लोग होंगे लेकिन वो कमरा बहुत बड़ा था।

हम सबने पेपर लिखना शुरू किया। कमरे में घोर सन्नाटा था। वो महिला लेकिन उस सन्नाटे की खामोशी को तोड़ रही थीं। कुछ ढूँढ रहीं थीं अपने बैग में, शायद पेन।

सारी मशक़्क़त करने के बाद उन्होंने पूछ ही लिया, "एनीवन हैज़ गॉट एन एक्स्ट्रा पेन?"

सबकी नज़रें उन पर थीं। मैंने तुरंत अपनी सीट से उठकर उनके पास जाकर उन्हें पेन दे दिया। बड़े दिल से उन्होंने मेरा धन्यवाद किया। मैं वापिस अपनी सीट पर बैठकर टेस्ट करने लगी।

कुछ घंटे बीत गए थे। लोग कमरा छोड़कर जाने लगे थे। आख़िर में वहाँ तीन ही लोग बचे थे- मैं, वो महिला और एक पुरुष और।

मैं तेज़ी से अपना टेस्ट ख़त्म करने की कोशिश कर रही थी। थोड़ी देर बाद मेरा टेस्ट ख़त्म हुआ और  मैं अपना सामान उठकर जाने लगी। सहसा याद आया कि मेरा पेन उस महिला के पास है।

मैं वहीँ खड़ी होकर इंतज़ार करने लगी और उनकी ओर देखने लगी। हाँलाकि एक पेन दान देने में कोई हर्ज नहीं था, लेकिन अगर मैं वहाँ खड़ी ना रहती तो हम शायद इतने अच्छे दोस्त नहीं बन पाते, जितने कि आज बन गए हैं।

आज वो ख़ासतौर पर मुझसे मिलने आयीं थीं। टाइम्स इन्टरनेट में हुई मुलाक़ात के बाद आज हम दूसरी बार मिल रहे थे। इस बीच फेसबुक और व्हाट्सएप्प ने हमें जोड़े रखने में काफ़ी मदद की।

दो सालों में बहुत कुछ बदल गया था। जिन श्वेता से मैं तब मिली थी वो तो किसी हँसते-खेलते छोटे से बच्चे की तरह थीं। तब हम अजनबी थे लेकिन जितने प्यार से उन्होंने मुझे तब गले लगाया था, वो आज मौजूद नहीं था।

उस दिन किसी बात पर वो कहना चाह रहीं थीं, "माय हस्बैंड इज़...... "

"हस्बैंड?" इसे पहले कि उनका  वाक्य  पूरा होता मैंने बड़े अचंभे से पूछा था।

"हाँ। " ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा था।

"आप मैरिड हो ?" और भी आश्चर्य के साथ मैंने पूछा था।

"हाँ।" ज़ोर से हँसते हुए उन्होंने कहा था।

"आप तो शादीशुदा लगती ही नहीं हो।" मैंने फिर अचम्भे में कहा था।

"वाओ! दैट्स सच आ लवली कॉम्प्लिमेंट। आई विल टेल दिस टू मय हस्बैंड।" उन्होंने हँसते हुए कहा और मुझे गाला लगा लिया था।

एक पल को मुझे ऐसा लगा था जैसे वो अजनबी हैं ही नहीं।

आज मग़र एक-दूसरे को जानते हुए भी मैं उन्हें अजनबी-सा महसूस कर रही थी। वो जब से आईं थीं, कुछ-कुछ बोलती जा रहीं थीं। मेरे ज़ेहन में ख़याल कुछ ऐसा था कि जब वो आएँगी तो हम घंटों बातें करेंगे, खूब मस्ती करेंगे ,सेल्फियाँ खिंचवा-खिंचवा के फेसबुक पर अप्लोड करेंगे।

अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं हुआ। वो जब लगातार बोलती जा रही थीं, बीच में किसी का फ़ोन आया। वो फ़ोन पर बात करने लगीं और मैं उनकी आँखों में, उनकी बातों में, उनकी वो पुरानी अजनबी शख़्सियत तलाशने की कोशिश करने लगी जो उस दिन एक पल में मेरी दोस्त बन गई थी। कोफ़्त इस बात का हुआ कि वो मुझे नहीं मिली।

"आपको कुछ हो गया है।" उनके फ़ोन रखते ही मैंने उनसे कहा।

"हेहे! काम की टेंशन है यार।" एक फ़र्ज़ी सी हंसी दिखा दी उन्होंने मुझे अपने होठों पर।

"आपकी आँखों से मैं पकड़ पा रही हूँ कि कुछ तो तक़लीफ़ है।" मैंने ज़ोर देते हुए कहा।

"पकड़ा तो तुमने बिल्कुल सही है।" फिर से उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, आँखों में आये सैलाब को उँगलियों से रोकते हुए।

कुछ तो था जो शायद वो मुझे दोस्त के नाते बता सकतीं थीं पर बंदिश तो हर रिश्ते में होती ही है। शायद हमारे रिश्ते की भी कोई हद ज़रूर होगी। उसी को निभाते हुए वो फिर मुस्कुराईं और जाने के लिए कहने लगीं। मैंने भी रुकने को नहीं कहा।

हज़ारों सवाल और ख़याल मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में दौड़ रहे थे उस पल। लेकिन होठों को जैसे शब्द ही नहीं मिल रहे थे। मैं चुप थी। मन ही मन दुआ कर रही थी कि उनकी तक़लीफ़ की जो भी वजह है वो बस ख़त्म हो जाए।

जाते वक़्त उन्होंने फिर मुझे गले लगाया मगर आज वो बात थी ही नहीं जो दो साल पहले थी। न जाने क्या हो गया है उनको? पहले से काफ़ी बदल गईं हैं।

वैसे तो वक़्त बदल गया है।  मैं ख़ुद भी बहुत बदल गई हूँ, तो फिर उनके बदले मिजाज़ से इतनी हैरत क्यों?

ज़िन्दगी ऐसी ही होती है शायद। हर दिन अच्छा नहीं होता और हर दूसरा दिन बुरा नहीं होता। हो सकता है उस वक़्त कोई वजह हो जो उन्हें परेशान कर रही हो पर मुझे इस बात की ख़ुशी होनी चाहिए कि उन्होंने बेहद मसरूफ होने के बावजूद मुझसे मिलने के लिए वक़्त निकाला और मैं खुश हूँ भी, बहुत खुश।

मगर वो जिनसे मिलने की मुझे उम्मीद थी वो कहाँ चली गईं ? क्या वो वापिस आएँगी? इस सवाल का जवाब कौन देगा ?

4 comments:

  1. क्या मुलाक़ात थी वह जिसका वर्णन और भी ज़बरदस्त है।

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  3. Hey! Akanki Baby

    I hardly check FB but came to know about this blog thought my mail. I am shocked but not shocked actually :)

    I knew you gonna write something about that 'Unsatisfactory' mulkaat. I thought fb par likho shyad hhehe but blog is too....

    That day I had long day in office & my personal client was killing me over phone. The worst part is jis con call ke liye jaldi ki vo bhi nahi hua. It was bad day I guess.

    But, will meet again soon & will click selfies :) Do u remember how many times I asked u to come to filmcity? It's high time you come now Hehehe I am waiting with that old Shweta, we both will meet her :O
    Lotsaa Love
    P.S. - You can post my comment on FB :)

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