आजकल की प्रॉफेशनल ज़िन्दगी भी बहुत अजीब-सी शानदार है। आजकल की ही क्यों, पहले की भी कुछ ऐसी ही होगी, पर मुझे शायद अब मालूम हुआ है जब पाँव घर के बाहर निकल पड़े हैं। कुछ नया ढूंढने, कुछ अलग देखने, तरह-तरह के लोगों से मिलने, उनकी मानसिकताओं को समझने के लिए कदम आगे बढ़ते जा रहे हैं। एक कॉर्पोरेट का हिस्सा होना अजीब-सा अनुभव है। प्रोफेशनलिज्म के नाम पर पता नहीं कितने चोचले देखने को मिलते हैं। उन्हें देख कर कभी हँसी आती है, कभी गुस्सा, कभी अफ़सोस होता है तो कभी ख़ुशी। सही और ग़लत का फर्क करना मुश्किल होता है। जो बाक़ियों को सही लगता है, मुझे ग़लत लगता है और जो उन्हें ग़लत लगता है, वो मुझे ठीक लगता है। पर ये भी ज़रूरी नहीं कि हर बार सही-ग़लत का अंतर्विरोध सामने लाया ही जाए। कभी-कभी चुप रहकर अपने दिल की भी सुनी जा सकती है और ज़्यादा समझदारी भी शायद इसी में है।
ऊँची-ऊँची इमारतों में बसी कॉर्पोरेट कंपनियाँ कभी-कभी ज़िन्दगी पर तंज़-सी मालूम होती हैं। लोग दिन रात ऐसी फॉर्मल्टी निभाते हैं, जिससे वे खुद भी अवगत नहीं होते। क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं कुछ नहीं मालूम, जिस बात की ख़बर है वो बस ये है कि न चाहते हुए भी वो हर रोज़ वही करते जा रहे हैं जिसे वो बोझ समझते हैं, करना नहीं चाहते और उसी वजह से झल्लाने लगते हैं। हँसना और बोलना भूल जाते हैं। इतना सब मात्र चंद अमूल्य कागज़ के टुकड़ों के लिए।
"अजीब है ये ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी अजीब है"- किसी गाने की ये बिल्कुल सच्ची कड़ी है। पर ये ज़िन्दगी अजीब नहीं है, असल में इसे जीने वाले अजीब हैं। न जाने क्यों लोग ज़िन्दगी को सीधा-सादा नहीं रहने दे सकते? उन्हें अपने आस-पास पता नहीं क्या चाहिए, कभी किसी चीज़ से संतुष्ट ही नहीं होते। बस यही अजीब है, बहुत अजीब। क्या फायदा इतनी मेहनत का कि रातों को नींद ही ना आये, कुछ पैसों की ख़ातिर दस बीमारियाँ लग जाएँ। मानो लोगों को पैसों की ज़रूरत नहीं, भूँख है (जो दाल-चावल से नहीं मिट सकती)।
सबसे अलग होने की इच्छा नहीं है, मगर इन प्रोफ़ेशनल लोगों के रंग में ढलने से डर लगता है। किसी ने कहा था कि कई सालों तक जब इंसान खुद को बड़ी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में घिसता रहता है तो उसमें हँसने, मुस्कुराने की न तो इच्छा होती है और न ही हिम्मत। शायद इतना घिस जाते हैं कि असली लक्ष्य याद नहीं रहता।
अब सवाल ये है कि आख़िर क्यों ज़िन्दगी को इतनी कश्मकशों से क़ैद करना है? क्या इसी को प्रोफेशनलिज्म कहते हैं? आप सोफिस्टिकेशन में ही सारी उम्र बिता देंगे तो दिल की कब सुनेंगे? कुछ लोग शायद सुनते होंगे पर सिर्फ़ वीकेंड्स पे। इतनी बंदिशें…उफ़्फ़!
कुछ मन तो साइलेंट ही पड़ चुके हैं। ये ठीक नहीं हैं। दिखावे की दुनिया में जो असली चीज़ें हैं वो मरती जा रही हैं। उम्मीद है कि कोई तो इन्हें ज़िंदा रखेगा। दुआ कीजियेगा कि उन कोई में "आप" और "हम" भी हों। वरना सबकी तरह बनने और दुनिया के रंग में ढलने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी। फिर सोचते रहिएगा।
ऊँची-ऊँची इमारतों में बसी कॉर्पोरेट कंपनियाँ कभी-कभी ज़िन्दगी पर तंज़-सी मालूम होती हैं। लोग दिन रात ऐसी फॉर्मल्टी निभाते हैं, जिससे वे खुद भी अवगत नहीं होते। क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं कुछ नहीं मालूम, जिस बात की ख़बर है वो बस ये है कि न चाहते हुए भी वो हर रोज़ वही करते जा रहे हैं जिसे वो बोझ समझते हैं, करना नहीं चाहते और उसी वजह से झल्लाने लगते हैं। हँसना और बोलना भूल जाते हैं। इतना सब मात्र चंद अमूल्य कागज़ के टुकड़ों के लिए।
"अजीब है ये ज़िन्दगी, ये ज़िन्दगी अजीब है"- किसी गाने की ये बिल्कुल सच्ची कड़ी है। पर ये ज़िन्दगी अजीब नहीं है, असल में इसे जीने वाले अजीब हैं। न जाने क्यों लोग ज़िन्दगी को सीधा-सादा नहीं रहने दे सकते? उन्हें अपने आस-पास पता नहीं क्या चाहिए, कभी किसी चीज़ से संतुष्ट ही नहीं होते। बस यही अजीब है, बहुत अजीब। क्या फायदा इतनी मेहनत का कि रातों को नींद ही ना आये, कुछ पैसों की ख़ातिर दस बीमारियाँ लग जाएँ। मानो लोगों को पैसों की ज़रूरत नहीं, भूँख है (जो दाल-चावल से नहीं मिट सकती)।
सबसे अलग होने की इच्छा नहीं है, मगर इन प्रोफ़ेशनल लोगों के रंग में ढलने से डर लगता है। किसी ने कहा था कि कई सालों तक जब इंसान खुद को बड़ी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में घिसता रहता है तो उसमें हँसने, मुस्कुराने की न तो इच्छा होती है और न ही हिम्मत। शायद इतना घिस जाते हैं कि असली लक्ष्य याद नहीं रहता।
अब सवाल ये है कि आख़िर क्यों ज़िन्दगी को इतनी कश्मकशों से क़ैद करना है? क्या इसी को प्रोफेशनलिज्म कहते हैं? आप सोफिस्टिकेशन में ही सारी उम्र बिता देंगे तो दिल की कब सुनेंगे? कुछ लोग शायद सुनते होंगे पर सिर्फ़ वीकेंड्स पे। इतनी बंदिशें…उफ़्फ़!
कुछ मन तो साइलेंट ही पड़ चुके हैं। ये ठीक नहीं हैं। दिखावे की दुनिया में जो असली चीज़ें हैं वो मरती जा रही हैं। उम्मीद है कि कोई तो इन्हें ज़िंदा रखेगा। दुआ कीजियेगा कि उन कोई में "आप" और "हम" भी हों। वरना सबकी तरह बनने और दुनिया के रंग में ढलने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी। फिर सोचते रहिएगा।
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