Sunday, 13 March 2016

बदलता वक़्त, बदलते लोग

एक साल बीत चुका था। उस दिन फिर वैसी ही सुबह थी। ठंडी-ठंडी हवा का एहसास और नॉएडा की सड़कों पर तेज़ रफ़्तार से चलती एक गाड़ी जिसमें हम सब सवार थे (मैं और मेरे कुछ सहकर्मी)।

शायद एक अरसे बाद सूरज को सुबह-सवेरे किरणें बिखेरते हुए देखा था। अच्छा महसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था मानो गाड़ी में बैठे-बैठे पूरा नॉएडा घूम लिया हो। रास्ते में बड़े-बड़े बिल्डरों के बड़े-बड़े हाउसिंग प्रॉजेक्ट के ज़रिये नॉएडा की बदलती सूरत देखने को मिल रही थी। हो सकता है इसी वजह से एक 'ग्रेटर' नॉएडा की आवश्यकता आन पड़ी है। एक सेक्टर तो ऐसा था, देखकर लगा मानो यहाँ बिल्डिंगों की बाढ़-सी आ गई हो। और चलते-चलते पिछली बार की तरह हम इस बार भी ग्रेटर नॉएडा में स्थित स्टेलर जिमख़ाना पहुंच गए। वहाँ की हरी घास, बड़ी-सी बिल्डिंग, झील, फ़ूल, पौधे और बड़ा-सा मैदान उस जिमख़ाने की खूबसूरती को साफ़-साफ़ बयाँ कर रहा था।

मैदान क्रिकेट खेलने के लिए बिल्कुल तैयार था, हम सब भी पूरी तरह कमर कसकर मैदान में उतर गए। एकाएक ही बारिश ने मौसम का रुख़ बदल दिया, मग़र हम भी कहाँ हार मानने वाले थे। सब लोगों पर बैट और बल्ले का ऐसा जूनून सवार था कि आख़िरकार बारिश को हार माननी ही पड़ी।

बारिश बंद हुई और खेल शुरू हुआ। मुझे किसी टीम का 'एक्स्ट्रा प्लेयर' रखा गया था। अधिकतर महिलाओं के साथ यही हुआ था। ख़ैर, मुद्दा ये नहीं है। मन में उत्साह था तो सही पर कहीं-न-कहीं डगमगा-सा रहा था। सभी टीम के खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। मैंने भी फ़ील्ड पर और अपनी पारी खेलते वक़्त कुछ ख़ास प्रदर्शन तो नहीं किया मग़र कोशिश ज़रूर अच्छी की। अफ़सोस कि उस कोशिश के बावजूद मेरी टीम हार गयी।

इसके बाद ही क्रिकेट से ध्यान हटकर बाक़ी की एक्टिविटीज़ पर चला गया। वॉल क्लाइम्बिंग, आर्चरी, शूटिंग, ज़िप लाइन, इत्यादि। पिछली बार भी वो सारी चीज़ें की थीं। हौंसला बढ़ाने वाले तब भी थे, अब भी थे। इस बार सारे स्टंट्स कर लिए, फिर मौका क्या पता कब मिले?

जैसे-जैसे दिन बीत रहा था, कुछ लोगों की कमी महसूस होती जा रही थी। वो लोग जो उस साल इस खेल में शुमार थे, इस बार मगर संस्थान में ही नहीं थे। अच्छा नहीं लग रहा था। वो लोग होते तो शायद और मज़ा आता, और ख़ुशी होती, और अच्छा लगता। जो लोग मगर मौजूद थे उनकी वजह से भी दिन खूबसूरत बना, अच्छा लगा। वो भी इस दिल के करीब हैं। मैं अगर किसी क़ाबिल हूँ, तो उसमें उन सबका श्रेय है।

जगह वही थी, जज़बात वही थे, बस लोग बदल गए थे। वो अंग्रेजी में कहते हैं न "चेंज इज़ कांस्टेंट," वैसा ही कुछ था। कुछ अच्छा था, कुछ बुरा ; कुछ सही था, कुछ ग़लत भी। बस तजुर्बा था, कुछ सीखने का, आगे बढ़ने का।

पिछली बार भी क्रिकेट खेलना नहीं आता था मुझको, इस बार भी कुछ ख़ास नहीं किया। उम्मीद है एक दिन मैं सीख जाऊंगी और किसी दिन ऐसी ही किसी टीम की जीत का कारण बनूँगी। (सीरियसली मत लीजियेगा)।


माहौल दर्शाती एक सेल्फ़ी। 

12 comments:

  1. wha kya lines ha chaa gayi Akanki ;)

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  2. haaahhaa...tum b seekh gye.. "Chha gaye". :D :D thanku by the way... :)

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  3. छा तो गई हो। एहसासों और सुंदरता सुन्दर मेल है। वाह! वाह!!!!!!!!!!!!!

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  4. Haha tu writer hi theek h.. Cricket side m rakhegi tab bhi chalega.. Jazbat bata karna to koi tujse sikhe... Mudda bhi clear ho gaya or bat bhi bata Di.. Wah😘😘

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    1. Ohh shukriya.. Malum hota h kitne saare talent khoj diye tune mujhnein ladke. :D

      Bahut bahut shukriyaaaa.. <3

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    2. Ohh shukriya.. Malum hota h kitne saare talent khoj diye tune mujhnein ladke. :D

      Bahut bahut shukriyaaaa.. <3

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