अक्सर सुना है कि नए साल की शुरुआत में उन लोगों से मुलाक़ात कर लेनी चाहिए जो हमें अज़ीज़ हैं। इसी ख़याल का एक वर्णन।
"कल मिलते हैं।"
"नहीं।"
"क्यों?"
"मुझे नहीं मिलना तुमसे।"
"मग़र क्यों?"
"बस, ऐसे ही।"
"जब से साल चढ़ा है, तुमने मिलने की ज़िद्द लगाई हुई है।"
"ज़िद्द लगायी हुई 'थी' । आधा साल गुज़र गया है।"
"मैं तो अब भी पिछले साल की आख़िरी मुलाक़ात की याद में मशगूल हूँ।"
तो अब मिलने का क्या फायदा?
"क्यों?"
"मिलकर भी तो हमें जुदा ही रहना है।
मगर यही जुदाई तो तुमसे बार-बार मिलने का बहाना है।"
कब तक बहाने बनाओगे?
"जब तक बनते रहेंगे।"
"बहाने या हालात?"
हालात बहाना बन जाते थे कि मिलने की चाहत होते हुए भी दोनों ना मिलें।
"कल मिलते हैं।"
"नहीं।"
"क्यों?"
"मुझे नहीं मिलना तुमसे।"
"मग़र क्यों?"
"बस, ऐसे ही।"
"जब से साल चढ़ा है, तुमने मिलने की ज़िद्द लगाई हुई है।"
"ज़िद्द लगायी हुई 'थी' । आधा साल गुज़र गया है।"
"मैं तो अब भी पिछले साल की आख़िरी मुलाक़ात की याद में मशगूल हूँ।"
तो अब मिलने का क्या फायदा?
"क्यों?"
"मिलकर भी तो हमें जुदा ही रहना है।
मगर यही जुदाई तो तुमसे बार-बार मिलने का बहाना है।"
कब तक बहाने बनाओगे?
"जब तक बनते रहेंगे।"
"बहाने या हालात?"
हालात बहाना बन जाते थे कि मिलने की चाहत होते हुए भी दोनों ना मिलें।
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