Tuesday, 9 June 2015

तुम और मैं

ये क्या लिखा है तुमने? क्यों क़त्ल-ए-आम कर रही हो?
किस बारे में फ़रमा रहे हैं जनाब? ज़रा तफ्सील में बताइये।

पढ़ो, ये तुमने ही लिखा है न?  इतनी जल्दी भूल भी गयीं?
हाँ, लिखा तो मैंने ही है।

क्यों लिखा है? ऐसा ख़याल आया भी कैसे तुम्हें?
क्यों? किसी ने कुछ कहा क्या?

कौन क्या कहेगा?
कोई कुछ भी कह सकता है।

ख़ैर अब ये बताओ कि ये ख़याल आया कैसे?
अरे! ख़याल ही तो है। किसी से पूछकर थोड़े ही आएगा।

 हम्म। तुम्हें अपने धैर्य की सीमा बढ़ानी चाहिए।
मैं वाक़िफ़ हूँ। तुम न बताओ।

अच्छा ठीक है। गलती हो गई। अब कुछ नहीं कहूँगा।
अरे! मेरा वो मतलब नहीं था।

जो भी था। मैं बस तुम्हें समझा रहा था। बाक़ी तुम्हारी मर्ज़ी।
हम्म। वैसे तुम जो समझाना चाहते हो, वो सब मैं पहले से समझती हूँ, बस स्वीकार नहीं कर पा रही हूँ।

अच्छा!  कोई बात नहीं। अकसर ऐसा होता है, मगर तुम निराश मत हो।
हम्म। कोशिश  तो जारी है। उम्मीद है बहुत जल्द वक़्त बहुत कुछ सिखा देगा। लेकिन फिर भी धैर्य रखना अलग बात है और ग़लत चीज़ बर्दाश्त करना अलग।

क्या ग़लत हुआ?
कुछ भी नहीं।

बताओ मुझे।
मेरी नज़र से देखने का साहस है?

उफ्फ़, तुम पागल हो।
जानती हूँ।

तुम नहीं सुधरोगी।
ये तो तुम भी जानते हो।

यूँ बहलाओ मत। ठीक-ठीक बताओ क्या हुआ है?
तुम्हें बताना मुनासिब नहीं।

क्यों ?
तुम पर ऐतबार नहीं।

ऐसा क्या गुनाह किया मैंने?
सोचोगे तो समझ भी जाओगे।

कहीं तुम्हें पागलख़ाने की ज़रुरत तो नहीं?
नहीं, बस इश्क़ .................................. (ख़ामोशी)

क्या?
कुछ भी तो नहीं। 

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